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Class 12
PHYSICS
ट्रांसफॉर्मर की रचना एवं कार्यविधि का वर...

ट्रांसफॉर्मर की रचना एवं कार्यविधि का वर्णन कीजिए। इसमें लौह पटलित क्रोड का क्या महत्त्व है?

लिखित उत्तर

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ट्रांसफॉर्मर का सिद्धान्त-यह अन्योन्य प्रेरण के सिद्धान्त पर कार्य . करने वाली एक ऐसी युक्ति है, जिसे प्रत्यावर्ती धारा के विभव को परिवर्तित करने के लिए प्रयुक्त किया जाता है।

रचना-इसमें नर्म लोहे की पृथक्कृत पत्तियों को एक के ऊपर एक रखकर आयताकार पटलित क्रोड बनाया जाता है, जिससे कि वैद्युत ऊर्जा का ह्रास कम हो। इस क्रोड पर वैद्युत रोधी पदार्थ की परत चढ़े ताँबे के पृथक्कृत तारों की अलग-अलग दो कुण्डलियाँ लपेटी जाती हैं। ये कुण्डलियाँ एक-दूसरे अपचायी" से तथा लोहे की क्रोड से पृथक्कृत होती हैं। इन कुण्डलियों में से एक में ताँबे के मोटे तार के कम फेरे होते हैं तथा दूसरी में तांबे के पतले तार के अधिक फेरे होते हैं। इनमें से एक को प्राथमिक कुण्डली एवं दूसरी को द्वितीयक कुण्डली कहते हैं।
कार्यविधि एवं सिद्धान्त-जब ट्रांसफॉर्मर की प्राथमिक कुण्डली को प्रत्यावर्ती धारा स्रोत से जोड़ते हैं तो प्राथमिक कुण्डली में प्रत्यावर्ती वैद्युत धारा प्रवाहित होने लगती है। धारा के प्रत्येक चक्र में क्रोड एक बार एक दिशा में तथा दूसरी बार दूसरी दिशा में चुम्बकित हो जाती है। द्वितीयक कुण्डली भी इसी क्रोड पर लिपटी रहती है, अत: क्रोड के बार-बार चुम्बकन व विचुम्बकन के कारण इससे बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स में निरन्तर परिवर्तन होता रहता है, अत: वैद्युत-चुम्बकीय प्रेरण के कारण द्वितीयक कुण्डली में उसी आवृत्ति का प्रत्यावर्ती वैद्युत वाहक बल उत्पन्न हो जाता है।
माना प्राथमिक एवं द्वितीयक कुण्डली में तार के फेरों की संख्या क्रमश: `N_P` और `N_S` है और प्रत्येक फेरे से बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स क है। माना चुम्बकीय फ्लक्स का क्षरण नगण्य हे तो प्रत्येक कुण्डली के एक फेरे से बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स समान होगा। अत: फैराडे के नियमानुसार -
प्राथमिक कुण्डली में प्रेरित वैद्युत वाहक बल`e_P = -N_P (Delta phi)/(Delta t)`
तथा द्वितीयक कुण्डली में प्रेरित वैद्युत वाहक बल `e_S = - N_S (Delta phi)/(Delta t)`
`(e_S)/(e_P) = N_S/N_P`
यदि प्राथमिक परिपथ का प्रतिरोध नगण्य है, जिससे ऊर्जा का ह्रास नहीं होता तो प्राथमिक कुण्डली में प्रेरित वैद्युत वाहक बल `(e_P)` का मान उसके सिरों पर लगे प्रत्यावर्ती विभवान्तर `(V_P)` के लगभग बराबर होगा। इसी प्रकार यदि द्वितीयक कुण्डली का परिपथ खुला हो तो उसके सिरों के बीच प्रत्यावर्ती विभवान्तर `(V_S)` उसमें प्रेरित वैद्युत वाहक बल `(e_S)` के बराबर होगा। इन परिस्थितियों में
`e_S/e_P = V_S/V_P =N_S/N_P = r`
r को परिणमन अनुपात कहते हैं।
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