(i) मेण्डल की सफलता के कारण (Reasons for Mendel.s Success)- दूरदर्शिता के कारण ही मेण्डल को अपने प्रयोगों में सफलता मिली | उनकी सफलता के निम्न कारण थे-
1. मेण्डल ने एक समय में केवल एक ही लक्षण की वंशागति का अध्ययन किया।
2. मेण्डल ने अपने प्रयोगों का दूसरी `(F_(2))` तथा तीसरी `(F_(3))` तथा इससे आगे की पीढ़ियों तक अध्ययन किया।
3. मेण्डल ने अपने प्रयोगों में इकट्ठे किए गये आँकड़ों का पूरा गणितीय रिकार्ड रखा और उनका सावधानीपूर्वक विश्लेषण किया।
4. उन्होंने केवल ऐसे पौधों का चुनाव किया जो आनुवंशिक रुप में शुद्ध (Pure breed) थे। इसकी पुष्टि उन्होंने अगली पीढ़ियों के पौधों से स्व:परागण परीक्षणों द्वारा की।
5. उन्होंने शुद्ध लक्षणों वाले पौधों को अलग उगाया जिससे इनमें किसी अन्य लक्षण का पर-परागण द्वारा मिश्रण न हो सके।
6. स्व-परागणं की संभावना को समाप्त करने के लिए कुछ लम्बे और कुछ छोटे पौधे के पुंकेसर काट दिये गये।
(ii) पृथक्करण का नियम या युग्मकों की शुद्धता का नियम (Law of Segregation oor Low of Purity of Gametes)-मेण्डल के नियम के अनुसार प्रत्येक जीन जोड़ी के कारक (जीन) युग्मकों के निर्माण के समय एक-दूसरे से पृथक होकर अलग-अलग युग्मकों में चले। जाते हैं तथा युग्मनज (Zygote) निर्माण में ये कारक पुनः एक-दूसरे के साथ आ जाते हैं तथा अपना अस्तित्व बनाए रखते हैं। इस प्रकार जीन या कारक द्वारा अपना अस्तित्व या जीन की शुद्धता बनाए रखने के कारण इस नियम को युग्मकों की शुद्धता का नियम कहते हैं।
उदाहरण-मेण्डल के प्रभाविता के नियम में प्रथम पीढ़ी `(F_(1))` में प्राप्त संकर लंबे पौधों में जब स्वनिषेचन (Self Pollination) की क्रिया को होने दिया जाता है तो द्वितीय पीढ़ी `(F_(2))` में युग्मकों का पृथक्करण हो जाता है तथा `F_(2)` पीढ़ी में भिन्न लक्षणों वाले पौधे प्राप्त होते हैं।
यदि हम फिनोटाइप के अनुसार देखें तो तीन पौधे लम्बे जबकि एक पौधा बौना प्राप्त होता है अर्थात 75% पौधे लम्बे एवं 25% पौधे बौने मिलते हैं। जिनका अनुपात 3 : 1 है।
यदि हम जीनोटाइप के अनुसार देखें तो एक पौधा शुद्ध लम्बा, दो पौधे संकर लम्बे तथा एक पौधा शुद्ध बौना प्राप्त होता है अर्थात् 25% पौधे शुद्ध लम्बे, 50% पौधे संकर लंबे एवं 25% पौधे शुद्ध बौने मिलते हैं। जिनका अनुपात 1 : 2 : 1 है।
