मान लें कि एक सरल लोलक एक दृढ़ आधार S पर लटका हुआ है तथा SO उसकी साम्यावस्था की स्थिति है। जब इसे A स्थिति तक विस्थापित किया जाता है, जहाँ यह विरामावस्था में होता है। इस स्थिति A पर उसमें स्थितिज ऊर्जा mgh तथा गतिज ऊर्जा शुन्य होती है, अत: कुल ऊर्जा mgh होती है।
जब गोलक A से O की ओर गति करता है तो गुरुत्व बल के प्रभाव में इसका वेग बढ़ता जाता है, फलस्वरूप गतिज ऊर्जा बढ़ती जाती है तथा ऊँचाई घटने के कारण उतनी ही मात्रा में स्थितिज ऊर्जा घटती जाती है किन्तु गतिज ऊर्जा व स्थितिज ऊर्जा का योग mgh ही बना रहता है। जब गोलक साम्यावस्था की स्थिति 0 पर पहुँचता है इसका वेग `v_"max"` अधिकतम हो जाने से गतिज ऊर्जा `1/2mv_"max"^2` अधिकतम हो जाती है। और माध्य स्थितिज के सापेक्ष ऊँचाई शून्य हो जाने से स्थितिज ऊर्जा शून्य हो जाती है किन्तु कुल ऊर्जा अभी भी mgh के बराबर नियत बनी रहती है क्योंकि `1/2mv_"max"^2` का मान mgh के बराबर होता है। जब गोलक स्थिति O से सीमांत स्थिति B की ओर गुरुत्व बल के विरुद्ध गति करता है तो उसका वेग घटता जाता है। फलत: गतिज ऊर्जा घटती जाती है और स्थितिज ऊर्जा उतनी ही मात्रा में बढ़ती जाती है, जिससे पुनः कुल ऊर्जा नियत बनी रहती है।
जब गोलक सीमांत स्थिति B पर पहुँचता है तो पुनः माध्य स्थिति के सापेक्ष h ऊँचाई उठ जाता है तथा उसका वेग शून्य हो जाता है और स्थिति A की भांति स्थितिज ऊर्जा mgh व गतिज ऊर्जा O होती है तथा B से वापस लौटने पर उसी प्रकार ऊर्जा परिवर्तन होता है जैसे AOB पथ पर होता है किन्तु प्रत्येक स्थिति में कुल ऊर्जा संरक्षित रहती है।
गोलक कुछ समय बाद विराम स्थिति में इसलिए आ जाता है कि वायु प्रतिरोध के कारण धीरे-धीरे उसकी ऊर्जा समीपवर्ती वातावरण को स्थानांतरित हो जाती है किन्तु कुल ऊर्जा अन्य रूप में रुपांतरित होकर भी संरक्षित रहती है, संरक्षण नियम का उल्लंघन नहीं होता है।