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यदि एक न्याय्य सिक्के को n बार उछाला गय...

यदि एक न्याय्य सिक्के को n बार उछाला गया हो , तो शीर्ष ( चित ) आने कि प्रायिकता p और पुच्छ (पट्ट ) आने कि प्रायिकता q हो तो ठीक 6 शीर्ष (चित ) आने कि प्रयिकता है -

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पाँच सिक्कों को एक साथ उछाला जाता है तब सभी सिक्कों पर चित्त (शीर्ष) आने की प्रायिकता क्या होगी?

निर्देश :निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये मैने 'अतिथि' शब्द के समानान्तर एक दूसरा शब्द गढ़ा है 'असमय। अतिथि का अर्थ है जिसकी आने की तिथि न हो अर्थात् आने का दिन निश्चित न हो, मतलब कि जो बिना पूर्व सूचना के अकस्मात् टपक पड़े। ठीक उसी तरह 'असमय' का अर्थ कीजिए कि जिसका समय न हो जब चाहे आ जाए और आने में ही नहीं जाने में भी “असमय' हो। तात्पर्य की कब तक रहेगा, कब जाएगा इसका कोई ठिकना नहीं। मैं 'अतिथियों से नहीं घबराता पर 'असमय' से जरूर काँपता हूँ, कारण है कि मै कामकाजी आदमी हैं।' इस युग में कौन काम-काजी नहीं है। जिसको देखिए वही अस्त-व्यस्तता के मारे परेशान है। आजकल बड़प्पन देखने के कई साधन हैं, उनमें एक यह कहना भी कि 'क्या बताऊँ साहब, खाना खाने तक की फुरसत नहीं मिलती, नींद और चैन हराम है।' बात बहुत गलत हो, ऐसा नहीं। जिसको देखिए, चेहरे पर हवाइयां उड़ रही हैं, नाक की सीध में दौड़ा जा रहा है। जिधर नजर डालिये उधर ही भाग-दौड़। आदमी ने मशीनें इजाद की आराम के लिए मगर मकड़े की तरह वह उन मशीनों में ही उलझकर अपनी आजादी खो बैठा, अपनी आदमियता खो बैठा। बाल-बच्चों के बीच भी दस मिनट इत्मीनान से बैठने का, दिल बहलाने का समय नहीं मिलता। आज के कामकाजी आदमी की विशेषता है कि

निर्देश :निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये मैने 'अतिथि' शब्द के समानान्तर एक दूसरा शब्द गढ़ा है 'असमय। अतिथि का अर्थ है जिसकी आने की तिथि न हो अर्थात् आने का दिन निश्चित न हो, मतलब कि जो बिना पूर्व सूचना के अकस्मात् टपक पड़े। ठीक उसी तरह 'असमय' का अर्थ कीजिए कि जिसका समय न हो जब चाहे आ जाए और आने में ही नहीं जाने में भी “असमय' हो। तात्पर्य की कब तक रहेगा, कब जाएगा इसका कोई ठिकना नहीं। मैं 'अतिथियों से नहीं घबराता पर 'असमय' से जरूर काँपता हूँ, कारण है कि मै कामकाजी आदमी हैं।' इस युग में कौन काम-काजी नहीं है। जिसको देखिए वही अस्त-व्यस्तता के मारे परेशान है। आजकल बड़प्पन देखने के कई साधन हैं, उनमें एक यह कहना भी कि 'क्या बताऊँ साहब, खाना खाने तक की फुरसत नहीं मिलती, नींद और चैन हराम है।' बात बहुत गलत हो, ऐसा नहीं। जिसको देखिए, चेहरे पर हवाइयां उड़ रही हैं, नाक की सीध में दौड़ा जा रहा है। जिधर नजर डालिये उधर ही भाग-दौड़। आदमी ने मशीनें इजाद की आराम के लिए मगर मकड़े की तरह वह उन मशीनों में ही उलझकर अपनी आजादी खो बैठा, अपनी आदमियता खो बैठा। बाल-बच्चों के बीच भी दस मिनट इत्मीनान से बैठने का, दिल बहलाने का समय नहीं मिलता। क्या बताऊँ साहब, खाना खाने तक की फुरसत नहीं मिलती, नींद और चैन हराम है" इस वाक्य को लेखक ने माना है

निर्देश :निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये मैने 'अतिथि' शब्द के समानान्तर एक दूसरा शब्द गढ़ा है 'असमय। अतिथि का अर्थ है जिसकी आने की तिथि न हो अर्थात् आने का दिन निश्चित न हो, मतलब कि जो बिना पूर्व सूचना के अकस्मात् टपक पड़े। ठीक उसी तरह 'असमय' का अर्थ कीजिए कि जिसका समय न हो जब चाहे आ जाए और आने में ही नहीं जाने में भी “असमय' हो। तात्पर्य की कब तक रहेगा, कब जाएगा इसका कोई ठिकना नहीं। मैं 'अतिथियों से नहीं घबराता पर 'असमय' से जरूर काँपता हूँ, कारण है कि मै कामकाजी आदमी हैं।' इस युग में कौन काम-काजी नहीं है। जिसको देखिए वही अस्त-व्यस्तता के मारे परेशान है। आजकल बड़प्पन देखने के कई साधन हैं, उनमें एक यह कहना भी कि 'क्या बताऊँ साहब, खाना खाने तक की फुरसत नहीं मिलती, नींद और चैन हराम है।' बात बहुत गलत हो, ऐसा नहीं। जिसको देखिए, चेहरे पर हवाइयां उड़ रही हैं, नाक की सीध में दौड़ा जा रहा है। जिधर नजर डालिये उधर ही भाग-दौड़। आदमी ने मशीनें इजाद की आराम के लिए मगर मकड़े की तरह वह उन मशीनों में ही उलझकर अपनी आजादी खो बैठा, अपनी आदमियता खो बैठा। बाल-बच्चों के बीच भी दस मिनट इत्मीनान से बैठने का, दिल बहलाने का समय नहीं मिलता। मशीनों की खोज का कारण था कि

निर्देश :निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये मैने 'अतिथि' शब्द के समानान्तर एक दूसरा शब्द गढ़ा है 'असमय। अतिथि का अर्थ है जिसकी आने की तिथि न हो अर्थात् आने का दिन निश्चित न हो, मतलब कि जो बिना पूर्व सूचना के अकस्मात् टपक पड़े। ठीक उसी तरह 'असमय' का अर्थ कीजिए कि जिसका समय न हो जब चाहे आ जाए और आने में ही नहीं जाने में भी “असमय' हो। तात्पर्य की कब तक रहेगा, कब जाएगा इसका कोई ठिकना नहीं। मैं 'अतिथियों से नहीं घबराता पर 'असमय' से जरूर काँपता हूँ, कारण है कि मै कामकाजी आदमी हैं।' इस युग में कौन काम-काजी नहीं है। जिसको देखिए वही अस्त-व्यस्तता के मारे परेशान है। आजकल बड़प्पन देखने के कई साधन हैं, उनमें एक यह कहना भी कि 'क्या बताऊँ साहब, खाना खाने तक की फुरसत नहीं मिलती, नींद और चैन हराम है।' बात बहुत गलत हो, ऐसा नहीं। जिसको देखिए, चेहरे पर हवाइयां उड़ रही हैं, नाक की सीध में दौड़ा जा रहा है। जिधर नजर डालिये उधर ही भाग-दौड़। आदमी ने मशीनें इजाद की आराम के लिए मगर मकड़े की तरह वह उन मशीनों में ही उलझकर अपनी आजादी खो बैठा, अपनी आदमियता खो बैठा। बाल-बच्चों के बीच भी दस मिनट इत्मीनान से बैठने का, दिल बहलाने का समय नहीं मिलता। लेखक घबराता है।

शिक्षा मनुष्य को मस्तिष्क और शरीर का उचित तालमेल करना सिखाती है। वह शिक्षा जो मानव को पाठ्य-पुस्तकों के ज्ञान के अतिरिक्त कुछ गंभीर चिंतन न दे। यदि हमारी शिक्षा सुसंस्कृत, सभ्य, सध्चरित्र एवं अच्छे नागरिक नहीं बना सकती तो उससे क्या लाभ? सहृदय, सच्चा परंतु अनपढ़ मज़दूर उस स्नातक से कहीं अच्छा है जो निर्दय और चरित्रहीन है। संसार के सभी वैभव और सुख-साधन भी मनुष्य को तब तक सुखी नहीं बना सकते जब तक कि मनुष्य को आत्मिक ज्ञान न हो। हमारे कुछ अधिकार और कर्तव्य भी हैं। शिक्षित व्यक्ति को कर्तव्यों का उतना ही ध्यान रखना चाहिए जितना कि अधिकारों का 'सुख-साधन' का विग्रह और समास है

आदमी की तलाश', यह स्वर अकसर सुनने को मिलता है। यह भी सुनने को मिलता है कि आज आदमी, आदमी नहीं रहा। इन्हीं स्थितियों के बीच दार्शनिक राधाकृष्णन की इन पंक्तियों का स्मरण हो आया "हमने पक्षियों की तरह उड़ना और मछलियों की तरह तैरना तो सीख लिया है, पर मनुष्य की तरह पृथ्वी पर चलना और जीना नहीं सीखा।" जिन्दगी के सफर में नैतिक और मानवीय उद्देश्यों के प्रति मन में अटूट विश्वास होना जरूरी है। कहा जाता है-आदमी नहीं चलता, उसका विश्वास चलता है। आत्मविश्वास सभी गुणों को एक जगह बाँध देता है, यानी कि विश्वास की रोशनी में मनुष्य का सम्पूर्ण व्यक्तित्व और आदर्श उजागर होता है। गेटे की प्रसिद्ध उक्ति है कि जब कोई आदमी ठीक काम करता है तो उसे पता तब नहीं चलता कि वह क्या कर रहा है, पर गलत काम करते समय उसे हर क्षण यह ख्याल रहता है कि वह जो कर रहा है, यह गलत है। गलत को गलत मानते हुए भी इंसान गलत किए जा रहा है। इसी कारण समस्याओं एवं अंधेरों के अम्बार लगे हैं। लेकिन ऐसा ही नहीं है। कुछ अच्छे लोग भी हैं, शायद उनकी अच्छाइयों के कारण ही जीवन बचा हुआ है। ऐसे लोगों ने 'नैतिकता और सच्चरित्रता का खिताब ओढ़ा नहीं, उसे जीकर दिखाया। वे भाग्य और नियति के हाथों खिलौना बनकर नहीं बैठे, स्वयं के पसीने से अपना भाग्य लिखा। महात्मा गाँधी ने इसलिए कहा कि हमें वह परिवर्तन खुद बनना चाहिए, जिसे हम संसार में देखना चाहते हैं। जरूरत है कि हम दर्पण-जैसा जीवन जीना सीखें। उन सभी खिड़कियों को बन्द कर दें, जिनसे आने वाली गन्दी हवा इंसान को इंसान नहीं रहने देती। मनुष्य के व्यवहार में मनुष्यता को देखा जा सके, यही 'आदमी की तलाश है। मुख्य भाव के अनुसार गद्यांश का सबसे उपयुक्त शीर्षक हो सकता है

आदमी की तलाश', यह स्वर अकसर सुनने को मिलता है। यह भी सुनने को मिलता है कि आज आदमी, आदमी नहीं रहा। इन्हीं स्थितियों के बीच दार्शनिक राधाकृष्णन की इन पंक्तियों का स्मरण हो आया "हमने पक्षियों की तरह उड़ना और मछलियों की तरह तैरना तो सीख लिया है, पर मनुष्य की तरह पृथ्वी पर चलना और जीना नहीं सीखा।" जिन्दगी के सफर में नैतिक और मानवीय उद्देश्यों के प्रति मन में अटूट विश्वास होना जरूरी है। कहा जाता है-आदमी नहीं चलता, उसका विश्वास चलता है। आत्मविश्वास सभी गुणों को एक जगह बाँध देता है, यानी कि विश्वास की रोशनी में मनुष्य का सम्पूर्ण व्यक्तित्व और आदर्श उजागर होता है। गेटे की प्रसिद्ध उक्ति है कि जब कोई आदमी ठीक काम करता है तो उसे पता तब नहीं चलता कि वह क्या कर रहा है, पर गलत काम करते समय उसे हर क्षण यह ख्याल रहता है कि वह जो कर रहा है, यह गलत है। गलत को गलत मानते हुए भी इंसान गलत किए जा रहा है। इसी कारण समस्याओं एवं अंधेरों के अम्बार लगे हैं। लेकिन ऐसा ही नहीं है। कुछ अच्छे लोग भी हैं, शायद उनकी अच्छाइयों के कारण ही जीवन बचा हुआ है। ऐसे लोगों ने 'नैतिकता और सच्चरित्रता का खिताब ओढ़ा नहीं, उसे जीकर दिखाया। वे भाग्य और नियति के हाथों खिलौना बनकर नहीं बैठे, स्वयं के पसीने से अपना भाग्य लिखा। महात्मा गाँधी ने इसलिए कहा कि हमें वह परिवर्तन खुद बनना चाहिए, जिसे हम संसार में देखना चाहते हैं। जरूरत है कि हम दर्पण-जैसा जीवन जीना सीखें। उन सभी खिड़कियों को बन्द कर दें, जिनसे आने वाली गन्दी हवा इंसान को इंसान नहीं रहने देती। मनुष्य के व्यवहार में मनुष्यता को देखा जा सके, यही 'आदमी की तलाश है। जरूरत है कि हम दर्पण-जैसा जीवन जीना सीखें।' रचना की दृष्टि से उपयुक्त वाक्य है

शिक्षा मनुष्य को मस्तिष्क और शरीर का उचित तालमेल करना सिखाती है। वह शिक्षा जो मानव को पाठ्य-पुस्तकों के ज्ञान के अतिरिक्त कुछ गंभीर चिंतन न दे। यदि हमारी शिक्षा सुसंस्कृत, सभ्य, सध्चरित्र एवं अच्छे नागरिक नहीं बना सकती तो उससे क्या लाभ? सहृदय, सच्चा परंतु अनपढ़ मज़दूर उस स्नातक से कहीं अच्छा है जो निर्दय और चरित्रहीन है। संसार के सभी वैभव और सुख-साधन भी मनुष्य को तब तक सुखी नहीं बना सकते जब तक कि मनुष्य को आत्मिक ज्ञान न हो। हमारे कुछ अधिकार और कर्तव्य भी हैं। शिक्षित व्यक्ति को कर्तव्यों का उतना ही ध्यान रखना चाहिए जितना कि अधिकारों का अच्छी शिक्षा की विशेषता नहीं है

शिक्षा मनुष्य को मस्तिष्क और शरीर का उचित तालमेल करना सिखाती है। वह शिक्षा जो मानव को पाठ्य-पुस्तकों के ज्ञान के अतिरिक्त कुछ गंभीर चिंतन न दे। यदि हमारी शिक्षा सुसंस्कृत, सभ्य, सध्चरित्र एवं अच्छे नागरिक नहीं बना सकती तो उससे क्या लाभ? सहृदय, सच्चा परंतु अनपढ़ मज़दूर उस स्नातक से कहीं अच्छा है जो निर्दय और चरित्रहीन है। संसार के सभी वैभव और सुख-साधन भी मनुष्य को तब तक सुखी नहीं बना सकते जब तक कि मनुष्य को आत्मिक ज्ञान न हो। हमारे कुछ अधिकार और कर्तव्य भी हैं। शिक्षित व्यक्ति को कर्तव्यों का उतना ही ध्यान रखना चाहिए जितना कि अधिकारों का मनुष्य तभी सुखी कहा जाता है जब

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