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200 वस्तुओं का माध्य 50 था। बाद में पता ...

200 वस्तुओं का माध्य 50 था। बाद में पता चला कि 192 की जगह 92 तथा 88 की जगह 8 पढ़ लिया गया था। सही माध्य ज्ञात कीजिए।

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The mean of 20 observations was 85 but later it was found that 97 was misread as 79. The correct mean is : 20 अवलोकनों का माध्य 85 था, परंतु बाद में यह पाया गया कि 97 को गलती से 79 पढ़ लिया गया था | सही माध्य है :

The average marks of 18 students in an examination was 60. It was later found that the marks of one student had been wrongly entered as 63 instead of 36. The correct average is: किसी परीक्षा में 18 छात्रों के अंको का औसत 50 था। बाद में यह पाया गया कि किसी छात्र के अंक 36 के बजाय 63 लिखे गए थे। सही ओसत ___ होगा।

In a class, the average score of thirty students on a test is 69. Later on it was found that the score of one student was wrongly read as 88 instead of 58. The actual average score is: एक कक्षा में, किसी परीक्षा में तीस छात्रों का औसत अंक 69 है | बाद में, यह पाया गया कि एक छात्र का अंक गलती से 58 के बजाय 88 दर्ज कर लिया गया था | वास्तविक औसत अंक कितना है ?

Average of 50 numbers was calculated as 20 when three numbers, 26, 36 and 64 were wrongly read as 31, 46 and 59 respectively. What is the correct average? 50 संख्याओं का औसत 20 पाया गया जब तीन संख्याओं 26, 36 और 64 को क्रमशः 31, 46 और 59 पढ़ लिया गया था | सही औसत ज्ञात करें |

The average weight of 38 students is 42 kg. It was found that the figure of 46 kg was misread as 26 kg in one of the readings. What is the correct average? (correct to one decimal places) 38 छात्रों का औसत वज़न 42 किलो ग्राम है | यह पाया गया कि 46 किलो ग्राम को भूल-वश 26 किलो ग्राम पढ़ लिया गया था | सही औसत कया है ? ( एक दशमलव स्थान तक )

The average ages of Kishore, his wife and their child 6 years ago was 38 years and that of his wife and then child 8 years ago was 32 years. Find the present age of Kishore. किशोर, उसकी पत्नी और उसके बच्चे की आयु का औस 6 वर्ष पूर्व 38 वर्ष था और उसकी पत्नी व उसके बच्चे की आयु का औसत 8 वर्ष पूर्व 32 वर्ष था। किशोर की वर्तमान आयु ज्ञात कीजिए।

A person borrowed Rs.1,200 at 8% p.a. and Rs 1,800 at 10% p.a. as simple interest for the same period. He had to pay Rs1,380 in all as interest. Find the time period. एक व्यक्ति ने साधारण ब्याज की दर 8% प्रति वर्ष पर ₹ 1,200 उधार लिया और उसी अवधि के लिए 10% प्रति वर्ष पर ₹ 1,800 उधार लिया। उसे ब्याज के रूप में कुल ₹ 1,380 का भुगतान करना था। समय अवधि ज्ञात कीजिए।

प्राचीन भारत में शिक्षा को ज्ञान प्राप्ति का सबसे बड़ा स्रोत माना जाता था। व्यक्ति के जीवन को सन्तुलित और श्रेष्ठ बनाने तथा एक नई दिशा प्रदान करने में शिक्षा का महत्त्वपूर्ण योगदान था। सामाजिक बुराइयों को उसकी जड़ों से निर्मूल करने और त्रुटिपूर्ण जीवन में सुधार करने के लिए शिक्षा की नितान्त आवश्यकता थी। यह एक ऐसी व्यवस्था थी, जिसके द्वारा सम्पूर्ण जीवन ही परिवर्तित किया जा सकता था। व्यक्ति को अपने व्यक्तित्व का, विकास करने, वास्तविक ज्ञान को प्राप्त करने और अपनी समस्याओं को दूर करने के लिए शिक्षा पर निर्भर होना पड़ता था। आधुनिक युग की भाँति प्राचीन भारत में भी मनुष्य के चरित्र का उत्थान शिक्षा से ही सम्भव था। सामाजिक उत्तरदायित्वों को निष्ठापूर्वक वहन करना प्रत्येक मानव का परम उद्देश्य माना जाता है। इसके लिए भी शिक्षित होना अनिवार्य है। जीवन की वास्तविकता को समझने में शिक्षा का उल्लेखनीय योगदान रहता है। भारतीय मनीषियों ने इस ओर अपना ध्यान केन्द्रित करके शिक्षा को समाज की आधारशिला के रूप में स्वीकार किया। विद्या का स्थान किसी भी वस्तु से बहुत ऊँचा बताया गया। प्रखर बुद्धि एवं सही विवेक के लिए शिक्षा की उपयोगिता को स्वीकार किया गया। यह माना गया कि शिक्षा ही मनुष्य को व्यावहारिक कर्तव्यों का पाठ पढ़ाने और सफल नागरिक बनाने में सक्षम है। इसके माध्यम से व्यक्ति का शारीरिक, मानसिक और आत्मिक अर्थात् सर्वांगीण विकास सम्भव है। शिक्षा ने ही प्राचीन संस्कृति को संरक्षण दिया और इसके प्रसार में मदद की। विद्या का आरम्भ 'उपनयन संस्कार' द्वारा होता था। उपनयन संस्कार के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए मनुस्मृति में उल्लेख मिलता है कि गर्भाधान संस्कार द्वारा तो व्यक्ति का शरीर उत्पन्न होता है पर उपनयन संस्कार द्वारा उसका आध्यात्मिक जन्म होता है। प्राचीन काल में बच्चों को शिक्षा प्राप्त करने के लिए आचार्य के पास भेजा जाता था। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार, जो ब्रहाचर्य ग्रहण करता है। वह लम्बी अवधि की यज्ञावधि ग्रहण करता है। छान्दोग्योपनिषद् में उल्लेख मिलता है कि आरुणि ने अपने पुत्र श्वेतकेतु को ब्रह्मचारी रूप से वेदाध्ययन के लिए गुरु के पास जाने को प्रेरित किया था। आचार्य के पास रहते हुए ब्रह्मचारी को तप और साधना का जीवन बिताते हुए विद्याध्ययन में तल्लीन रहना पड़ता था। इस अवस्था में बालक जो ज्ञानार्जन करता था उसका लाभ उसको जीवन भर मिलता था। गुरु गृह में निवास करते हुए विद्यार्थी समाज के निकट सम्पर्क में आता था। गुरु के लिए समिधा, जल का लाना तथा गृह-कार्य करना उसका कर्तव्य माना जाता था। गृहस्थ धर्म की शिक्षा के साथ-साथ वह श्रम और सेवा का पाठ पढ़ता था। शिक्षा केवल सैद्धान्तिक और पुस्तकीय न होकर जीवन की वास्तविकताओं के निकट होती थी। प्रस्तुत गद्यांश का सर्वाधिक उपयुक्त शीर्षक निम्नलिखित में से कौन-सा हो सकता है?

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