हैलोऐल्केन की किसी प्रतिस्थापन अभिक्रिया की क्रियाविधि लिखिए तथा क्लोरोबेन्जीन से DDT बनाने का रासायनिक समीकरण भी लिखिए ।
हैलोऐल्केन की किसी प्रतिस्थापन अभिक्रिया की क्रियाविधि लिखिए तथा क्लोरोबेन्जीन से DDT बनाने का रासायनिक समीकरण भी लिखिए ।
लिखित उत्तर
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हैलोएल्केन की प्रतिस्थापन अभिक्रियां - हैलोएल्केन के C- X बंध के कार्बन परमाणु पर आंशिक धनवेश होता है। क्योकि इसमें अधिक विधुतऋणात्मक हैलोजन परमाणु उपस्थित है। अंत: इलेक्ट्रॉन भूल स्पीशीज जैसे नाभिकस्नेही हैलोएल्केन के इसी कार्बन परमाणु पर आक्रमण करता है। आक्रमणकारी नाभिकारगी के हैलाइड आयन की अपेक्षा प्रबल होने पर नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन होता है तथा हैलाइड आयन, प्रबल नाभिकारगी के द्वारा विस्थापित हो जाता है।
`underset("हैलोएल्केन")(overset(delta+)(R )-overset(delta-)(X)) + underset("आक्रमणकारी नाभिकारगी")(Nu^(-)) rarr underset("उत्पाद")(R-Nu) + underset(underset("हैलाइड आयन")("निष्कासित"))(X^(-))`
अंत: हैलोएल्केन नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया दर्शाते है । इनमे नाभिक स्नेही प्रतिस्थापन दो भिन्न क्रियाविधियों द्वारा देखा जाता है, जिनका वर्णन निम्नवत है-
(i) एकान्विक नाभिकस्नेही (या नाभिकारगी) प्रतिस्थापन `(S_(N)1)` अभिक्रिया - वह नाभिकारगी प्रतिस्थापन अभिक्रिया, जिसकी दर केवल हैलोएल्केन के सांद्रण पर निर्भर करती है तथा हाइड्रॉक्साइड आयन (नाभिकारगी) के सांद्रण पर नहीं करती, एकवनिक नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया कहलाती है। दर = K [हैलोएल्केन]
यह अभिक्रिया सामान्यतया ध्रुवीय प्रतीक विलायकों जैसे जल, ऐल्कोहॉल, एसिटिक अम्ल आधी में करायी जाती है तथा इसे सामान्यतया `3^(@)` ऐल्किल हैलाइड दर्शाते है।
क्रियाविधि - इस अभिक्रिया में निम्नलिखित दो पद सम्मिलित होते है-
पद 1 मध्यवर्ती कार्बोधनयं का निर्माण- प्रथम पद में हैलोएल्केन का C-X बंध आयनित होकर ध्रुवीय कार्बोधनयं तथा एक हैलाइड आयन बनाता है। यह एक मंद पद है अंत: अभिक्रिया की दर इसी पद पर निर्भर करती है। C-X बंध के विदलन हेतु आवश्यक ऊर्जा हैलाइड आयन के ध्रुवीय विलयक के प्रोटॉन द्वारा विलयकयोजन द्वारा प्राप्त होती है।
कार्बोधनायन का स्थायित्व जितना अधिक होगा, उतनी ही सरलता से यह हैलोएल्केन से निर्मित हो जाएगा तथा अभिक्रिया की दर भी उतनी ही अधिक होगी। कार्बोधनें के स्थायित्व का क्रम `3^(@) gt 2^(@) gt 1^(@)` होता है। अंत: `3^(@)` ऐल्किल हैलाइड सरलता से `S_(N)1` अभिक्रिया दर्शाते है।
यह एक उत्क्रमणीय पद है।
पद 2 `Nu^(ө)` के कार्बोधनायन पर आक्रमण द्वारा उत्पाद का निर्माण - नाभिकारगी `(Nu^(-))`, समतल कार्बोधनायन पर आक्रमण करके उत्पाद निर्मित करता है । यह एक टिव पद है अंत: `Nu^(-)` की सांद्रता, अभिक्रिया बलगतिकी में सम्मिलित नहीं होती है।
यदि इसमें प्रयुक्त ऐल्किल हैलाइड प्रकाशिक सक्रिय हो तब नाभिकस्नेही, समतल कार्बोधनायन के दोनों ओर से आक्रमण कर सकता है, परिणामस्वरूप अभिविन्यास में अधिधारण तथा अभिविन्यास का प्रतिलोमन दोनों होते है।
(ii) द्विआणविक नाभिकारगी प्रतिस्थापन `(S_(N)2)` अभिक्रिया - वे नाभिकस्नेही (नाभिकारगी) प्रतिस्थापन अभिक्रियाएं जो केवल एक पद में सप्मानन होती है अंत: जिनकी दर हैलोएल्केन तथा नाभिकारगी दोनों की सांद्रता पर निर्भर करती है, `S_(N)2` अभिक्रियाएँ कहलाती है। दर= K [हेलोएल्केन] `[Nu^(-)]`
क्रियाविधि - यह केवल एक पद वाली अभिक्रिया है तथा इसमें संक्रमण अवस्था सम्मिलित होती है। इस अभिक्रिया में आने वाला (आक्रमणकारी) नाभिकस्नेही हैलोएल्केन से इस प्रकार अन्योन्यक्रिया करता है जिससे C-X बंध विदलित हो जाता है तथा एक नया C-Nu बंध निर्मित होता है। ये दोनों प्रक्रम एक ही पद में एक साथ सम्पन्न होते है तथा कोई मध्यवर्ती नहीं बनता है ।
उपर्युक्त से स्पष्ट है की अभिक्रिया की प्रगति के साथ C-Nu बंध निर्मित होना प्रारम्भ हो जाता है तथा कार्बन एवं निष्कासित समूह के मध्य का बंध दुर्बल होने लगता है जैसे ही ऐसा होता है कार्बन (जिस पर आक्रमण किया जाता है) का अभिविन्यास इस प्रकार प्रतिलोमित हो जाता है जैसे तेज हवा में छाता उल्ट जाता है, जबकि निष्काषित समूह बाहर निकल जाता है। यह प्रक्रम अभिविन्यास का प्रतिलोमन कहलाता है।
संक्रमण अवस्था में कार्बन परमाणु आने वाले नाभिक स्नेही तथा बाहर निकलने वाले हैलोजन दोनों से एकसाथ जुड़ा होता है। यह संरचना अत्यधिक अस्थायी होने के कारण पृथक नहीं की जा सकती।
चूँकि इस क्रिया में निष्कासित समूह रखने वाले कार्बन (C) पर `Nu^(-)` आक्रमण करता है अंत: इस कार्बन पर या इसके निकट भारी प्रतिस्थापियो की उपस्थिति त्रिविम बाधा उत्पन्न करती है। सरल हैलोएल्केनो में से, मैथिल हैलाइड शीघ्रता से `S_(N)2` अभिक्रिया दर्शाते है क्योकि इनमे कार्बन परमाणु तीन हल्के हाइड्रोजन परमाणुओ से बाधित होता है । तृतीयक `(3^(@))` हैलोएल्केन `S_(N)2` अभिक्रिया के प्रति कम सक्रिय होते है क्योकि इसमें उपस्थित भारी समूह नाभिकस्नेही के आक्रमण को बाधित कर देते है ।
`S_(N)2` अभिक्रिया के प्रति विभिन्न हैलोएल्केनो की क्रियाशीलता का क्रम है-
`1^(@)` हैलोएल्केन `gt 2^(@)` हैलोएल्केन `gt 3^(@)` हैलोएल्केन
`underset("हैलोएल्केन")(overset(delta+)(R )-overset(delta-)(X)) + underset("आक्रमणकारी नाभिकारगी")(Nu^(-)) rarr underset("उत्पाद")(R-Nu) + underset(underset("हैलाइड आयन")("निष्कासित"))(X^(-))`
अंत: हैलोएल्केन नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया दर्शाते है । इनमे नाभिक स्नेही प्रतिस्थापन दो भिन्न क्रियाविधियों द्वारा देखा जाता है, जिनका वर्णन निम्नवत है-
(i) एकान्विक नाभिकस्नेही (या नाभिकारगी) प्रतिस्थापन `(S_(N)1)` अभिक्रिया - वह नाभिकारगी प्रतिस्थापन अभिक्रिया, जिसकी दर केवल हैलोएल्केन के सांद्रण पर निर्भर करती है तथा हाइड्रॉक्साइड आयन (नाभिकारगी) के सांद्रण पर नहीं करती, एकवनिक नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया कहलाती है। दर = K [हैलोएल्केन]
यह अभिक्रिया सामान्यतया ध्रुवीय प्रतीक विलायकों जैसे जल, ऐल्कोहॉल, एसिटिक अम्ल आधी में करायी जाती है तथा इसे सामान्यतया `3^(@)` ऐल्किल हैलाइड दर्शाते है।
क्रियाविधि - इस अभिक्रिया में निम्नलिखित दो पद सम्मिलित होते है-
पद 1 मध्यवर्ती कार्बोधनयं का निर्माण- प्रथम पद में हैलोएल्केन का C-X बंध आयनित होकर ध्रुवीय कार्बोधनयं तथा एक हैलाइड आयन बनाता है। यह एक मंद पद है अंत: अभिक्रिया की दर इसी पद पर निर्भर करती है। C-X बंध के विदलन हेतु आवश्यक ऊर्जा हैलाइड आयन के ध्रुवीय विलयक के प्रोटॉन द्वारा विलयकयोजन द्वारा प्राप्त होती है।
कार्बोधनायन का स्थायित्व जितना अधिक होगा, उतनी ही सरलता से यह हैलोएल्केन से निर्मित हो जाएगा तथा अभिक्रिया की दर भी उतनी ही अधिक होगी। कार्बोधनें के स्थायित्व का क्रम `3^(@) gt 2^(@) gt 1^(@)` होता है। अंत: `3^(@)` ऐल्किल हैलाइड सरलता से `S_(N)1` अभिक्रिया दर्शाते है।
यह एक उत्क्रमणीय पद है।
पद 2 `Nu^(ө)` के कार्बोधनायन पर आक्रमण द्वारा उत्पाद का निर्माण - नाभिकारगी `(Nu^(-))`, समतल कार्बोधनायन पर आक्रमण करके उत्पाद निर्मित करता है । यह एक टिव पद है अंत: `Nu^(-)` की सांद्रता, अभिक्रिया बलगतिकी में सम्मिलित नहीं होती है।
यदि इसमें प्रयुक्त ऐल्किल हैलाइड प्रकाशिक सक्रिय हो तब नाभिकस्नेही, समतल कार्बोधनायन के दोनों ओर से आक्रमण कर सकता है, परिणामस्वरूप अभिविन्यास में अधिधारण तथा अभिविन्यास का प्रतिलोमन दोनों होते है।
(ii) द्विआणविक नाभिकारगी प्रतिस्थापन `(S_(N)2)` अभिक्रिया - वे नाभिकस्नेही (नाभिकारगी) प्रतिस्थापन अभिक्रियाएं जो केवल एक पद में सप्मानन होती है अंत: जिनकी दर हैलोएल्केन तथा नाभिकारगी दोनों की सांद्रता पर निर्भर करती है, `S_(N)2` अभिक्रियाएँ कहलाती है। दर= K [हेलोएल्केन] `[Nu^(-)]`
क्रियाविधि - यह केवल एक पद वाली अभिक्रिया है तथा इसमें संक्रमण अवस्था सम्मिलित होती है। इस अभिक्रिया में आने वाला (आक्रमणकारी) नाभिकस्नेही हैलोएल्केन से इस प्रकार अन्योन्यक्रिया करता है जिससे C-X बंध विदलित हो जाता है तथा एक नया C-Nu बंध निर्मित होता है। ये दोनों प्रक्रम एक ही पद में एक साथ सम्पन्न होते है तथा कोई मध्यवर्ती नहीं बनता है ।
उपर्युक्त से स्पष्ट है की अभिक्रिया की प्रगति के साथ C-Nu बंध निर्मित होना प्रारम्भ हो जाता है तथा कार्बन एवं निष्कासित समूह के मध्य का बंध दुर्बल होने लगता है जैसे ही ऐसा होता है कार्बन (जिस पर आक्रमण किया जाता है) का अभिविन्यास इस प्रकार प्रतिलोमित हो जाता है जैसे तेज हवा में छाता उल्ट जाता है, जबकि निष्काषित समूह बाहर निकल जाता है। यह प्रक्रम अभिविन्यास का प्रतिलोमन कहलाता है।
संक्रमण अवस्था में कार्बन परमाणु आने वाले नाभिक स्नेही तथा बाहर निकलने वाले हैलोजन दोनों से एकसाथ जुड़ा होता है। यह संरचना अत्यधिक अस्थायी होने के कारण पृथक नहीं की जा सकती।
चूँकि इस क्रिया में निष्कासित समूह रखने वाले कार्बन (C) पर `Nu^(-)` आक्रमण करता है अंत: इस कार्बन पर या इसके निकट भारी प्रतिस्थापियो की उपस्थिति त्रिविम बाधा उत्पन्न करती है। सरल हैलोएल्केनो में से, मैथिल हैलाइड शीघ्रता से `S_(N)2` अभिक्रिया दर्शाते है क्योकि इनमे कार्बन परमाणु तीन हल्के हाइड्रोजन परमाणुओ से बाधित होता है । तृतीयक `(3^(@))` हैलोएल्केन `S_(N)2` अभिक्रिया के प्रति कम सक्रिय होते है क्योकि इसमें उपस्थित भारी समूह नाभिकस्नेही के आक्रमण को बाधित कर देते है ।
`S_(N)2` अभिक्रिया के प्रति विभिन्न हैलोएल्केनो की क्रियाशीलता का क्रम है-
`1^(@)` हैलोएल्केन `gt 2^(@)` हैलोएल्केन `gt 3^(@)` हैलोएल्केन