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सूक्ष्मजीवों का उपयोग पादप रोगों तथा ...

सूक्ष्मजीवों का उपयोग पादप रोगों तथा पीड़कों के जैव - नियंत्रण कारक के रूप में कैसे किया जाता हैं ?

लिखित उत्तर

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अथवा , पादप रोगों तथा पीड़कों का जैविक नियंत्रण - हमारी सम्पूर्ण फसल - पैदावार का लगभग `10%` भाग पादप - रोगाणुओं तथा पीड़कों द्वारा हर साल नष्ट हो जाता है। रासायनिक विधियाँ से इसका नियंत्रण आसान तो होता है , लेकिन अंततः ये विषैले रसायन food chain द्वारा हमारे शरीर में पहुँचकर हमें कई प्रकार से हानि पहुँचाते है। अतः जैविक विधियों द्वारा इनका नियंत्रण किया जाना चाहिए। पीड़कों को जैविक रूप से नियंत्रण करने के लिए प्राकृतिक परभक्षण का सहारा लिया जाता है। कृषक कीटों एवं पीड़कों का पूर्ण रूप से नाश नहीं करते हैं बल्कि इसे एक स्तर पर नियंत्रित रखते हैं। इसके लिए विभिन्न प्रकार के संतुलनों एव अवरोधों का सहारा लिया जाता है। जैव - नियंत्रण के लिए खेतों में लगनेवाले पीड़कों तथा परभक्षी के जीवन - चक्र उनके द्वारा भोजन ग्रहण करने कि विधि एवं उनके वासस्थान का अध्ययन कर उचित जानकारी प्राप्त कि जाती है। जैविक नियंत्रण के तहत विभिन्न जीवों के बीच एक परस्परिक संबंध विकसित किया जाता है। जिससे किसी भी हानिकारक जीवों की संख्या में अत्यधिक वृद्धि नहीं हो पाती है। इन हानिकारक जीवों का पूर्णत :नाश नहीं किया जाता है ,अपितु इनपर आश्रित रहनेवाले अन्य परभक्षी तथा परजीवी कीटों की वृद्धि के लिए उचित वातावरण तैयार किया जाता है । इससे फसलों को हानि पहुँचानेवाले पीड़कों की संख्या नियंत्रित रहती है एवं पीड़कनाशियों तथा विषैले रसायनो के आवश्यकता बहुत कम जाती है। इस प्रकार जैविक विधि द्वारा पीड़कों का नियंत्रण पर्यावरण के लिए प्रतिकूल नहीं होता है। ऐफिडों तथा मच्छरों से छुटकारा पाने के लिए भृंग जिनके शरीर पर लाल तथा काली धारियाँ पाई जाती हैं तथा व्याथ पतंग का उपयोग किया जाता हैं। सूक्ष्मजीव द्वारा जैविक नियंत्रण का उदाहरण के नियंत्रण में किया जाता हैं। इसके लिए बैसिलस ध्यूरिजिऐसीस बैक्टीरिया का प्रयोग किया जाता हैं। इस जीवाणु के शुष्क स्पोर थैली में उपलब्ध होते हैं जिन्हे पानी में मिलाकर वैसे वृक्षों पर छिड़काव किया जाता हैं जिनकी पत्तियां किट , लावी द्वारा खा ली जाती हैं , जैसे सरसों समूह के पौधे , फल - वृक्ष आदि। पत्तियों पर वृद्धि करनेवाले ये लावी पत्तियों के साथ बैक्टीरिया को भी खा लेते हैं जो इनकी पाचननली में जाकर वृद्धि करते हैं। इन जीवाणुओं से टॉक्सिन या जहरीला रसायन निकलता हैं जिससे लावी की मृत्यू हो जाती हैं। इससे जीवाणु द्वारा कैटरपिलर की मृत्यू होती हैं जबकि अन्य कीटों को इससे हानि नहीं होती। अनुवांशिक अभियांत्रिकी की विधियों एवं ज्ञान में विकास होने से बैसीलस ध्यूरिजिऐसिस के टॉक्सिन के लिए जिम्मेदार जीन खोज वैज्ञानिकों ने पिछले दशक में की हैं और इसे सफलतापूर्वक पोधों में आरोपित किया है। ऐसा करने के फलस्वरूप पौधे पीड़क - प्रतिरोधी हो जाते है एवं पीड़कों का प्रकोप इन पौधों पर नहीं होता है। इसका एक समान्य उदहारण Bt - कॉटन (Bt - cotton )है। भारतवर्ष के विभिन्न राज्योँ में इसे लगाया जाता है।
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