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वर्गीकृत आंकड़ों की मध्यिका ज्ञात करते सम...

वर्गीकृत आंकड़ों की मध्यिका ज्ञात करते समय निम्नलिखित सूचनाएं प्राप्त हुई : l = 860, h = 20 , cf = पूर्व वर्ग की संचयी बारम्बारता = 40, N = 100 और मध्यिका = 868, मध्यिका वर्ग की बारम्बारता ज्ञात कीजिये

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A and B are two points on a circle with centre O. AT is a tangent, such that angle BAT = 45^@ .N is a point on OA, such that BN= 10 cm. The length of the median OM of the triangle NOB is: A और B केंद्र O वाले एक वृत्त पर स्थित दो बिंदु हैं | AT एक स्पर्श रेखा है जो इस प्रकार है कि angle BAT = 45^@ है| N, OA पर स्थित एक बिंदु है जो इस प्रकार है कि BN =10 सेमी है | triangle NOB की मध्यिका OM की लंबाई ज्ञात करें |

There was 25% off on shirts. A lady bought that shirt and got an additional 20% discount for paying in cash and further 10% discount for being a loyal customer. She paid Rs324. What was the price tag (in Rs) on the shirt? शर्ट पर 25% की छूट थी | एक महिला ने वह शर्ट ख़रीदा और उसे नकद में भुगतान करने के कारण 20% की अतिरिक्त छूट प्राप्त हुई तथा इसके बाद निष्ठावान ग्राहक होने के कारण उसे 10% की छूट और मिली | उसने 324 रुपये का भुगतान किया | इस शर्ट का अंकित मूल्य (रुपये में ) ज्ञात करें |

A sum of Rs.1,50,000 is distributed among three persons -A, B and C- so that they receive 20%, 30% and 50%, respectively. A receives the same amount from another sum of money which is distributed among them so that they receive 50%, 30% and 20% respectively. Find the total amount received from both sums of money, by B. रु.1,50,000 की धनराशि को A,B और C के मध्य इस तरह विभाजित किया जाता है जिससे उन्हें क्रमश: 20% 30% और 50% प्राप्त हो। A को उतनी धनराशि प्राप्त हुई जितनी उसे एक और धनराशि के बंटवारे में मिली थी जिसे उन तीनों के मध्य क्रमशः 50%, 30% और 20% के प्रतिशत में विभाजित किया गया था। ज्ञात कीजिए कि छ को उन दोनों बंटवारों में कुल कितनी धनराशि प्राप्त हुई।

गोदान' प्रेमचन्द जी का एक ऐसा क्रान्तिकारी उपन्यास है, जिसमें तत्कालीन युग अपनी समस्त विकृतियों, विडम्बनाओं एवं सच्चाइयों के साथ चित्रित हो गया है। उसमें अपने समय का यथार्थ ही चित्रित नहीं हुआ है वरन् तत्कालीन भारतीय कृषक वर्ग का इतिहास भी संरक्षित हुआ है। प्रेमचन्द जी अपने युग और उसकी परिस्थितियों से पूर्णतः परिचित थे। इसी कारण छोटे-छोटे प्रसंग भी उनकी दृष्टि से ओझल नहीं रहे हैं। अपने समाज की यह पहचान और इसे औपन्यासिक परिस्थितियों से अनुस्यूत कर देने की क्षमता बिरले लोगों में ही होती है। वे यह जानते थे कि एक निष्क्रिय समाज पतन के लिए किस बिन्दु पर खड़ा है तथा वही समाज सामाजिक जागृति पाकर जब जागता है, तो वह किस तरह अपने अतीत और वर्तमान के संकटों के बीच भविष्य के प्रति आशावादी होता है। सामाजिक चेतना के महीन बिन्दुओं को, उन सामाजिकों के बीच प्रेमचन्द ने पहचाना था, जिन्होंने उस चेतना को स्वाभाविक रूप में प्राप्त किया। डॉ। गंगा प्रसाद विमल इसी प्रसंग में लिखते हैं---उपन्यास कथा, होरी जैसे साधारण किसान को केन्द्र बनाकर चलती है, किन्तु केन्द्रीय कथा में होरी मात्र नायक के रूप में ही प्रस्तावित नहीं है, अपितु वह स्वयं एक कथा सत्य के रूप में स्थापित होता है। होरी की कथा में नगर एवं गाँव दोनों के अर्थतन्त्र का खुला हिसाब प्रतीत होता है, परन्तु इन आधारों पर गोदान केवल ₹ एक विचारकथा या समस्याओं की कथा नहीं है, बल्कि वह मानवीय संघर्ष की कथा है। ऐसी कथा जिसमें स्वाधीनता युग की स्वर क्रान्ति की लहरी का ज्वार भी है, तो सारी लड़ाई का पराजय बोध भी। वस्तुत: पराजय बोध के केन्द्र से यदि हम इस कथा कृति का अवलोकन करें, तो हम पाएँगे कि गोदान में एक सच्ची त्रासदी की तस्वीर अवतरित हुई है। उपन्यास का नायक होरी इतना दीन-हीन किसान है कि उसके माध्यम से भारतीय कृषक वर्ग की करुणा और मार्मिक जीवन-यात्रा की सजीव झाँकी प्रस्तुत हो गई है। भारतीय किसान ऋण में ही पैदा होता है, ऋण में ही जीवित रहता है और अपने उत्तराधिकारी पर ऋण का भार छोड़कर मर जाता है। मरते समय उसके पास एक गाय तक नहीं रहती। गोदान उपन्यास ऐसे ही भारतीय किसान के जीवन को करुण त्रासदी है। माय की आकांक्षा होरी के जीवन का सबसे मधुर स्वप्न उसके जीवन की सबसे बड़ी अभिलाषा है। अपनी यह आकांक्षा पूरी करने के लिए वह कोई भी जोखिम उठा सकता है पर पूँजीवादी शोषणचक्र उसकी अभिलाषा को पीस डालता है। अन्त में इस आकांक्षा की पूर्ति के लिए वह ऐसा जी-तोड़ परिश्रम करता है, जो उसकी मृत्यु का कारण बनता है और वह गाय की अभिलाषा मन में ही लिए मृत्यु का वरण कर लेता है। क्रान्तिकारी शब्द है

गोदान' प्रेमचन्द जी का एक ऐसा क्रान्तिकारी उपन्यास है, जिसमें तत्कालीन युग अपनी समस्त विकृतियों, विडम्बनाओं एवं सच्चाइयों के साथ चित्रित हो गया है। उसमें अपने समय का यथार्थ ही चित्रित नहीं हुआ है वरन् तत्कालीन भारतीय कृषक वर्ग का इतिहास भी संरक्षित हुआ है। प्रेमचन्द जी अपने युग और उसकी परिस्थितियों से पूर्णतः परिचित थे। इसी कारण छोटे-छोटे प्रसंग भी उनकी दृष्टि से ओझल नहीं रहे हैं। अपने समाज की यह पहचान और इसे औपन्यासिक परिस्थितियों से अनुस्यूत कर देने की क्षमता बिरले लोगों में ही होती है। वे यह जानते थे कि एक निष्क्रिय समाज पतन के लिए किस बिन्दु पर खड़ा है तथा वही समाज सामाजिक जागृति पाकर जब जागता है, तो वह किस तरह अपने अतीत और वर्तमान के संकटों के बीच भविष्य के प्रति आशावादी होता है। सामाजिक चेतना के महीन बिन्दुओं को, उन सामाजिकों के बीच प्रेमचन्द ने पहचाना था, जिन्होंने उस चेतना को स्वाभाविक रूप में प्राप्त किया। डॉ। गंगा प्रसाद विमल इसी प्रसंग में लिखते हैं---उपन्यास कथा, होरी जैसे साधारण किसान को केन्द्र बनाकर चलती है, किन्तु केन्द्रीय कथा में होरी मात्र नायक के रूप में ही प्रस्तावित नहीं है, अपितु वह स्वयं एक कथा सत्य के रूप में स्थापित होता है। होरी की कथा में नगर एवं गाँव दोनों के अर्थतन्त्र का खुला हिसाब प्रतीत होता है, परन्तु इन आधारों पर गोदान केवल ₹ एक विचारकथा या समस्याओं की कथा नहीं है, बल्कि वह मानवीय संघर्ष की कथा है। ऐसी कथा जिसमें स्वाधीनता युग की स्वर क्रान्ति की लहरी का ज्वार भी है, तो सारी लड़ाई का पराजय बोध भी। वस्तुत: पराजय बोध के केन्द्र से यदि हम इस कथा कृति का अवलोकन करें, तो हम पाएँगे कि गोदान में एक सच्ची त्रासदी की तस्वीर अवतरित हुई है। उपन्यास का नायक होरी इतना दीन-हीन किसान है कि उसके माध्यम से भारतीय कृषक वर्ग की करुणा और मार्मिक जीवन-यात्रा की सजीव झाँकी प्रस्तुत हो गई है। भारतीय किसान ऋण में ही पैदा होता है, ऋण में ही जीवित रहता है और अपने उत्तराधिकारी पर ऋण का भार छोड़कर मर जाता है। मरते समय उसके पास एक गाय तक नहीं रहती। गोदान उपन्यास ऐसे ही भारतीय किसान के जीवन को करुण त्रासदी है। माय की आकांक्षा होरी के जीवन का सबसे मधुर स्वप्न उसके जीवन की सबसे बड़ी अभिलाषा है। अपनी यह आकांक्षा पूरी करने के लिए वह कोई भी जोखिम उठा सकता है पर पूँजीवादी शोषणचक्र उसकी अभिलाषा को पीस डालता है। अन्त में इस आकांक्षा की पूर्ति के लिए वह ऐसा जी-तोड़ परिश्रम करता है, जो उसकी मृत्यु का कारण बनता है और वह गाय की अभिलाषा मन में ही लिए मृत्यु का वरण कर लेता है। गोदान' का नायक कौन है?

गोदान' प्रेमचन्द जी का एक ऐसा क्रान्तिकारी उपन्यास है, जिसमें तत्कालीन युग अपनी समस्त विकृतियों, विडम्बनाओं एवं सच्चाइयों के साथ चित्रित हो गया है। उसमें अपने समय का यथार्थ ही चित्रित नहीं हुआ है वरन् तत्कालीन भारतीय कृषक वर्ग का इतिहास भी संरक्षित हुआ है। प्रेमचन्द जी अपने युग और उसकी परिस्थितियों से पूर्णतः परिचित थे। इसी कारण छोटे-छोटे प्रसंग भी उनकी दृष्टि से ओझल नहीं रहे हैं। अपने समाज की यह पहचान और इसे औपन्यासिक परिस्थितियों से अनुस्यूत कर देने की क्षमता बिरले लोगों में ही होती है। वे यह जानते थे कि एक निष्क्रिय समाज पतन के लिए किस बिन्दु पर खड़ा है तथा वही समाज सामाजिक जागृति पाकर जब जागता है, तो वह किस तरह अपने अतीत और वर्तमान के संकटों के बीच भविष्य के प्रति आशावादी होता है। सामाजिक चेतना के महीन बिन्दुओं को, उन सामाजिकों के बीच प्रेमचन्द ने पहचाना था, जिन्होंने उस चेतना को स्वाभाविक रूप में प्राप्त किया। डॉ। गंगा प्रसाद विमल इसी प्रसंग में लिखते हैं---उपन्यास कथा, होरी जैसे साधारण किसान को केन्द्र बनाकर चलती है, किन्तु केन्द्रीय कथा में होरी मात्र नायक के रूप में ही प्रस्तावित नहीं है, अपितु वह स्वयं एक कथा सत्य के रूप में स्थापित होता है। होरी की कथा में नगर एवं गाँव दोनों के अर्थतन्त्र का खुला हिसाब प्रतीत होता है, परन्तु इन आधारों पर गोदान केवल ₹ एक विचारकथा या समस्याओं की कथा नहीं है, बल्कि वह मानवीय संघर्ष की कथा है। ऐसी कथा जिसमें स्वाधीनता युग की स्वर क्रान्ति की लहरी का ज्वार भी है, तो सारी लड़ाई का पराजय बोध भी। वस्तुत: पराजय बोध के केन्द्र से यदि हम इस कथा कृति का अवलोकन करें, तो हम पाएँगे कि गोदान में एक सच्ची त्रासदी की तस्वीर अवतरित हुई है। उपन्यास का नायक होरी इतना दीन-हीन किसान है कि उसके माध्यम से भारतीय कृषक वर्ग की करुणा और मार्मिक जीवन-यात्रा की सजीव झाँकी प्रस्तुत हो गई है। भारतीय किसान ऋण में ही पैदा होता है, ऋण में ही जीवित रहता है और अपने उत्तराधिकारी पर ऋण का भार छोड़कर मर जाता है। मरते समय उसके पास एक गाय तक नहीं रहती। गोदान उपन्यास ऐसे ही भारतीय किसान के जीवन को करुण त्रासदी है। माय की आकांक्षा होरी के जीवन का सबसे मधुर स्वप्न उसके जीवन की सबसे बड़ी अभिलाषा है। अपनी यह आकांक्षा पूरी करने के लिए वह कोई भी जोखिम उठा सकता है पर पूँजीवादी शोषणचक्र उसकी अभिलाषा को पीस डालता है। अन्त में इस आकांक्षा की पूर्ति के लिए वह ऐसा जी-तोड़ परिश्रम करता है, जो उसकी मृत्यु का कारण बनता है और वह गाय की अभिलाषा मन में ही लिए मृत्यु का वरण कर लेता है। गोदान में निम्नलिखित में से किसका वर्णन नहीं है?

गोदान' प्रेमचन्द जी का एक ऐसा क्रान्तिकारी उपन्यास है, जिसमें तत्कालीन युग अपनी समस्त विकृतियों, विडम्बनाओं एवं सच्चाइयों के साथ चित्रित हो गया है। उसमें अपने समय का यथार्थ ही चित्रित नहीं हुआ है वरन् तत्कालीन भारतीय कृषक वर्ग का इतिहास भी संरक्षित हुआ है। प्रेमचन्द जी अपने युग और उसकी परिस्थितियों से पूर्णतः परिचित थे। इसी कारण छोटे-छोटे प्रसंग भी उनकी दृष्टि से ओझल नहीं रहे हैं। अपने समाज की यह पहचान और इसे औपन्यासिक परिस्थितियों से अनुस्यूत कर देने की क्षमता बिरले लोगों में ही होती है। वे यह जानते थे कि एक निष्क्रिय समाज पतन के लिए किस बिन्दु पर खड़ा है तथा वही समाज सामाजिक जागृति पाकर जब जागता है, तो वह किस तरह अपने अतीत और वर्तमान के संकटों के बीच भविष्य के प्रति आशावादी होता है। सामाजिक चेतना के महीन बिन्दुओं को, उन सामाजिकों के बीच प्रेमचन्द ने पहचाना था, जिन्होंने उस चेतना को स्वाभाविक रूप में प्राप्त किया। डॉ। गंगा प्रसाद विमल इसी प्रसंग में लिखते हैं---उपन्यास कथा, होरी जैसे साधारण किसान को केन्द्र बनाकर चलती है, किन्तु केन्द्रीय कथा में होरी मात्र नायक के रूप में ही प्रस्तावित नहीं है, अपितु वह स्वयं एक कथा सत्य के रूप में स्थापित होता है। होरी की कथा में नगर एवं गाँव दोनों के अर्थतन्त्र का खुला हिसाब प्रतीत होता है, परन्तु इन आधारों पर गोदान केवल ₹ एक विचारकथा या समस्याओं की कथा नहीं है, बल्कि वह मानवीय संघर्ष की कथा है। ऐसी कथा जिसमें स्वाधीनता युग की स्वर क्रान्ति की लहरी का ज्वार भी है, तो सारी लड़ाई का पराजय बोध भी। वस्तुत: पराजय बोध के केन्द्र से यदि हम इस कथा कृति का अवलोकन करें, तो हम पाएँगे कि गोदान में एक सच्ची त्रासदी की तस्वीर अवतरित हुई है। उपन्यास का नायक होरी इतना दीन-हीन किसान है कि उसके माध्यम से भारतीय कृषक वर्ग की करुणा और मार्मिक जीवन-यात्रा की सजीव झाँकी प्रस्तुत हो गई है। भारतीय किसान ऋण में ही पैदा होता है, ऋण में ही जीवित रहता है और अपने उत्तराधिकारी पर ऋण का भार छोड़कर मर जाता है। मरते समय उसके पास एक गाय तक नहीं रहती। गोदान उपन्यास ऐसे ही भारतीय किसान के जीवन को करुण त्रासदी है। माय की आकांक्षा होरी के जीवन का सबसे मधुर स्वप्न उसके जीवन की सबसे बड़ी अभिलाषा है। अपनी यह आकांक्षा पूरी करने के लिए वह कोई भी जोखिम उठा सकता है पर पूँजीवादी शोषणचक्र उसकी अभिलाषा को पीस डालता है। अन्त में इस आकांक्षा की पूर्ति के लिए वह ऐसा जी-तोड़ परिश्रम करता है, जो उसकी मृत्यु का कारण बनता है और वह गाय की अभिलाषा मन में ही लिए मृत्यु का वरण कर लेता है। होरी को कौन-सी इच्छा अधूरी रह जाती है?

गोदान' प्रेमचन्द जी का एक ऐसा क्रान्तिकारी उपन्यास है, जिसमें तत्कालीन युग अपनी समस्त विकृतियों, विडम्बनाओं एवं सच्चाइयों के साथ चित्रित हो गया है। उसमें अपने समय का यथार्थ ही चित्रित नहीं हुआ है वरन् तत्कालीन भारतीय कृषक वर्ग का इतिहास भी संरक्षित हुआ है। प्रेमचन्द जी अपने युग और उसकी परिस्थितियों से पूर्णतः परिचित थे। इसी कारण छोटे-छोटे प्रसंग भी उनकी दृष्टि से ओझल नहीं रहे हैं। अपने समाज की यह पहचान और इसे औपन्यासिक परिस्थितियों से अनुस्यूत कर देने की क्षमता बिरले लोगों में ही होती है। वे यह जानते थे कि एक निष्क्रिय समाज पतन के लिए किस बिन्दु पर खड़ा है तथा वही समाज सामाजिक जागृति पाकर जब जागता है, तो वह किस तरह अपने अतीत और वर्तमान के संकटों के बीच भविष्य के प्रति आशावादी होता है। सामाजिक चेतना के महीन बिन्दुओं को, उन सामाजिकों के बीच प्रेमचन्द ने पहचाना था, जिन्होंने उस चेतना को स्वाभाविक रूप में प्राप्त किया। डॉ। गंगा प्रसाद विमल इसी प्रसंग में लिखते हैं---उपन्यास कथा, होरी जैसे साधारण किसान को केन्द्र बनाकर चलती है, किन्तु केन्द्रीय कथा में होरी मात्र नायक के रूप में ही प्रस्तावित नहीं है, अपितु वह स्वयं एक कथा सत्य के रूप में स्थापित होता है। होरी की कथा में नगर एवं गाँव दोनों के अर्थतन्त्र का खुला हिसाब प्रतीत होता है, परन्तु इन आधारों पर गोदान केवल ₹ एक विचारकथा या समस्याओं की कथा नहीं है, बल्कि वह मानवीय संघर्ष की कथा है। ऐसी कथा जिसमें स्वाधीनता युग की स्वर क्रान्ति की लहरी का ज्वार भी है, तो सारी लड़ाई का पराजय बोध भी। वस्तुत: पराजय बोध के केन्द्र से यदि हम इस कथा कृति का अवलोकन करें, तो हम पाएँगे कि गोदान में एक सच्ची त्रासदी की तस्वीर अवतरित हुई है। उपन्यास का नायक होरी इतना दीन-हीन किसान है कि उसके माध्यम से भारतीय कृषक वर्ग की करुणा और मार्मिक जीवन-यात्रा की सजीव झाँकी प्रस्तुत हो गई है। भारतीय किसान ऋण में ही पैदा होता है, ऋण में ही जीवित रहता है और अपने उत्तराधिकारी पर ऋण का भार छोड़कर मर जाता है। मरते समय उसके पास एक गाय तक नहीं रहती। गोदान उपन्यास ऐसे ही भारतीय किसान के जीवन को करुण त्रासदी है। माय की आकांक्षा होरी के जीवन का सबसे मधुर स्वप्न उसके जीवन की सबसे बड़ी अभिलाषा है। अपनी यह आकांक्षा पूरी करने के लिए वह कोई भी जोखिम उठा सकता है पर पूँजीवादी शोषणचक्र उसकी अभिलाषा को पीस डालता है। अन्त में इस आकांक्षा की पूर्ति के लिए वह ऐसा जी-तोड़ परिश्रम करता है, जो उसकी मृत्यु का कारण बनता है और वह गाय की अभिलाषा मन में ही लिए मृत्यु का वरण कर लेता है। प्रेमचन्द के अनुसार

गोदान' प्रेमचन्द जी का एक ऐसा क्रान्तिकारी उपन्यास है, जिसमें तत्कालीन युग अपनी समस्त विकृतियों, विडम्बनाओं एवं सच्चाइयों के साथ चित्रित हो गया है। उसमें अपने समय का यथार्थ ही चित्रित नहीं हुआ है वरन् तत्कालीन भारतीय कृषक वर्ग का इतिहास भी संरक्षित हुआ है। प्रेमचन्द जी अपने युग और उसकी परिस्थितियों से पूर्णतः परिचित थे। इसी कारण छोटे-छोटे प्रसंग भी उनकी दृष्टि से ओझल नहीं रहे हैं। अपने समाज की यह पहचान और इसे औपन्यासिक परिस्थितियों से अनुस्यूत कर देने की क्षमता बिरले लोगों में ही होती है। वे यह जानते थे कि एक निष्क्रिय समाज पतन के लिए किस बिन्दु पर खड़ा है तथा वही समाज सामाजिक जागृति पाकर जब जागता है, तो वह किस तरह अपने अतीत और वर्तमान के संकटों के बीच भविष्य के प्रति आशावादी होता है। सामाजिक चेतना के महीन बिन्दुओं को, उन सामाजिकों के बीच प्रेमचन्द ने पहचाना था, जिन्होंने उस चेतना को स्वाभाविक रूप में प्राप्त किया। डॉ। गंगा प्रसाद विमल इसी प्रसंग में लिखते हैं---उपन्यास कथा, होरी जैसे साधारण किसान को केन्द्र बनाकर चलती है, किन्तु केन्द्रीय कथा में होरी मात्र नायक के रूप में ही प्रस्तावित नहीं है, अपितु वह स्वयं एक कथा सत्य के रूप में स्थापित होता है। होरी की कथा में नगर एवं गाँव दोनों के अर्थतन्त्र का खुला हिसाब प्रतीत होता है, परन्तु इन आधारों पर गोदान केवल ₹ एक विचारकथा या समस्याओं की कथा नहीं है, बल्कि वह मानवीय संघर्ष की कथा है। ऐसी कथा जिसमें स्वाधीनता युग की स्वर क्रान्ति की लहरी का ज्वार भी है, तो सारी लड़ाई का पराजय बोध भी। वस्तुत: पराजय बोध के केन्द्र से यदि हम इस कथा कृति का अवलोकन करें, तो हम पाएँगे कि गोदान में एक सच्ची त्रासदी की तस्वीर अवतरित हुई है। उपन्यास का नायक होरी इतना दीन-हीन किसान है कि उसके माध्यम से भारतीय कृषक वर्ग की करुणा और मार्मिक जीवन-यात्रा की सजीव झाँकी प्रस्तुत हो गई है। भारतीय किसान ऋण में ही पैदा होता है, ऋण में ही जीवित रहता है और अपने उत्तराधिकारी पर ऋण का भार छोड़कर मर जाता है। मरते समय उसके पास एक गाय तक नहीं रहती। गोदान उपन्यास ऐसे ही भारतीय किसान के जीवन को करुण त्रासदी है। माय की आकांक्षा होरी के जीवन का सबसे मधुर स्वप्न उसके जीवन की सबसे बड़ी अभिलाषा है। अपनी यह आकांक्षा पूरी करने के लिए वह कोई भी जोखिम उठा सकता है पर पूँजीवादी शोषणचक्र उसकी अभिलाषा को पीस डालता है। अन्त में इस आकांक्षा की पूर्ति के लिए वह ऐसा जी-तोड़ परिश्रम करता है, जो उसकी मृत्यु का कारण बनता है और वह गाय की अभिलाषा मन में ही लिए मृत्यु का वरण कर लेता है। गोदान में

गोदान' प्रेमचन्द जी का एक ऐसा क्रान्तिकारी उपन्यास है, जिसमें तत्कालीन युग अपनी समस्त विकृतियों, विडम्बनाओं एवं सच्चाइयों के साथ चित्रित हो गया है। उसमें अपने समय का यथार्थ ही चित्रित नहीं हुआ है वरन् तत्कालीन भारतीय कृषक वर्ग का इतिहास भी संरक्षित हुआ है। प्रेमचन्द जी अपने युग और उसकी परिस्थितियों से पूर्णतः परिचित थे। इसी कारण छोटे-छोटे प्रसंग भी उनकी दृष्टि से ओझल नहीं रहे हैं। अपने समाज की यह पहचान और इसे औपन्यासिक परिस्थितियों से अनुस्यूत कर देने की क्षमता बिरले लोगों में ही होती है। वे यह जानते थे कि एक निष्क्रिय समाज पतन के लिए किस बिन्दु पर खड़ा है तथा वही समाज सामाजिक जागृति पाकर जब जागता है, तो वह किस तरह अपने अतीत और वर्तमान के संकटों के बीच भविष्य के प्रति आशावादी होता है। सामाजिक चेतना के महीन बिन्दुओं को, उन सामाजिकों के बीच प्रेमचन्द ने पहचाना था, जिन्होंने उस चेतना को स्वाभाविक रूप में प्राप्त किया। डॉ। गंगा प्रसाद विमल इसी प्रसंग में लिखते हैं---उपन्यास कथा, होरी जैसे साधारण किसान को केन्द्र बनाकर चलती है, किन्तु केन्द्रीय कथा में होरी मात्र नायक के रूप में ही प्रस्तावित नहीं है, अपितु वह स्वयं एक कथा सत्य के रूप में स्थापित होता है। होरी की कथा में नगर एवं गाँव दोनों के अर्थतन्त्र का खुला हिसाब प्रतीत होता है, परन्तु इन आधारों पर गोदान केवल ₹ एक विचारकथा या समस्याओं की कथा नहीं है, बल्कि वह मानवीय संघर्ष की कथा है। ऐसी कथा जिसमें स्वाधीनता युग की स्वर क्रान्ति की लहरी का ज्वार भी है, तो सारी लड़ाई का पराजय बोध भी। वस्तुत: पराजय बोध के केन्द्र से यदि हम इस कथा कृति का अवलोकन करें, तो हम पाएँगे कि गोदान में एक सच्ची त्रासदी की तस्वीर अवतरित हुई है। उपन्यास का नायक होरी इतना दीन-हीन किसान है कि उसके माध्यम से भारतीय कृषक वर्ग की करुणा और मार्मिक जीवन-यात्रा की सजीव झाँकी प्रस्तुत हो गई है। भारतीय किसान ऋण में ही पैदा होता है, ऋण में ही जीवित रहता है और अपने उत्तराधिकारी पर ऋण का भार छोड़कर मर जाता है। मरते समय उसके पास एक गाय तक नहीं रहती। गोदान उपन्यास ऐसे ही भारतीय किसान के जीवन को करुण त्रासदी है। माय की आकांक्षा होरी के जीवन का सबसे मधुर स्वप्न उसके जीवन की सबसे बड़ी अभिलाषा है। अपनी यह आकांक्षा पूरी करने के लिए वह कोई भी जोखिम उठा सकता है पर पूँजीवादी शोषणचक्र उसकी अभिलाषा को पीस डालता है। अन्त में इस आकांक्षा की पूर्ति के लिए वह ऐसा जी-तोड़ परिश्रम करता है, जो उसकी मृत्यु का कारण बनता है और वह गाय की अभिलाषा मन में ही लिए मृत्यु का वरण कर लेता है। 'निष्क्रिय' शब्द का प्रयोग प्रस्तुत गद्यांश में किसके लिए किया गया है?