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Class 12
CHEMISTRY
वर्नर के सिद्धान्त को समझाइए। यदि [Co (N...

वर्नर के सिद्धान्त को समझाइए। यदि `[Co (NH_3)_5 CI]CI_2` को जल-अपघटित किया जाए तो कितने आयन बनेंगे?

लिखित उत्तर

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वर्नर का उपसहसंयोजन यौगिकों का सिद्धान्त
संकुल यौगिकों की संरचना को समझाने के लिए वर्नर ने सन् 1893 में एक सिद्धान्त प्रतिपादित किया। इस सिद्धान्त की प्रमुख अभिगृहीतियाँ निम्नलिखित हैं -
(i) धातुओं की निम्नलिखित दो प्रकार की संयोजकताएँ होती हैं-
(a) प्राथमिक संयोजकता या आयनिक संयोजकता-यह सरल लवणों में धातु की संयोजकता या ऑक्सीकरण अवस्था है जो केवल ऋणात्मक आयनों द्वारा ही सन्तुष्ट होती है, यह आयनन योग्य तथा अदिशात्मक होती है। जिसे बिन्दु रेखा [dotted line (..........)] से व्यक्त करते हैं।
(b) द्वितीयक संयोजकता या नॉन-आयनिक या अतिरिक्त संयोजकता-यह संकुल यौगिकों में धातु की उपसहसंयोजन संख्या है जो केवल ऋणात्मक आयनों या उदासीन अणुओं तथा कभी-कभी धनात्मक समूहों द्वारा सन्तुष्ट होती है। यह आयनन योग्य नहीं होती है, इसे सतत रेखा [continuous line (-)] द्वारा व्यक्त करते हैं। यह दिशात्मक होती है। अत: संकुल की ज्यामिति को निर्धारित करती है।
(ii) प्रत्येक संकुल यौगिक में एक या अधिक केन्द्रीय धातु परमाणु होते हैं जिससे उदासीन अणु या ऋणायन उपसहसंयोजन बन्ध के द्वारा जुड़े रहते हैं। यह उदासीन अणु या ऋणायन लिगेण्ड तथा इनके द्वारा बनाए गए कुल उपसहसंयोजन बन्धों की संख्या उपसहसंयोजन (समन्वय) संख्या (coordination number) कहलाती है। वह परिसर जिसमें केन्द्रीय धातु परमाणु तथा लिगेण्ड होते हैं, उपसहसंयोजन परिसर (coordination sphere) कहलाता है। इसे बड़े कोष्ठक के द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।
(iii) प्रत्येक धातु अपनी प्राथमिक व द्वितीयक संयोजकताओं को सन्तुष्ट करता है। प्राथमिक संयोजकताएँ ऋणायनों के द्वारा तथा द्वितीयक संयोजकताएँ ऋणायनों या उदासीन अणुओं के द्वारा सन्तुष्ट होती हैं। कभी-कभी ऋणायन प्राथमिक व द्वितीयक दोनों प्रकार की संयोजकताओं को सन्तुष्ट करता है। इस प्रकार कुछ ऋणायन आयनिक द्विक (dual) प्रकृति दर्शा सकते हैं। ये ऋणायन विलयन में आयनित नहीं होते हैं।
(iv) जब संकुल यौगिक को जल में घोला जाता है तो प्राथमिक संयोजकता से जुड़े ऋणायन आयनित हो जाते हैं, जबकि द्वितीयक संयोजकताएँ अनआयनित रहती हैं।
(v) प्राथमिक संयोजकताएँ अदिशात्मक, जबकि द्वितीयक संयोजकताएँ दिशात्मक होती हैं। सहसंयोजक यौगिकों की ज्यामिती द्वितीयक संयोजकताओं के विन्यास से निर्धारित होती है।
(vi) द्वितीयक संयोजकताओं से जुड़े लिगण्डों को विभिन्न प्रकार से अन्तराकोश में व्यवस्थित किया जा सकता है जिसके कारण भिन्न-भिन्न । विन्यास होता है। अत: ये यौगिक त्रिविम समावयवता प्रदर्शित करते हैं।
`[Co(NH_3)_5CI]Cl_2` को जल-अपघटित करने पर यह निम्न प्रकार । अपघटित होकर तीन आयन बनाता है -
`[Co(NH_3)_5Cl] Cl_2 iff [Co(NH_3)_5Cl]^(2+) + 2Cl^(-)`
दिए गए यौगिकों के IUPAC नाम- `K_3 [Co(NO_2)_6] व Fe_4 [Fe(CN)_6]_3` के IUPAC नाम क्रमशः पोटैशियम हैक्सानाइट्रोकोबाल्टेट(III) व आयरन(III) हैक्सासायनोफैरेट(I)। `[Cu(NH_3)_4]SO_4` = टेट्राऐम्मीनकॉपर(II) सल्फेट
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