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संख्या 5040 के कुल कितने गुणनखण्ड हो सकत...

संख्या 5040 के कुल कितने गुणनखण्ड हो सकते हैं जबकि यह मान लें कि उसके 1 और 5040 गुणनखण्ड नहीं हैं?

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बच्चों की दुनिया में कोई लड़ाई नहीं होती। उनके लिए दुनिया है और वे इस दुनिया में आना चाहते हैं। बच्चों को यह सुनना अच्छा नहीं लगता कि यह दुनिया इतनी बेकार है, यहाँ करने के काबिल कुछ भी नहीं है और इससे बचकर कितना दूर भागा जा सकता है। संभवतः सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि न्यू लिटिल स्कूल के शिक्षक खुले और सच्चे हैं अर्थात, ये लोग उन सभी विषयों पर बात करने के लिए तत्पर रहते हैं जिन पर बच्चे बात करना चाहते हैं। वे अपने सच्चे विचार प्रकट करते हैं और कोई बात अगर वे नहीं जानते तो स्वीकार कर लेते हैं। ज्यादातर शिक्षकों के साथ ऐसा नहीं है। सर्वेक्षण से यह स्पष्ट होता है कि 90 प्रतिशत अमेरिकी शिक्षक विवादास्पद विषयों के बारे में स्कूल में बात करने में विश्वास नहीं करते तथा बच्चों को भी इन विषयों के बारे में बात नहीं करने देते। हालाँकि वे अच्छी तरह जानते हैं कि बच्चों की इन विषयों में सबसे अधिक रुचि होती है। इसलिए पारंपरिक स्कूलों में बच्चे ज्यादा बात नहीं कर सकते और ईमानदारी से नहीं कर सकते। इसके अलावा शिक्षकों को प्रशिक्षण में बार-बार सिखाया जाता है कि अपनी अज्ञानता, अनिश्चय और उलझन को कभी स्वीकार नहीं करें। सबसे अहम बात यह है कि उनमें कूट-कूट कर यह भरा जाता है कि छात्रों से एक पेशेवर दूरी रखें और अपनी व्यक्तिगत जिंदगी और भावनाओं के बारे में कभी खुलकर बात नहीं करें। लेकिन यही वे बातें हैं जिनमें बच्चों की सबसे ज्यादा जिज्ञासा होती है, क्योंकि इसी से ये महसूस कर सकते हैं कि बड़ा होना क्या होता है। पारंपरिक स्कूलों के बारे में कौन सा कथन सही नहीं है?

Three men and 4 women can do a piece of work in 7 days, whereas 2 men and 1 woman can do it in 14 days. In how many days seven women will complete the same work: तीन पुरुष और 4 महिलाएं एक कार्य को 7 दिनों में कर सकते हैं, जबकि 2 पुरुष और 1 महिला 14 दिनों में कर सकते हैं। उसी कार्य को 7 महिलाएं कितने दिन में पूरा करेंगी

संसार के सभी देशों में शिक्षित व्यक्ति की सबसे पहली पहचान यह होती है। कि वह अपनी मातृभाषा में दक्षता से काम कर सकता है। केवल भारत ही एक ऐसा देश है, जिसमें शिक्षित व्यक्ति वह समझा जाता है, जो अपनी मातृभाषा में दक्ष हो या न हो, किन्तु अंग्रेज़ी में जिसकी दक्षता असंदिग्ध हो। संसार के अन्य देशों में सुसंस्कृत व्यक्ति वह समझा जाता है, जिसके घर में । अपनी भाषा की पुस्तकों का संग्रह हो और जिसे बराबर यह पता रहे कि उसकी भाषा के अच्छे लेखक और कवि कौन हैं तथा समय-समय पर उनकी कौन-सी कृतियाँ प्रकाशित हो रही हैं? भारत में स्थिति दूसरी है। यहाँ घर में प्रायः साज-सज्जा के आधुनिक उपकरण तो होते हैं, किन्तु अपनी भाषा की कोई पुस्तक नहीं होती है। यह दुर्वस्था भले ही किसी ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम है, किन्तु वह सुदशा नहीं है दुर्वस्था ही है। इस दृष्टि से भारतीय भाषाओं के लेखक केवल यूरोपीय और अमेरिकी लेखकों से ही हीन नहीं हैं, बल्कि उनकी किस्मत चीन, जापान के लेखकों की किस्मत से भी खराब है, क्योंकि इन सभी लेखकों की कृतियाँ वहाँ के अत्यन्त सुशिक्षित लोग भी पढ़ते हैं। केवल हम ही नहीं हैं, जिनकी पुस्तकों पर यहाँ के तथाकथित शिक्षित समुदाय की दृष्टि प्राय: नहीं पड़ती। हमारा तथाकथित उच्च शिक्षित समुदाय जो कुछ पढ़ना चाहता है, उसे अंग्रेजी में ही । पढ़ लेता है यहाँ तक उसकी कविता और उपन्यास पढ़ने की तृष्णा भी अंग्रेजी की कविता और उपन्यास पढ़कर ही समाप्त हो जाती है और उसे यह जानने की इच्छा नहीं होती कि शरीर से वह जिस समाज का सदस्य है उसके मनोभाव उपन्यास और काव्य में किस अदा से व्यक्त हो रहे हैं। भारतीय भाषाओं के साहित्य के प्रति समाज के किस वर्ग में अरुचि की भावना है?

संसार के सभी देशों में शिक्षित व्यक्ति की सबसे पहली पहचान यह होती है। कि वह अपनी मातृभाषा में दक्षता से काम कर सकता है। केवल भारत ही एक ऐसा देश है, जिसमें शिक्षित व्यक्ति वह समझा जाता है, जो अपनी मातृभाषा में दक्ष हो या न हो, किन्तु अंग्रेज़ी में जिसकी दक्षता असंदिग्ध हो। संसार के अन्य देशों में सुसंस्कृत व्यक्ति वह समझा जाता है, जिसके घर में । अपनी भाषा की पुस्तकों का संग्रह हो और जिसे बराबर यह पता रहे कि उसकी भाषा के अच्छे लेखक और कवि कौन हैं तथा समय-समय पर उनकी कौन-सी कृतियाँ प्रकाशित हो रही हैं? भारत में स्थिति दूसरी है। यहाँ घर में प्रायः साज-सज्जा के आधुनिक उपकरण तो होते हैं, किन्तु अपनी भाषा की कोई पुस्तक नहीं होती है। यह दुर्वस्था भले ही किसी ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम है, किन्तु वह सुदशा नहीं है दुर्वस्था ही है। इस दृष्टि से भारतीय भाषाओं के लेखक केवल यूरोपीय और अमेरिकी लेखकों से ही हीन नहीं हैं, बल्कि उनकी किस्मत चीन, जापान के लेखकों की किस्मत से भी खराब है, क्योंकि इन सभी लेखकों की कृतियाँ वहाँ के अत्यन्त सुशिक्षित लोग भी पढ़ते हैं। केवल हम ही नहीं हैं, जिनकी पुस्तकों पर यहाँ के तथाकथित शिक्षित समुदाय की दृष्टि प्राय: नहीं पड़ती। हमारा तथाकथित उच्च शिक्षित समुदाय जो कुछ पढ़ना चाहता है, उसे अंग्रेजी में ही । पढ़ लेता है यहाँ तक उसकी कविता और उपन्यास पढ़ने की तृष्णा भी अंग्रेजी की कविता और उपन्यास पढ़कर ही समाप्त हो जाती है और उसे यह जानने की इच्छा नहीं होती कि शरीर से वह जिस समाज का सदस्य है उसके मनोभाव उपन्यास और काव्य में किस अदा से व्यक्त हो रहे हैं। इस गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक निम्नलिखित में से क्या हो सकता है?

संसार के सभी देशों में शिक्षित व्यक्ति की सबसे पहली पहचान यह होती है। कि वह अपनी मातृभाषा में दक्षता से काम कर सकता है। केवल भारत ही एक ऐसा देश है, जिसमें शिक्षित व्यक्ति वह समझा जाता है, जो अपनी मातृभाषा में दक्ष हो या न हो, किन्तु अंग्रेज़ी में जिसकी दक्षता असंदिग्ध हो। संसार के अन्य देशों में सुसंस्कृत व्यक्ति वह समझा जाता है, जिसके घर में । अपनी भाषा की पुस्तकों का संग्रह हो और जिसे बराबर यह पता रहे कि उसकी भाषा के अच्छे लेखक और कवि कौन हैं तथा समय-समय पर उनकी कौन-सी कृतियाँ प्रकाशित हो रही हैं? भारत में स्थिति दूसरी है। यहाँ घर में प्रायः साज-सज्जा के आधुनिक उपकरण तो होते हैं, किन्तु अपनी भाषा की कोई पुस्तक नहीं होती है। यह दुर्वस्था भले ही किसी ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम है, किन्तु वह सुदशा नहीं है दुर्वस्था ही है। इस दृष्टि से भारतीय भाषाओं के लेखक केवल यूरोपीय और अमेरिकी लेखकों से ही हीन नहीं हैं, बल्कि उनकी किस्मत चीन, जापान के लेखकों की किस्मत से भी खराब है, क्योंकि इन सभी लेखकों की कृतियाँ वहाँ के अत्यन्त सुशिक्षित लोग भी पढ़ते हैं। केवल हम ही नहीं हैं, जिनकी पुस्तकों पर यहाँ के तथाकथित शिक्षित समुदाय की दृष्टि प्राय: नहीं पड़ती। हमारा तथाकथित उच्च शिक्षित समुदाय जो कुछ पढ़ना चाहता है, उसे अंग्रेजी में ही । पढ़ लेता है यहाँ तक उसकी कविता और उपन्यास पढ़ने की तृष्णा भी अंग्रेजी की कविता और उपन्यास पढ़कर ही समाप्त हो जाती है और उसे यह जानने की इच्छा नहीं होती कि शरीर से वह जिस समाज का सदस्य है उसके मनोभाव उपन्यास और काव्य में किस अदा से व्यक्त हो रहे हैं। प्रस्तुत गद्यांश के अनुसार निम्नलिखित में से कौन-सा कथन असत्य है?

संसार के सभी देशों में शिक्षित व्यक्ति की सबसे पहली पहचान यह होती है। कि वह अपनी मातृभाषा में दक्षता से काम कर सकता है। केवल भारत ही एक ऐसा देश है, जिसमें शिक्षित व्यक्ति वह समझा जाता है, जो अपनी मातृभाषा में दक्ष हो या न हो, किन्तु अंग्रेज़ी में जिसकी दक्षता असंदिग्ध हो। संसार के अन्य देशों में सुसंस्कृत व्यक्ति वह समझा जाता है, जिसके घर में । अपनी भाषा की पुस्तकों का संग्रह हो और जिसे बराबर यह पता रहे कि उसकी भाषा के अच्छे लेखक और कवि कौन हैं तथा समय-समय पर उनकी कौन-सी कृतियाँ प्रकाशित हो रही हैं? भारत में स्थिति दूसरी है। यहाँ घर में प्रायः साज-सज्जा के आधुनिक उपकरण तो होते हैं, किन्तु अपनी भाषा की कोई पुस्तक नहीं होती है। यह दुर्वस्था भले ही किसी ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम है, किन्तु वह सुदशा नहीं है दुर्वस्था ही है। इस दृष्टि से भारतीय भाषाओं के लेखक केवल यूरोपीय और अमेरिकी लेखकों से ही हीन नहीं हैं, बल्कि उनकी किस्मत चीन, जापान के लेखकों की किस्मत से भी खराब है, क्योंकि इन सभी लेखकों की कृतियाँ वहाँ के अत्यन्त सुशिक्षित लोग भी पढ़ते हैं। केवल हम ही नहीं हैं, जिनकी पुस्तकों पर यहाँ के तथाकथित शिक्षित समुदाय की दृष्टि प्राय: नहीं पड़ती। हमारा तथाकथित उच्च शिक्षित समुदाय जो कुछ पढ़ना चाहता है, उसे अंग्रेजी में ही । पढ़ लेता है यहाँ तक उसकी कविता और उपन्यास पढ़ने की तृष्णा भी अंग्रेजी की कविता और उपन्यास पढ़कर ही समाप्त हो जाती है और उसे यह जानने की इच्छा नहीं होती कि शरीर से वह जिस समाज का सदस्य है उसके मनोभाव उपन्यास और काव्य में किस अदा से व्यक्त हो रहे हैं। भारतीय लेखकों की समस्या क्या है?

संसार के सभी देशों में शिक्षित व्यक्ति की सबसे पहली पहचान यह होती है। कि वह अपनी मातृभाषा में दक्षता से काम कर सकता है। केवल भारत ही एक ऐसा देश है, जिसमें शिक्षित व्यक्ति वह समझा जाता है, जो अपनी मातृभाषा में दक्ष हो या न हो, किन्तु अंग्रेज़ी में जिसकी दक्षता असंदिग्ध हो। संसार के अन्य देशों में सुसंस्कृत व्यक्ति वह समझा जाता है, जिसके घर में । अपनी भाषा की पुस्तकों का संग्रह हो और जिसे बराबर यह पता रहे कि उसकी भाषा के अच्छे लेखक और कवि कौन हैं तथा समय-समय पर उनकी कौन-सी कृतियाँ प्रकाशित हो रही हैं? भारत में स्थिति दूसरी है। यहाँ घर में प्रायः साज-सज्जा के आधुनिक उपकरण तो होते हैं, किन्तु अपनी भाषा की कोई पुस्तक नहीं होती है। यह दुर्वस्था भले ही किसी ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम है, किन्तु वह सुदशा नहीं है दुर्वस्था ही है। इस दृष्टि से भारतीय भाषाओं के लेखक केवल यूरोपीय और अमेरिकी लेखकों से ही हीन नहीं हैं, बल्कि उनकी किस्मत चीन, जापान के लेखकों की किस्मत से भी खराब है, क्योंकि इन सभी लेखकों की कृतियाँ वहाँ के अत्यन्त सुशिक्षित लोग भी पढ़ते हैं। केवल हम ही नहीं हैं, जिनकी पुस्तकों पर यहाँ के तथाकथित शिक्षित समुदाय की दृष्टि प्राय: नहीं पड़ती। हमारा तथाकथित उच्च शिक्षित समुदाय जो कुछ पढ़ना चाहता है, उसे अंग्रेजी में ही । पढ़ लेता है यहाँ तक उसकी कविता और उपन्यास पढ़ने की तृष्णा भी अंग्रेजी की कविता और उपन्यास पढ़कर ही समाप्त हो जाती है और उसे यह जानने की इच्छा नहीं होती कि शरीर से वह जिस समाज का सदस्य है उसके मनोभाव उपन्यास और काव्य में किस अदा से व्यक्त हो रहे हैं। भारत में शिक्षित व्यक्ति की क्या पहचान है?

संसार के सभी देशों में शिक्षित व्यक्ति की सबसे पहली पहचान यह होती है। कि वह अपनी मातृभाषा में दक्षता से काम कर सकता है। केवल भारत ही एक ऐसा देश है, जिसमें शिक्षित व्यक्ति वह समझा जाता है, जो अपनी मातृभाषा में दक्ष हो या न हो, किन्तु अंग्रेज़ी में जिसकी दक्षता असंदिग्ध हो। संसार के अन्य देशों में सुसंस्कृत व्यक्ति वह समझा जाता है, जिसके घर में । अपनी भाषा की पुस्तकों का संग्रह हो और जिसे बराबर यह पता रहे कि उसकी भाषा के अच्छे लेखक और कवि कौन हैं तथा समय-समय पर उनकी कौन-सी कृतियाँ प्रकाशित हो रही हैं? भारत में स्थिति दूसरी है। यहाँ घर में प्रायः साज-सज्जा के आधुनिक उपकरण तो होते हैं, किन्तु अपनी भाषा की कोई पुस्तक नहीं होती है। यह दुर्वस्था भले ही किसी ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम है, किन्तु वह सुदशा नहीं है दुर्वस्था ही है। इस दृष्टि से भारतीय भाषाओं के लेखक केवल यूरोपीय और अमेरिकी लेखकों से ही हीन नहीं हैं, बल्कि उनकी किस्मत चीन, जापान के लेखकों की किस्मत से भी खराब है, क्योंकि इन सभी लेखकों की कृतियाँ वहाँ के अत्यन्त सुशिक्षित लोग भी पढ़ते हैं। केवल हम ही नहीं हैं, जिनकी पुस्तकों पर यहाँ के तथाकथित शिक्षित समुदाय की दृष्टि प्राय: नहीं पड़ती। हमारा तथाकथित उच्च शिक्षित समुदाय जो कुछ पढ़ना चाहता है, उसे अंग्रेजी में ही । पढ़ लेता है यहाँ तक उसकी कविता और उपन्यास पढ़ने की तृष्णा भी अंग्रेजी की कविता और उपन्यास पढ़कर ही समाप्त हो जाती है और उसे यह जानने की इच्छा नहीं होती कि शरीर से वह जिस समाज का सदस्य है उसके मनोभाव उपन्यास और काव्य में किस अदा से व्यक्त हो रहे हैं। 'संसार' शब्द का समानार्थी शब्द है

संसार के सभी देशों में शिक्षित व्यक्ति की सबसे पहली पहचान यह होती है। कि वह अपनी मातृभाषा में दक्षता से काम कर सकता है। केवल भारत ही एक ऐसा देश है, जिसमें शिक्षित व्यक्ति वह समझा जाता है, जो अपनी मातृभाषा में दक्ष हो या न हो, किन्तु अंग्रेज़ी में जिसकी दक्षता असंदिग्ध हो। संसार के अन्य देशों में सुसंस्कृत व्यक्ति वह समझा जाता है, जिसके घर में । अपनी भाषा की पुस्तकों का संग्रह हो और जिसे बराबर यह पता रहे कि उसकी भाषा के अच्छे लेखक और कवि कौन हैं तथा समय-समय पर उनकी कौन-सी कृतियाँ प्रकाशित हो रही हैं? भारत में स्थिति दूसरी है। यहाँ घर में प्रायः साज-सज्जा के आधुनिक उपकरण तो होते हैं, किन्तु अपनी भाषा की कोई पुस्तक नहीं होती है। यह दुर्वस्था भले ही किसी ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम है, किन्तु वह सुदशा नहीं है दुर्वस्था ही है। इस दृष्टि से भारतीय भाषाओं के लेखक केवल यूरोपीय और अमेरिकी लेखकों से ही हीन नहीं हैं, बल्कि उनकी किस्मत चीन, जापान के लेखकों की किस्मत से भी खराब है, क्योंकि इन सभी लेखकों की कृतियाँ वहाँ के अत्यन्त सुशिक्षित लोग भी पढ़ते हैं। केवल हम ही नहीं हैं, जिनकी पुस्तकों पर यहाँ के तथाकथित शिक्षित समुदाय की दृष्टि प्राय: नहीं पड़ती। हमारा तथाकथित उच्च शिक्षित समुदाय जो कुछ पढ़ना चाहता है, उसे अंग्रेजी में ही । पढ़ लेता है यहाँ तक उसकी कविता और उपन्यास पढ़ने की तृष्णा भी अंग्रेजी की कविता और उपन्यास पढ़कर ही समाप्त हो जाती है और उसे यह जानने की इच्छा नहीं होती कि शरीर से वह जिस समाज का सदस्य है उसके मनोभाव उपन्यास और काव्य में किस अदा से व्यक्त हो रहे हैं। 'भारतीय' शब्द में प्रत्यय है

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