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BIOLOGY
जल संरक्षण से आपका क्या तात्पर्य है?...

जल संरक्षण से आपका क्या तात्पर्य है?

लिखित उत्तर

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जैव विविधता के संरक्षण के लिए आवश्यक है कि शिकार पर प्रतिबंध ___ को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए सुरक्षित वन क्षेत्र विकसित किये जाए, वनों का विनाश और अवैध खनन को रोका जाए तथा संकटग्रस्त प्रजातियों का संग्रहण किया जाए। इस दिशा में कुछ प्रयास हुए भी हैं। सरकार ने वन्य जीव संरक्षण क्षेत्र और राष्ट्रीय उद्यानों की स्थापना की है। टाइगर प्रोजेक्ट, पक्षी विहार, काला हिरण प्रजनन केन्द्र, गिद्ध प्रजनन केन्द्र और अभ्यारण्य स्थापित करने के अलावा जैव संरक्षित क्षेत्र भी बनाए हैं।
वास्तव में जैव विविधता प्रकृति की स्वभाविक संपत्ति है और इसका क्षय एक प्रकार से प्रकृति का क्षय है। अतः प्रकृति को नष्ट होने से बचाने के लिए जैव विविधता को संरक्षण प्रदान करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
संकटग्रस्त जीवों के जनन द्रव्य संरक्षण विधियों में निम्न ताप संरक्षण विधि व मदे वृद्धि संवर्धन तकनीक प्रमुख है। स्वःस्थाने संरक्षण व बहिस्थाने संरक्षण
स्वःस्थाने संरक्षण (In-situ Conservation)-स्वः स्थाने संरक्षण के अंतर्गत प्रजाति का संरक्षण उसके प्राकृतिक आवास अथवा मानव द्वारा निर्मित पारिस्थितिक तंत्र में किया जाता है जहाँ वो पाये जाते हैं। इस विधि में विभिन्न श्रेणियों के सुरक्षित क्षेत्रों का प्रबंधन विभिन्न उद्देश्यों से समाज के लाभ हेतु किया जाता है । सुरक्षित क्षेत्रों में राष्ट्रीय पार्क, अभयारण्य तथ जैव मण्डल रिजर्व आदि प्रमुख हैं। राष्ट्रीय पार्क की स्थापना का मुख्य उद्देश्य वन्य जीवन को संरक्षण प्रदान करना होता है जबकि अभयारण्य की स्थापना का उद्देश्य किसी विशेष वन्य जीव की प्रजाति को संरक्षण प्रदान करना होता है।
बहिस्थाने संरक्षण (Ex-situ conservation)-संरक्षण की इस विधि में प्रजातियों का संरक्षण उनके प्राकृतिक आवास के बाहर जैसे वानस्पतिक वाटिकाओं, जन्तुशालाओं, आनुवांशिक संसाधन केन्द्रों, संवर्धन संग्रह आदि स्थानों पर किया जाता है। इस विधि द्वारा पौधों का संरक्षण सुगमता से किया जा सकता है। इस विधि में बीज बैंक, वानस्पतिक वाटिका, ऊतक संवर्धन तथा आनुवांशिक अभियांत्रिकी की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
जन्तुओं के संरक्षण के लिए चिड़िया घर, एक्वेरियम आदि की स्थापना की जाती है। संकटग्रस्ट पादपों व जन्तुओं के जननद्रव्यों (बीज, फल, पराग, बीजाणु, शुक्राणु, अण्डाणु आदि) का संरक्षण निम्न ताप संरक्षण विधि व मंद वृद्धि संवर्धन तकनीक द्वारा किया जाता है। संकटग्रस्ट पादप या जन्तु के जीन्स को जीन बैंकों में भी सुरक्षित रखकर जैवविविधता का संरक्षण किया जा सकता है।
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