s-ब्लॉक व p-ब्लॉक के तत्वों के मध्य में स्थित वे तत्व जिनमें अन्तिम इलेक्ट्रॉन बाह्यतम कोश से पहले कोश अर्थात् (n-1) कोश के d-उपकोश में भरे जाते हों, d-लॉक के तत्व कहलाते है। इन दोनों `s^(-)` व p-ब्लॉक के तत्वों के गुणों के मध्यवर्ती गुणों के रखने के कारण ही d-ब्लॉक के तत्वों को संक्रमण तत्व कहते हैं। ये तत्व आवर्त सारणी के चौथे, पाँचवे, छठे तथा सातवें आवर्त के वर्ग 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11 व 12 में रखे गए हैं।
1. अन्तराकाशी यौगिकों का बनना
संक्रमण धातुओं के क्रिस्टल में परमाणुओं के निकटतम रूप में व्यवस्थित होने के बाद भी, इनके मध्य छोटे-छोटे रिक्त स्थान शेष रह जाते हैं जिन्हें अन्तराकाश कहते हैं। इन अन्तराकाशों में छोटे-छोटे अधातु परमाणु जैसे H, B, C, N आदि स्थान ग्रहण कर लेते हैं और इनके साथ धातु परमाणु आबन्ध बना लेते हैं। इस प्रकार के यौगिकों को अन्तराकाशी यौगिक कहते हैं। इन यौगिकों का संघटन अघानु तथा धातु परमाणुओं की त्रिज्या के अनुपात पर निर्भर करता है। इन यौगिकों में संक्रमण धातु की आघातवर्धनीयता और तन्यता कम हो जाती है परन्तु प्रबलता, कठोरता, विद्युत चालकता, गलनांक व क्वथनांक बढ़ जाते हैं। उदाहरण के लिए स्टील तथा ढलवा लोहे में अन्तराकाशीय स्थानों में पिंजरित (trapped) कार्बन की उपस्थिति के कारण ये कठोर होते हैं।
2. रंगीन (वर्णक) आयन का बनना
संक्रमण धातुओं के अधिकांशत: यौगिक ठोस अवस्था में या जलीय विलयन में रंगीन (वर्णक) होते है। यह गुण s- तथा p -ब्लॉकों के यौगिक से भिन्न होता है। संक्रमण धातुओं के यौगिकों और आयनों का रंगीन होना उनका एक विशिष्ट गुण है। वे आयन अथवा यौगिक जिनमें धातु के (n-1) कोश के d-उपकोश अपूर्ण होते हैं अर्थात् जिनमें d-उपकोश में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं, वे ही प्राय: रंगीन होते हैं।
संक्रमण धातुओं के यौगिकों का रंग मुख्य रूप से निम्नलिखित दो कारणों से होता है--
1. इलेक्ट्रॉनों के dd संक्रमण (d-d transitions of electrons)-विलगित (isolated) अवस्था में पाँचों d.कक्षकों की ऊर्जा समान होती है अतः इन्हें समभ्रंश कक्षक कहते हैं। इस दशा में d-d संक्रमण होने के लिए कोई ऊर्जा आवश्यक नहीं होगी। धातु आयनों के द्वारा संकुल यौगिक बनाने पर या विलायकों में उपस्थित होने से विलायक संकरण (यदि विलायक जल हो तो जलयोजन), किसी उदासीन लिगेण्ड जैसे `H_(2)O` या ऋणायनिक लिगैंण्ड की उपस्थिति में जल के साथ संकुल आयन बनने पर d-कक्षकों की समभ्रंशता (समान ऊर्जा) (degeneracy) समाप्त हो जाती है और कुछ कक्षकों की ऊर्जा उच्च और कुछ की कम हो जाती है तथा इलेक्ट्रॉन कम ऊर्जा वाले कक्षक में चला जाता है तो उत्तेजन ऊर्जा, दृश्य क्षेत्र से प्रकाश के अवशोषण से ली जाती है। अत: ये दो समूहों में विभक्त हो जाते हैं इसे क्रिस्टल क्षेत्र विघटन/विपाटन कहते हैं। d-कक्षकों का विभक्त होना यौगिक/संकुलों की ज्यामितीय पर निर्भर करता है जैसे अष्टफलकीय आकृति वाले संकुल d-कक्षकों का विभक्त होना निम्न प्रकार से है-
उच्च ऊर्जा वाले कक्षकों `(d_(x^(2)-y^(2)),d_(z^(2)))` को `e_(g)` और निम्न ऊर्जा वाले कक्षकों (`d_(xy),d_(yz),d_(zx)`) को `t_(2g)` कहते हैं। अब d-d. संक्रमण सम्भव है। कम ऊर्जा वाला `t_(2g)` कक्षक का इलेक्ट्रॉन ऊर्जा (`Delta E`) ग्रहण करके `e_(g)` कक्षक में स्थानान्तरित हो जाएगा, जिसके लिए आवश्यक ऊर्जा प्रकाश के दृश्य क्षेत्र की किसी तरंगदैर्ध्य को अवशोषित करके ली जाएगी। इसमें जिस रंग की तरंगदैर्घ्य का अवशोषण होता है, प्रेक्षित रंग उसका पूरक रंग होता है तथा अवशोषित प्रकाश की तरंगदैर्घ्य का निर्धारण लिगेण्ड के प्रकृति के आधार पर किया जाता है। इसी आधार पर, संक्रमण धातुओं के संकुल आयनों या यौगिकों का रंगीन होना स्पष्ट किया जा सकता है। यदि किसी. धातु आयन के d-कक्षकों में इलेक्ट्रॉनों के d-d-संक्रमण की संभावना नहीं हो तो उस धातु आयन से बना संकुल या यौगिक रंगहीन होगा।
II. आवेश स्थानान्तरण स्पेक्ट्रा (Charge transfer spectra)-
आवेश स्थानान्तरण के कारण भी संक्रमण धातुओं के यौगिक रंगीन होते हैं इनमें लिगेण्ड अणुओं/आयनों के कक्षकों से इलेक्ट्रॉन धातु आयनों पर स्थानान्तरित हो जाते हैं। इस संक्रमण से भी इलेक्ट्रॉन प्रकाश के दृश्य क्षेत्र से ऊर्जा का अवशोषण करते हैं अतः यौगिक रंगीन होते हैं। dd संक्रमण की तुलना में आवेश स्थानान्तरण से उत्पन्न रंग अधिक गहरे होते हैं तथा आवेश स्थानान्तरण की संभावना तभी होती है जब धातु आयन पर आवेश अधिक हो। धातु आयन पर आवेश की मात्रा बढ़ने से रंग भी गहरे होते जाते हैं, जैसे- `Ti_(4+), Vi^(5+), Cr^(6+)` तथा `Mn^(7+)` आयनों में `3d^(0)` इलेक्ट्रॉनिक विन्यास हैं अतः इनमें d-d संक्रमण की कोई सम्भावना नहीं है। इनमें `Ti^(4+)` के संकुल रंगहीन होते हैं, परन्तु अधिक आवेश वाले अन्य आयन लिगेण्ड से इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने की क्षमता रखते हैं। अतः इनमें आवेश स्थानान्तरण हो जाता है। अतः `T^(4+)`-रंगहीन, `V^(5+)`-नारंगी-पीला, `Cr^(6+)`-नारंगी , `Mn^(7+)`-गहरा बैंगनी रंग प्रदर्शित करते हैं।