मान लें कि द्रव्यमान m एवं लम्बाई का एक आदर्श सरल लोलक अपनी ऊर्ध्व स्थिति से अधिकतम .कोण बनाते हुए माध्य स्थिति के इर्द गिर्द दोलन कर रहा है। किसी मध्यवर्ती स्थिति (OB) पर यह माध्य स्थिति (OC) के साथ `theta` कोण बना रहा है। निर्देश स्तर निम्नतम बिन्दु C पर तथा चरम उच्चतम स्तर बिन्दु A पर है, जैसा कि चित्र में दर्शाया गया है।
यहां `h = 1-1 costheta_(0)` .
या `h_(0) =l(1- cos theta_(0))`
तथा `h = l - l cos theta`
या `h=l(1- cos theta)`
सरल लोलक बिन्दु A की स्थिति से छोड़ा जाता है, जहां उसका प्रारम्भिक वेग u=0 होता है।`therefore` चरम स्थिति बिन्दु A पर - गतिज ऊर्जा
`E_(KA) =1/2 mu^(2) -1/2m(0)^(2) =0`
निश्चित ऊर्जा
`E_(Pa) = mgh_(0)`
`E_(Pa) =mgl(1- cos theta_(0))`
अतः कुल यांत्रिक ऊर्जा
`E_(A) = E_(Ka) + E_(Pa)`
`E_(A) =mgl(1- cos theta)`
किसी मध्यवर्ती स्थिति के बिन्दु B परबिन्दु B पर पहुंचते-पहुंचते लोलक द्वारा अर्जित वेग V, हो जाता है तथा निर्देश स्तर से ऊंचाई h हो जाती है। तब गति के तृतीय समीकरण :
`V_(B)^(2) = u^(2) + 2g(h_(0)-h)`
`V_(B)^(2) =(0)^(2) + 2g[l(1- cos theta_(0)) - l(1- cos theta)]`
`V_(B)^(2) =2gl (cos theta - cos theta_(0))`
`therefore` गतिज ऊर्जा
`E-(Ka) = 1/2 mv_(B)^(2)`
`E_(Ka) = mgl (cos theta - cos theta_(0))`
तथा स्थितिज ऊर्जा
`therefore E_(B) = mgl (1- cos theta)`,.......(2)
माध्य स्थिति के निर्देश स्तर निम्नतम बिन्दु C परलोलक जब बिन्दु C पर पहुंचता है, तब उसका वेग v. हो जाता है तथा निर्देश स्तर से ऊंचाई शून्य हो जाती है। : गति के तृतीय समीकरण से
`v_(c )^(2) =u^(2) + 2gh_(0)`
`v_( c)^(2) =(0)^(2) + 2gl (1- cos theta_(0))`
अतः गतिज ऊर्जा
`E_(Kc) = 1/2 mv_( c)^(2)`
`E_(Kc) =1/2 m xx 2g (1 - cos theta_(0))`
`E_( c) =mgl (1- cos theta_(0))`..........(3)
समीकरण (1), (2), (3) की तुलना से,
`E_(A) = E_(B) = E_( C) = mgl (1- cos theta_(0))`
=नियतांक ......(4)
अतः एक आदर्श सरल लोलक की कुल यांत्रिक ऊर्जा प्रत्येक स्थिति में संरक्षित बनी रहती है, जब यह माध्य स्थिति के इर्द गिर्द दोलन करता है|