किसी स्कूल में 45 मिनट अवधि के 8 कालांश होते हैं। यह कल्पना करते हुए कि स्कूल का कार्य समय उतना ही रहता है यदि स्कूल में बराबर अवधि के 9 कालांश हो तो प्रत्येक कालाश कितने समय का होगा?
किसी स्कूल में 45 मिनट अवधि के 8 कालांश होते हैं। यह कल्पना करते हुए कि स्कूल का कार्य समय उतना ही रहता है यदि स्कूल में बराबर अवधि के 9 कालांश हो तो प्रत्येक कालाश कितने समय का होगा?
Similar Questions
Explore conceptually related problems
हिंदी भाषा का आंकलन करते समय 'पोर्टफोलियो' बच्चों के बारे में यह बताता है कि
राष्ट्रीय पर्वो और सांस्कृतिक समारोहों के दौरान गीत गाए जाएँ। कविताएँ सुनी और सुनायी जाएँ, इसे लेकर माता-पिताओं, स्कूल, और समाज में व्यापक सहमति है लेकिन गीत-कविताएँ। बच्चों के जीवन में रच-बस जाएँ, वे उनका भरपूर आनंद लेने लगें, खुद तुकबंदियाँ करने लगें, रचने लगें, यह माता-पिता को मंजूर नहीं। माता को लगता है ऐसा करते हुए तो वे उस राह से भटक जाएँगे जिस राह पर वे उन्हें चलाना चाहते हैं। जिस राह से वे उन्हें अपनी सोची हुई मंजिल पर पहुँचाना चाहते हैं। उनकी इस इच्छा में यह निहित है कि बच्चे वैसा कुछ भी नहीं करें जो वे करना चाहते हैं बल्कि वे वैसा करें जैसा माता-पिता चाहते हैं। उनके भीतर बच्चे के स्वतंत्रतापूर्वक सीखने की प्रक्रिया के प्रति सतत संदेह और गहरा डर बना रहता है। यही हाल स्कूल का भी है। गीत-कविता स्कूल और कक्षाओं की रोजमर्रा की गतिविधि का हिस्सा बन जाए यह स्कूल को मंजूर नहीं। स्कूल को लगता है इस सबके लिए समय कहाँ है। यह पाठ्यपुस्तक से बाहर की गतिविधि है। शिक्षक और शिक्षा अधिकारी चाहते हैं शिक्षक पहले परीक्षा परिणाम बेहतर लाने के लिए काम करें। दूसरी ओर हमारी संस्कृति और समाज में गीत-कविता की जो जगहें थी वे जगहें लगातार सीमित हुई हैं। गीत गाने, सुनने-सुनाने के अवसर हुआ करते थे, वे अवसर ही गीत-कविताओं को गुनगुनाते रह सकने के लिए याद करने को प्रेरित करते थे। सहेजने और रचने के लिए प्रेरित करते थे। इस सबके लिए अतिरिक्त प्रयासों की जरूरत नहीं पड़ती थी, वह जीवन-शैली का स्वाभाविक हिस्सा था। बच्चों के लिए पढ़ाई से अधिक खेलने-कूदने के लिए समय और जगहें थी। खेलने-कूदने की मस्ती के दौरान ही उनके बीच से स्वतः ही नये खेलों, तुकबंदियों और खेलगीतों और बालगीतों का सृजन भी हो जाया करता था। उनकी ये रचनाएँ चलन में आ जाया करती थीं, जबान पर चढ़ जाती थीं और सालों-साल उनकी टोलियों -के-बीच बनी रहती थी। समय के साथ उनमें कुछ कमी पाए जाने पर संशोधित होती रहती थी। 'कविताएँ सुनी-सुनायी जाएँ' में क्रिया है
राष्ट्रीय पर्वो और सांस्कृतिक समारोहों के दौरान गीत गाए जाएँ। कविताएँ सुनी और सुनायी जाएँ, इसे लेकर माता-पिताओं, स्कूल, और समाज में व्यापक सहमति है लेकिन गीत-कविताएँ। बच्चों के जीवन में रच-बस जाएँ, वे उनका भरपूर आनंद लेने लगें, खुद तुकबंदियाँ करने लगें, रचने लगें, यह माता-पिता को मंजूर नहीं। माता को लगता है ऐसा करते हुए तो वे उस राह से भटक जाएँगे जिस राह पर वे उन्हें चलाना चाहते हैं। जिस राह से वे उन्हें अपनी सोची हुई मंजिल पर पहुँचाना चाहते हैं। उनकी इस इच्छा में यह निहित है कि बच्चे वैसा कुछ भी नहीं करें जो वे करना चाहते हैं बल्कि वे वैसा करें जैसा माता-पिता चाहते हैं। उनके भीतर बच्चे के स्वतंत्रतापूर्वक सीखने की प्रक्रिया के प्रति सतत संदेह और गहरा डर बना रहता है। यही हाल स्कूल का भी है। गीत-कविता स्कूल और कक्षाओं की रोजमर्रा की गतिविधि का हिस्सा बन जाए यह स्कूल को मंजूर नहीं। स्कूल को लगता है इस सबके लिए समय कहाँ है। यह पाठ्यपुस्तक से बाहर की गतिविधि है। शिक्षक और शिक्षा अधिकारी चाहते हैं शिक्षक पहले परीक्षा परिणाम बेहतर लाने के लिए काम करें। दूसरी ओर हमारी संस्कृति और समाज में गीत-कविता की जो जगहें थी वे जगहें लगातार सीमित हुई हैं। गीत गाने, सुनने-सुनाने के अवसर हुआ करते थे, वे अवसर ही गीत-कविताओं को गुनगुनाते रह सकने के लिए याद करने को प्रेरित करते थे। सहेजने और रचने के लिए प्रेरित करते थे। इस सबके लिए अतिरिक्त प्रयासों की जरूरत नहीं पड़ती थी, वह जीवन-शैली का स्वाभाविक हिस्सा था। बच्चों के लिए पढ़ाई से अधिक खेलने-कूदने के लिए समय और जगहें थी। खेलने-कूदने की मस्ती के दौरान ही उनके बीच से स्वतः ही नये खेलों, तुकबंदियों और खेलगीतों और बालगीतों का सृजन भी हो जाया करता था। उनकी ये रचनाएँ चलन में आ जाया करती थीं, जबान पर चढ़ जाती थीं और सालों-साल उनकी टोलियों -के-बीच बनी रहती थी। समय के साथ उनमें कुछ कमी पाए जाने पर संशोधित होती रहती थी। गति-कविता बच्चों के जीवन में रच-बस जाएँ यह माता-पिता को पसंद नहीं है, क्योंकि इससे बच्चे-
राष्ट्रीय पर्वो और सांस्कृतिक समारोहों के दौरान गीत गाए जाएँ। कविताएँ सुनी और सुनायी जाएँ, इसे लेकर माता-पिताओं, स्कूल, और समाज में व्यापक सहमति है लेकिन गीत-कविताएँ। बच्चों के जीवन में रच-बस जाएँ, वे उनका भरपूर आनंद लेने लगें, खुद तुकबंदियाँ करने लगें, रचने लगें, यह माता-पिता को मंजूर नहीं। माता को लगता है ऐसा करते हुए तो वे उस राह से भटक जाएँगे जिस राह पर वे उन्हें चलाना चाहते हैं। जिस राह से वे उन्हें अपनी सोची हुई मंजिल पर पहुँचाना चाहते हैं। उनकी इस इच्छा में यह निहित है कि बच्चे वैसा कुछ भी नहीं करें जो वे करना चाहते हैं बल्कि वे वैसा करें जैसा माता-पिता चाहते हैं। उनके भीतर बच्चे के स्वतंत्रतापूर्वक सीखने की प्रक्रिया के प्रति सतत संदेह और गहरा डर बना रहता है। यही हाल स्कूल का भी है। गीत-कविता स्कूल और कक्षाओं की रोजमर्रा की गतिविधि का हिस्सा बन जाए यह स्कूल को मंजूर नहीं। स्कूल को लगता है इस सबके लिए समय कहाँ है। यह पाठ्यपुस्तक से बाहर की गतिविधि है। शिक्षक और शिक्षा अधिकारी चाहते हैं शिक्षक पहले परीक्षा परिणाम बेहतर लाने के लिए काम करें। दूसरी ओर हमारी संस्कृति और समाज में गीत-कविता की जो जगहें थी वे जगहें लगातार सीमित हुई हैं। गीत गाने, सुनने-सुनाने के अवसर हुआ करते थे, वे अवसर ही गीत-कविताओं को गुनगुनाते रह सकने के लिए याद करने को प्रेरित करते थे। सहेजने और रचने के लिए प्रेरित करते थे। इस सबके लिए अतिरिक्त प्रयासों की जरूरत नहीं पड़ती थी, वह जीवन-शैली का स्वाभाविक हिस्सा था। बच्चों के लिए पढ़ाई से अधिक खेलने-कूदने के लिए समय और जगहें थी। खेलने-कूदने की मस्ती के दौरान ही उनके बीच से स्वतः ही नये खेलों, तुकबंदियों और खेलगीतों और बालगीतों का सृजन भी हो जाया करता था। उनकी ये रचनाएँ चलन में आ जाया करती थीं, जबान पर चढ़ जाती थीं और सालों-साल उनकी टोलियों -के-बीच बनी रहती थी। समय के साथ उनमें कुछ कमी पाए जाने पर संशोधित होती रहती थी। गीत-कविता स्कूलों को भी पसंद नहीं है, क्योंकि उन्हें लगता है कि
राष्ट्रीय पर्वो और सांस्कृतिक समारोहों के दौरान गीत गाए जाएँ। कविताएँ सुनी और सुनायी जाएँ, इसे लेकर माता-पिताओं, स्कूल, और समाज में व्यापक सहमति है लेकिन गीत-कविताएँ। बच्चों के जीवन में रच-बस जाएँ, वे उनका भरपूर आनंद लेने लगें, खुद तुकबंदियाँ करने लगें, रचने लगें, यह माता-पिता को मंजूर नहीं। माता को लगता है ऐसा करते हुए तो वे उस राह से भटक जाएँगे जिस राह पर वे उन्हें चलाना चाहते हैं। जिस राह से वे उन्हें अपनी सोची हुई मंजिल पर पहुँचाना चाहते हैं। उनकी इस इच्छा में यह निहित है कि बच्चे वैसा कुछ भी नहीं करें जो वे करना चाहते हैं बल्कि वे वैसा करें जैसा माता-पिता चाहते हैं। उनके भीतर बच्चे के स्वतंत्रतापूर्वक सीखने की प्रक्रिया के प्रति सतत संदेह और गहरा डर बना रहता है। यही हाल स्कूल का भी है। गीत-कविता स्कूल और कक्षाओं की रोजमर्रा की गतिविधि का हिस्सा बन जाए यह स्कूल को मंजूर नहीं। स्कूल को लगता है इस सबके लिए समय कहाँ है। यह पाठ्यपुस्तक से बाहर की गतिविधि है। शिक्षक और शिक्षा अधिकारी चाहते हैं शिक्षक पहले परीक्षा परिणाम बेहतर लाने के लिए काम करें। दूसरी ओर हमारी संस्कृति और समाज में गीत-कविता की जो जगहें थी वे जगहें लगातार सीमित हुई हैं। गीत गाने, सुनने-सुनाने के अवसर हुआ करते थे, वे अवसर ही गीत-कविताओं को गुनगुनाते रह सकने के लिए याद करने को प्रेरित करते थे। सहेजने और रचने के लिए प्रेरित करते थे। इस सबके लिए अतिरिक्त प्रयासों की जरूरत नहीं पड़ती थी, वह जीवन-शैली का स्वाभाविक हिस्सा था। बच्चों के लिए पढ़ाई से अधिक खेलने-कूदने के लिए समय और जगहें थी। खेलने-कूदने की मस्ती के दौरान ही उनके बीच से स्वतः ही नये खेलों, तुकबंदियों और खेलगीतों और बालगीतों का सृजन भी हो जाया करता था। उनकी ये रचनाएँ चलन में आ जाया करती थीं, जबान पर चढ़ जाती थीं और सालों-साल उनकी टोलियों -के-बीच बनी रहती थी। समय के साथ उनमें कुछ कमी पाए जाने पर संशोधित होती रहती थी। गीत-कविता के बारे में कौन-सा कथन सही नहीं है?
राष्ट्रीय पर्वो और सांस्कृतिक समारोहों के दौरान गीत गाए जाएँ। कविताएँ सुनी और सुनायी जाएँ, इसे लेकर माता-पिताओं, स्कूल, और समाज में व्यापक सहमति है लेकिन गीत-कविताएँ। बच्चों के जीवन में रच-बस जाएँ, वे उनका भरपूर आनंद लेने लगें, खुद तुकबंदियाँ करने लगें, रचने लगें, यह माता-पिता को मंजूर नहीं। माता को लगता है ऐसा करते हुए तो वे उस राह से भटक जाएँगे जिस राह पर वे उन्हें चलाना चाहते हैं। जिस राह से वे उन्हें अपनी सोची हुई मंजिल पर पहुँचाना चाहते हैं। उनकी इस इच्छा में यह निहित है कि बच्चे वैसा कुछ भी नहीं करें जो वे करना चाहते हैं बल्कि वे वैसा करें जैसा माता-पिता चाहते हैं। उनके भीतर बच्चे के स्वतंत्रतापूर्वक सीखने की प्रक्रिया के प्रति सतत संदेह और गहरा डर बना रहता है। यही हाल स्कूल का भी है। गीत-कविता स्कूल और कक्षाओं की रोजमर्रा की गतिविधि का हिस्सा बन जाए यह स्कूल को मंजूर नहीं। स्कूल को लगता है इस सबके लिए समय कहाँ है। यह पाठ्यपुस्तक से बाहर की गतिविधि है। शिक्षक और शिक्षा अधिकारी चाहते हैं शिक्षक पहले परीक्षा परिणाम बेहतर लाने के लिए काम करें। दूसरी ओर हमारी संस्कृति और समाज में गीत-कविता की जो जगहें थी वे जगहें लगातार सीमित हुई हैं। गीत गाने, सुनने-सुनाने के अवसर हुआ करते थे, वे अवसर ही गीत-कविताओं को गुनगुनाते रह सकने के लिए याद करने को प्रेरित करते थे। सहेजने और रचने के लिए प्रेरित करते थे। इस सबके लिए अतिरिक्त प्रयासों की जरूरत नहीं पड़ती थी, वह जीवन-शैली का स्वाभाविक हिस्सा था। बच्चों के लिए पढ़ाई से अधिक खेलने-कूदने के लिए समय और जगहें थी। खेलने-कूदने की मस्ती के दौरान ही उनके बीच से स्वतः ही नये खेलों, तुकबंदियों और खेलगीतों और बालगीतों का सृजन भी हो जाया करता था। उनकी ये रचनाएँ चलन में आ जाया करती थीं, जबान पर चढ़ जाती थीं और सालों-साल उनकी टोलियों -के-बीच बनी रहती थी। समय के साथ उनमें कुछ कमी पाए जाने पर संशोधित होती रहती थी। बच्चों के लिए लक्ष्य कौन निर्धारित करता है?
राष्ट्रीय पर्वो और सांस्कृतिक समारोहों के दौरान गीत गाए जाएँ। कविताएँ सुनी और सुनायी जाएँ, इसे लेकर माता-पिताओं, स्कूल, और समाज में व्यापक सहमति है लेकिन गीत-कविताएँ। बच्चों के जीवन में रच-बस जाएँ, वे उनका भरपूर आनंद लेने लगें, खुद तुकबंदियाँ करने लगें, रचने लगें, यह माता-पिता को मंजूर नहीं। माता को लगता है ऐसा करते हुए तो वे उस राह से भटक जाएँगे जिस राह पर वे उन्हें चलाना चाहते हैं। जिस राह से वे उन्हें अपनी सोची हुई मंजिल पर पहुँचाना चाहते हैं। उनकी इस इच्छा में यह निहित है कि बच्चे वैसा कुछ भी नहीं करें जो वे करना चाहते हैं बल्कि वे वैसा करें जैसा माता-पिता चाहते हैं। उनके भीतर बच्चे के स्वतंत्रतापूर्वक सीखने की प्रक्रिया के प्रति सतत संदेह और गहरा डर बना रहता है। यही हाल स्कूल का भी है। गीत-कविता स्कूल और कक्षाओं की रोजमर्रा की गतिविधि का हिस्सा बन जाए यह स्कूल को मंजूर नहीं। स्कूल को लगता है इस सबके लिए समय कहाँ है। यह पाठ्यपुस्तक से बाहर की गतिविधि है। शिक्षक और शिक्षा अधिकारी चाहते हैं शिक्षक पहले परीक्षा परिणाम बेहतर लाने के लिए काम करें। दूसरी ओर हमारी संस्कृति और समाज में गीत-कविता की जो जगहें थी वे जगहें लगातार सीमित हुई हैं। गीत गाने, सुनने-सुनाने के अवसर हुआ करते थे, वे अवसर ही गीत-कविताओं को गुनगुनाते रह सकने के लिए याद करने को प्रेरित करते थे। सहेजने और रचने के लिए प्रेरित करते थे। इस सबके लिए अतिरिक्त प्रयासों की जरूरत नहीं पड़ती थी, वह जीवन-शैली का स्वाभाविक हिस्सा था। बच्चों के लिए पढ़ाई से अधिक खेलने-कूदने के लिए समय और जगहें थी। खेलने-कूदने की मस्ती के दौरान ही उनके बीच से स्वतः ही नये खेलों, तुकबंदियों और खेलगीतों और बालगीतों का सृजन भी हो जाया करता था। उनकी ये रचनाएँ चलन में आ जाया करती थीं, जबान पर चढ़ जाती थीं और सालों-साल उनकी टोलियों -के-बीच बनी रहती थी। समय के साथ उनमें कुछ कमी पाए जाने पर संशोधित होती रहती थी। शिक्षा-व्यवस्था गीत-कविता को किस दृष्टि से दखता है?
राष्ट्रीय पर्वो और सांस्कृतिक समारोहों के दौरान गीत गाए जाएँ। कविताएँ सुनी और सुनायी जाएँ, इसे लेकर माता-पिताओं, स्कूल, और समाज में व्यापक सहमति है लेकिन गीत-कविताएँ। बच्चों के जीवन में रच-बस जाएँ, वे उनका भरपूर आनंद लेने लगें, खुद तुकबंदियाँ करने लगें, रचने लगें, यह माता-पिता को मंजूर नहीं। माता को लगता है ऐसा करते हुए तो वे उस राह से भटक जाएँगे जिस राह पर वे उन्हें चलाना चाहते हैं। जिस राह से वे उन्हें अपनी सोची हुई मंजिल पर पहुँचाना चाहते हैं। उनकी इस इच्छा में यह निहित है कि बच्चे वैसा कुछ भी नहीं करें जो वे करना चाहते हैं बल्कि वे वैसा करें जैसा माता-पिता चाहते हैं। उनके भीतर बच्चे के स्वतंत्रतापूर्वक सीखने की प्रक्रिया के प्रति सतत संदेह और गहरा डर बना रहता है। यही हाल स्कूल का भी है। गीत-कविता स्कूल और कक्षाओं की रोजमर्रा की गतिविधि का हिस्सा बन जाए यह स्कूल को मंजूर नहीं। स्कूल को लगता है इस सबके लिए समय कहाँ है। यह पाठ्यपुस्तक से बाहर की गतिविधि है। शिक्षक और शिक्षा अधिकारी चाहते हैं शिक्षक पहले परीक्षा परिणाम बेहतर लाने के लिए काम करें। दूसरी ओर हमारी संस्कृति और समाज में गीत-कविता की जो जगहें थी वे जगहें लगातार सीमित हुई हैं। गीत गाने, सुनने-सुनाने के अवसर हुआ करते थे, वे अवसर ही गीत-कविताओं को गुनगुनाते रह सकने के लिए याद करने को प्रेरित करते थे। सहेजने और रचने के लिए प्रेरित करते थे। इस सबके लिए अतिरिक्त प्रयासों की जरूरत नहीं पड़ती थी, वह जीवन-शैली का स्वाभाविक हिस्सा था। बच्चों के लिए पढ़ाई से अधिक खेलने-कूदने के लिए समय और जगहें थी। खेलने-कूदने की मस्ती के दौरान ही उनके बीच से स्वतः ही नये खेलों, तुकबंदियों और खेलगीतों और बालगीतों का सृजन भी हो जाया करता था। उनकी ये रचनाएँ चलन में आ जाया करती थीं, जबान पर चढ़ जाती थीं और सालों-साल उनकी टोलियों -के-बीच बनी रहती थी। समय के साथ उनमें कुछ कमी पाए जाने पर संशोधित होती रहती थी। अनुच्छेद के आधार पर गीत-कविता के बारे में कौन-सा कथन सही नहीं है?
राष्ट्रीय पर्वो और सांस्कृतिक समारोहों के दौरान गीत गाए जाएँ। कविताएँ सुनी और सुनायी जाएँ, इसे लेकर माता-पिताओं, स्कूल, और समाज में व्यापक सहमति है लेकिन गीत-कविताएँ। बच्चों के जीवन में रच-बस जाएँ, वे उनका भरपूर आनंद लेने लगें, खुद तुकबंदियाँ करने लगें, रचने लगें, यह माता-पिता को मंजूर नहीं। माता को लगता है ऐसा करते हुए तो वे उस राह से भटक जाएँगे जिस राह पर वे उन्हें चलाना चाहते हैं। जिस राह से वे उन्हें अपनी सोची हुई मंजिल पर पहुँचाना चाहते हैं। उनकी इस इच्छा में यह निहित है कि बच्चे वैसा कुछ भी नहीं करें जो वे करना चाहते हैं बल्कि वे वैसा करें जैसा माता-पिता चाहते हैं। उनके भीतर बच्चे के स्वतंत्रतापूर्वक सीखने की प्रक्रिया के प्रति सतत संदेह और गहरा डर बना रहता है। यही हाल स्कूल का भी है। गीत-कविता स्कूल और कक्षाओं की रोजमर्रा की गतिविधि का हिस्सा बन जाए यह स्कूल को मंजूर नहीं। स्कूल को लगता है इस सबके लिए समय कहाँ है। यह पाठ्यपुस्तक से बाहर की गतिविधि है। शिक्षक और शिक्षा अधिकारी चाहते हैं शिक्षक पहले परीक्षा परिणाम बेहतर लाने के लिए काम करें। दूसरी ओर हमारी संस्कृति और समाज में गीत-कविता की जो जगहें थी वे जगहें लगातार सीमित हुई हैं। गीत गाने, सुनने-सुनाने के अवसर हुआ करते थे, वे अवसर ही गीत-कविताओं को गुनगुनाते रह सकने के लिए याद करने को प्रेरित करते थे। सहेजने और रचने के लिए प्रेरित करते थे। इस सबके लिए अतिरिक्त प्रयासों की जरूरत नहीं पड़ती थी, वह जीवन-शैली का स्वाभाविक हिस्सा था। बच्चों के लिए पढ़ाई से अधिक खेलने-कूदने के लिए समय और जगहें थी। खेलने-कूदने की मस्ती के दौरान ही उनके बीच से स्वतः ही नये खेलों, तुकबंदियों और खेलगीतों और बालगीतों का सृजन भी हो जाया करता था। उनकी ये रचनाएँ चलन में आ जाया करती थीं, जबान पर चढ़ जाती थीं और सालों-साल उनकी टोलियों -के-बीच बनी रहती थी। समय के साथ उनमें कुछ कमी पाए जाने पर संशोधित होती रहती थी। 'सांस्कृतिक' में प्रत्यय है
राष्ट्रीय पर्वो और सांस्कृतिक समारोहों के दौरान गीत गाए जाएँ। कविताएँ सुनी और सुनायी जाएँ, इसे लेकर माता-पिताओं, स्कूल, और समाज में व्यापक सहमति है लेकिन गीत-कविताएँ। बच्चों के जीवन में रच-बस जाएँ, वे उनका भरपूर आनंद लेने लगें, खुद तुकबंदियाँ करने लगें, रचने लगें, यह माता-पिता को मंजूर नहीं। माता को लगता है ऐसा करते हुए तो वे उस राह से भटक जाएँगे जिस राह पर वे उन्हें चलाना चाहते हैं। जिस राह से वे उन्हें अपनी सोची हुई मंजिल पर पहुँचाना चाहते हैं। उनकी इस इच्छा में यह निहित है कि बच्चे वैसा कुछ भी नहीं करें जो वे करना चाहते हैं बल्कि वे वैसा करें जैसा माता-पिता चाहते हैं। उनके भीतर बच्चे के स्वतंत्रतापूर्वक सीखने की प्रक्रिया के प्रति सतत संदेह और गहरा डर बना रहता है। यही हाल स्कूल का भी है। गीत-कविता स्कूल और कक्षाओं की रोजमर्रा की गतिविधि का हिस्सा बन जाए यह स्कूल को मंजूर नहीं। स्कूल को लगता है इस सबके लिए समय कहाँ है। यह पाठ्यपुस्तक से बाहर की गतिविधि है। शिक्षक और शिक्षा अधिकारी चाहते हैं शिक्षक पहले परीक्षा परिणाम बेहतर लाने के लिए काम करें। दूसरी ओर हमारी संस्कृति और समाज में गीत-कविता की जो जगहें थी वे जगहें लगातार सीमित हुई हैं। गीत गाने, सुनने-सुनाने के अवसर हुआ करते थे, वे अवसर ही गीत-कविताओं को गुनगुनाते रह सकने के लिए याद करने को प्रेरित करते थे। सहेजने और रचने के लिए प्रेरित करते थे। इस सबके लिए अतिरिक्त प्रयासों की जरूरत नहीं पड़ती थी, वह जीवन-शैली का स्वाभाविक हिस्सा था। बच्चों के लिए पढ़ाई से अधिक खेलने-कूदने के लिए समय और जगहें थी। खेलने-कूदने की मस्ती के दौरान ही उनके बीच से स्वतः ही नये खेलों, तुकबंदियों और खेलगीतों और बालगीतों का सृजन भी हो जाया करता था। उनकी ये रचनाएँ चलन में आ जाया करती थीं, जबान पर चढ़ जाती थीं और सालों-साल उनकी टोलियों -के-बीच बनी रहती थी। समय के साथ उनमें कुछ कमी पाए जाने पर संशोधित होती रहती थी। 'मंजूर' का समानार्थी शब्द है
Recommended Questions
- किसी स्कूल में 45 मिनट अवधि के 8 कालांश होते हैं। यह कल्पना करते हुए क...
Text Solution
|
- चलो परिमेय संख्याओं के बारे में जानते हैं |पूरे पाठ का Revision सिर्फ़ ...
Text Solution
|
- “गलता लोहा* पाठ में स्कूल का मानीटर कौन है?
Text Solution
|
- लेखक के अनुसार हम एक ही भाषा का उपयोग तो करते हैं लेकिन क्या एक होते ह...
Text Solution
|
- बड़ौदा का बोर्डिंग स्कूल में मकबूल की दोस्ती कितने लड़कों से होती है?
Text Solution
|
- दादाजी के देहावसान के पश्चात् मकबूल के अब्बा ने कहाँ के बोर्डिंग स्कूल...
Text Solution
|
- शरत् के गाँव में किसने नया स्कूल खोला ?
Text Solution
|
- अध्ययन करके इस पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए। शिक्षा केवल तभी बच्च...
Text Solution
|
- कक्षा 8 के लिए पाठ्य-पुस्तक का निर्माण करते समय महत्त्वपूर्ण है: ।
Text Solution
|