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Class 12
PHYSICS
चल कुण्डली धारामापी का सिद्धान्त एवं कार...

चल कुण्डली धारामापी का सिद्धान्त एवं कार्यविधि का वर्णन कीजिए। सुग्राहिता किस प्रकार बढ़ायी जा सकती है ?

लिखित उत्तर

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चल कुण्डली धारामापी का सिद्धान्त - जब धारामापी के सम्बन्धक पेंचो `T_(1)` व `T_(2)` को किसी धारावाही परिपथ में जोड़ते है तो कुण्डली ,में वैधुत धारा बहने लगती है चूँकि कुण्डली चुम्बकीय क्षेत्र में लटकी है, अतः इस पर एक विक्षेपक बल - युग्म कार्य करने लगता है माना किसी क्षण कुण्डली के तल पर अभिलम्ब चुम्बकीय बल क्षेत्र की दिशा से `theta` कोण बनाता है। यदि कुण्डली में फेरों की संख्या N हो, कुण्डली का क्षेत्रफल A हो तो विक्षेपण बलयुग्म का आघूर्ण `tau="NBiA" sintheta`
जहाँ i, कुण्डली में वैधुत दादा है कुण्डली के घूमने से उसको लटकाने वाली पत्ती तथा नीचे के स्प्रिंग में ऐंठन आने लगती है जिसके कारन का विरोध करता है जब ऐंठन बल - युग्म, विक्षेपण बल - युग्म के बराबर हो जाता है तो कुण्डली सन्तुलन की स्थिति में ठहर जाती है
माना कि सन्तुलन की स्थिति में ऐंठन का कोण `phi` रेडियन है यदि ऐंठन बल-युग्म c हो तो `phi` रेडियन के लिए ऐंठन बल-युग्म का आघूर्ण `c phi` होगा कुण्डली की सन्तुलन अवस्था में विक्षेपक बल - युग्म का आघूर्ण = ऐंठन बल - युग्म का आघूर्ण
`NBiA=cphi`
अथवा `i=(c)/(NBA)phi` अथवा `i=Kphi`
जहाँ `K=(-(c)/(NBA))` एक नियतांक है जिसे धारामापी का .धारा परिवर्तन - गुणांक. कहते है
अतः `iprop phi`
अर्थात कुण्डली में प्रवाहित धारा, उत्पन्न विक्षेप के अनुक्रमानुपाती होती है।
कार्यविधि - सबसे पहले क्षैतिजकारी पेंचों के द्वारा धारामापी के आधार को क्षैतिज कर लेते है जिससे कि कुण्डली चुम्बकीय क्षेत्र में स्वतन्त्रतापूर्वक घूम सकें। एक लैम्प से आने वाली प्रकाश की किरणों को कुण्डली से लटकाने वाली पैमाने के शून्यांक पर केन्द्रित कर लेते है | अब नापी जाने वाली वैधुत धारा को सम्बन्धक पेंचो `T_(1)` व `T_(2)` के द्वारा कुण्डली में प्रवाहित कर देते है इससे कुण्डली दर्पण सहित घूमती है तथा पैमाने पर प्रकाश - बिन्दु की स्थिति बदल जाती है।

माना, पैमाने से दर्पण की दूरी D है तथा कुण्डली में `phi` विक्षेव होने पर पैमाने पर प्रकाश - बिन्दु का विस्थापन d होता है।
तब `" "tan2phi=d/D`
यदि `phi` छोटा है, तब `" "tan2phi=2phi`
अतः `" "2phi=d/D" "` अथवा `" "phi=(d)/(2D)`
दूरी d स्थिर (लगभग 1 मीटर) रखी जाती है, अतः उत्पन्न विक्षेप `phi` , विस्थापन d के अनुक्रमानुपाती होता है।
अतः `" "Iprop phi propd`
धारामापी की धारा सुग्राहिता `(i_(S))=(phi)/(i)=(NAB)/(c)`
इस प्रकार धारामापी की धारा सुग्राहिता n, A तथा B का मान बढ़ाकर तथा c का मान कम करके बढ़ाई जा सकती है।
गैवेनोमीटर का वोल्टमीटर में परिवर्तन - (लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर II का प्रश्न 17 देखें। )
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