Home
Class 11
BIOLOGY
निम्नलिखित संरचनाओं का संक्षेप में वर्णन...

निम्नलिखित संरचनाओं का संक्षेप में वर्णन कीजिए-
(अ) मस्तिष्क (ब) नेत्र (स) कर्ण -

लिखित उत्तर

Verified by Experts

(अ) मस्तिष्क-यह करोटी के कपाल में स्थित होता है। इसके चारों ओर तीन झिल्लिया पायी जाती है। जिन्हें मस्तिकावरण कहते हैं । मस्तिष्क को अग्र मस्तिष्क, मध्य मस्तिष्क व पश्च मस्तिष्क में विभेदित किया जा सकता है। अग्र मस्तिष्क को पुनः प्राण मस्तिष्क, प्रमस्तिष्क एवं अग्रमस्तिष्क पश्च में विभेदित कर सकते है। मध्य मस्तिष्क क्रूरा सेरिब्राई व कॉर्पोरा क्वाड्रीजेमिना से मिलकर बना होता है। पश्च मस्तिष्क के तीन मुख्य भाग होते हैं- अनुमस्तिष्क, पोन्स एवं मेड्युला ऑब्लांगेटा। मस्तिष्क में पायी जाने वाली गुहा को वेन्ट्रीकल कहते हैं। इसके चारों ओर धूंसर द्रव्य व श्वेत द्रव्य नामक दो स्तर पाये जाते हैं। श्वेत द्रष्य मज्जायुक्त तन्त्रिका तन्तुओं का एवं धूसर द्रव्य मज्जारहित तन्त्रिका तन्तुओं से बना होता है। मस्तिष्क शरीर के विभिन्न भागों का नियमन एवं नियन्त्रण करता है।
(ब) नेत्र-यह एक प्रकाश संवेदांग होता है। नेत्र कोटारों में स्थित होते हैं। नेत्र गोलक का 4/5 भाग नेत्र कोटर में एवं 1/5 भाग बाहर निकला रहता है। नेत्र गोलक पर एक जोड़ी गतिशील पलके पायी जाती है। प्रत्येक नेत्र के बाहरी किनारे पर 3-3 के समूह में अश्रु ग्रन्थियाँ पायी जाती है। नेत्र गोलक को इधर-उधर घुमाने का कार्य छ: नेत्र पेशी समूहों द्वारा किया जाता है। नेत्र गोलक में तीन स्तर पाये जाते हैं। ये स्तर बाहर से अन्दर की ओर क्रमश: दृढ़ पटल, रक्तक पटल व दृष्टि पटल होते हैं। दृढ पटल का 1/5 बाह्य उभरा हुआ व पारदर्शी भाग कॉर्निया कहलाता है। रक्तक पटल की कोशिकाकाओं में मैलेनिन नामक वर्णक पाया जाता है। इसका फूला हुआ पेशीय भाग सिलियरी काय कहलाता है। सिलियरी काय से निकले निलम्बन रज्जुओं द्वारा नेत्र का लेन्स नेत्र गोलक की गुहा में सधा रहता है। सिलियरी काय के आगे की ओर आइरिस या परितारिका नामक रचना बनती है। आइरिस के मध्य में पाये जाने वाले छिद्र को पुतली या तारा कहते हैं। दृष्टि पटल या रेटिना को रंगास्तर व संवेदी स्तर में विभेदित कर सकते हैं। संवेदी स्तर में श्लाका व शंकु कोशिकाएँ तथा न्यूरॉन पायी जाती है।
(स) कर्ण-कर्ण मनुष्य का श्रवण-संतुलन अंग होता है। इसे बाह्य कर्ण, मध्य कर्ण एवं अन्तः कर्ण में विभेदित किया जा सकता है। बाह्य कर्ण मुख्य रूप से कर्ण पल्लव व बाह्य कर्ण कुहर में विभेदित होता है। बाह्य कर्ण कुहर के अन्दर की ओर अन्त में एक झिल्ली लगी होती है। जिसे कर्ण पट्ट या टिम्पेनिक झिल्ली कहते हैं। मध्य कर्ण की गुहा में तीन कर्ण अस्थिकाएँ (क्रमशः मैलियस, इन्कस व स्टेपीज) पायी जाती है। मध्य कर्ण की गुहा यूस्टेकियन नलिका द्वारा ग्रसनी क्षेत्र में खुलती है। अन्त:कर्ण कला गहन व अस्थिल गहन से बना होता है। कला गहन कोमल व अर्धपारदर्शी झिल्ली की बनी एक कुण्डलित रचना होती है। इसे सेकुलस, यूट्रीकुलस, अर्द्धवृत्ताकार नलिकाओं व कॉक्लियों में विभेदित किया जा सकता है। कला गहन व अस्थिल गहन के बीच परिलसिका गुहा में परिलसिका द्रव पाया जाता है तथा कला गहन के अन्दर की ओर अन्तः लसिका द्रव होता है। कला गहन में मेक्यूली व कॉर्टी का अंग नामक रचनाएँ क्रमशः संतुलन व सुनने में मदद करती है।
Promotional Banner