(i) मेण्डल ने उद्यान मटर पर किये प्रयोगों के परिणामों के आधार पर आनुवांशिकता के जो नियम प्रतिपादित किये गये, उन्हें ही मेण्डलवाद कहते हैं। मेण्डलवाद की पुनः खोज सन् 1900 में हॉलैण्ड के ह्यूगो डी वीज, जर्मनी के कार्ल कोरेन्स एवं ऑस्ट्रिया के एरिक वॉन शेरमेक ने की थी।
(ii) जब दो या दो से अधिक जोड़ी विपर्यासी लक्षणों युक्त पादपों के बीच संकरण कराया जाता है, तो प्रत्येक जोड़ी विपर्यासी लक्षणों की वंशागति अन्य विपर्यासी लक्षणों से प्रभावित हुए बिना स्वतंत्र रूप से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में होती है, इसे ही स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम कहते हैं।
मेण्डल के नियम के अनुसार यह केवल द्विसंकर तथा बहुसंकर संकरण पर आधारित हैं। इसमें जब पीले व गोल आकार बीज (RRYY) वाले मटर के पौधों तथा हरे व झुर्रीदार आकार बीज (rryy) वाले मटर के पौधों के बीच संकरण कराया जाता है तो प्रथम पीढ़ी (F1) में सभी पौधे पीले व गोल बीज (RrYy) वाले पौधे प्राप्त हुए जिससे यह सिद्ध होता है क पीला व गोल आकार प्रभावी लक्षण है। परन्तु जब द्वितीय पीढी (F2) में . स्वनिषेचन होता है तो जीनों का पृथक्करण होता है तथा पुनः जीनों के संयुग्मन से मुख्यतया चार प्रकार के पौधे प्राप्त होते हैं जो निम्नलिखित हैं-
1. पीले तथा गोलाकार बीजों वाले पौधे
2. हरे तथा गोलाकार बीजों वाले पौधे
3. पीले तथा झुर्रीदार बीजों वाले पौधे
4. हरे तथा झुर्रीदार बीजों वाले पौधे
उपर्युक्त पौधों के बीच 9 : 3 : 3 : 1 का अनुपात प्राप्त होता है।
लक्षणप्रारूप चार प्रकार के अनुपात 9 : 3 : 3 : 1 में प्राप्त होते है तथा जीन प्रारूप नौ प्रकार के अनुपात 1 : 2 : 2 : 4, 1 : 2 : 1 : 2 : 1 में प्राप्त होते है |
लक्षणप्रारूप अनुपात (Phenotypic ratio)
9 : 3 : 3 : 1
पीला हरा पीला हरा
गोलाकार गोलाकार झुर्रीदार झुर्रीदार
जीनप्रारूप अनुपात (Genotypic ratio)
1 : 2 : 2 : 4 : 1
YYRR YyRR YYRr YyRr yyRR
2 : 1 : 2 : 1
yyRr YYrr Yyrr yyrr