द्रवसनेही कोलॉइडी पदार्थो के कोलॉइडी विलयन बनाने हेतु किसी विधि की आवश्यकता नहीं होती है क्योकि वे विलायक के सम्पर्क में आकर शीघ्र कोलॉइडी विलयन बना लेते है। द्रव-विरोधी कोलॉइडी विलयन बनाने में निम्नलिखित विधियाँ प्रयुक्त होती है-
(i) परिक्षेपण विधियाँ-इन विधियों में पदार्थ के बड़े आकार वाले कणो को तोड़कर कोलॉइडी आकार में बदला जाता है। इसकी मुख्य विधियाँ निम्नलिखित है-
(a) यांत्रिक परिक्षेपण-इस विधि में पदार्थ को परिक्षेपण माध्यम में निलम्बित करके कोलॉइडी चक्की में पीसकर कोलॉइडी कणो में विभक्त कर लेते है। चक्की के दोनों पात विपरीत दिशाओं में अत्यधिक वेग से (700 चक्कर प्रति मिनट) घूमते है। इस विधि से छापेखाने की स्याही, पेन्ट, वार्निश, टूथपेस्ट आदि बनाये जाते है।
(b) पेप्टीकरण विधि-पेप्टीकरण की विधि स्कन्दन के विपरीत है। इसमें ताजे बने हुए अवक्षेप को किसी विद्युत-अपघट्य के तनु विलयन के साथ हिलाने पर कोलॉइडी विलयन प्राप्त होता है जैसे फेरिक हाइड्रॉक्साइड के ताजे अवक्षेप में फेरिक क्लोराइड का तनु विलयन मिलाने पर लाल रंग का `Fe(OH)_(3)` का कोलॉइडी विलयन बनता है जो एक धनात्मक कोलॉइड का उदाहरण है।
(c) विद्युत परिक्षेपण या ब्रेडिग आर्क विधि-इस विधि द्वारा सोना, सिल्वर और प्लैटिनम आदि धातुओं के कोलॉइडी विलयन बनाये जाते है। इसमें धातु की दो छड़ो को बर्फ से ठण्डा किये गए क्षार मिश्रित पानी में डुबोते है और विद्युत प्रवाहित करते है। छड़ो के बीच विद्युत आर्क उत्पन्न करने से धातु और जल की वाष्प बनती है जो ऊपर संघनित होकर कोलॉइडी विलयन बनाती है, जिसमे धातु के कण जल में परिक्षिप्त रहते है और धातु का कोलॉइडी विलयन (सॉल) बन जाता है।
(ii) संघनन विधियाँ- इस विधि में पदार्थ के छोटे आकार के कणो को मिलाकर कोलॉइडी आकार के कण बनाकर कोलॉइडी विलयन (सॉल) बनाते हे। इसके अन्तर्गत निम्नलिखित विधियाँ है-
(a) विलायक बदलकर- इससे फीनॉलफ्थेलिन जैसे पदार्थो का जल में कोलॉइडी विलयन बनाया जाता है।
(b) विलयन में वाष्प प्रवाहित करके- इससे सल्फर जैसे पदार्थो के कोलॉइडी विलयन बनाए जाते है।
(c) अत्यधिक ठण्डा करके- इससे आइसक्रीम जैसे कोलाइड तैयार किए जाते है।
(iii) रासायनिक विधियाँ- इनसे विभिन्न प्रकार के कोलॉइडी पदार्थो के कोलॉइडी विलयन प्राप्त किए जाते है जो मुख्यता रासायनिक क्रियाओं पर आधारित है।
(a) ऑक्सीकरण विधि- इससे सल्फर और आयोडीन आदि अधातु तत्वों के कोलॉइडी विलयन प्राप्त करते है। `HNO_(3)` और `H_(2)SO_(4)` आदि में `H_(2)S` प्रवाहित करने पर सल्फर का पीला कोलॉइडी विलयन प्राप्त होता है।
`H_(2)S+2HNO_(3)rarr2NO_(2)uarr+2H_(2)O+Sdarr`
(b) जल-अपघटन विधि-`FeCl_(3)` के जलीय विलयन को उबालने पर `Fe(OH)_(3)` का भूरा कोलॉइडी विलयन प्राप्त हो जाता है। अतः इस विधि से धातु के हाइड्रॉक्साइड सॉल प्राप्त किए जाते है।
`FeCl_(3)+3H_(2)OrarrFe(OH)_(3)+3HCl`
(c) अपचयन विधि- इसमें धातु के लवण के विलयन में कोई अपचायक मिलाने पर धातु का कोलॉइडी विलयन बनता है। इस विधि से आदि धातुओं के सॉल बनाए जाते है। बबूल की गोंद की कुछ मात्रा स्थायीकारक का कार्य करती है। गोल्ड कोलाइड विलयन का स्टैनस कोलाइड द्वारा अपचयन करने पर गोल्ड सॉल (बैंगनी) प्राप्त होता है। इसे कासियस-पर्पिल (अथवा पर्पिल ऑफ कॉसियस) भी कहा जाता है।
`2AuCl_(3)+3SnCl_(2)rarrunderset("(बैंगनी सॉल)")(2Audarr)+3SnCl_(4)`
(d) उभय-अपघटन विधि- इस विधि से धातुओं जैसे आर्सेनिक ऑक्साइड के विलयनों में `H_(2)S` गैस प्रवाहित करने पर धात्विक सल्फाइड (आर्सेनियस सल्फाइड) के कोलॉइडी विलयन बनते है।
`As_(2)O_(3)+3H_(2)Srarrunderset(("पीला सॉल"))(As_(2)S_(3))darr+3H_(2)O`
अतः इस विधि से धातु सल्फाइडो के कोलॉइडी सॉल प्राप्त किए जाते है।