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Class 12
PHYSICS
(i) 20 सेमि,वक्रता त्रिज्या वाले अवतल दर...

(i) 20 सेमि,वक्रता त्रिज्या वाले अवतल दर्पण के सामने इसके ध्रुव से 15 सेमि , दुरी पर रखी वस्तु के प्रतिबिम्ब की स्थिति तथा प्रकृति
(ii) 30 सेमि, फोकस दुरी वाले उत्तल दर्पण के सम्मुख उसके ध्रुव से 40 सेमी, पर रखी वस्तु के प्रतिबिम्ब की स्थिति ज्ञात कीजिए।

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The selling price of a commodity after discount of 15% is equal to its selling price after discount of 25 % on the purchase price of another item. If the sum of the purchase prices of both the items is Rs. 640, find the selling price of each item. एक वस्तु के क्रय मूल्य पर 15% की छूट के बाद उसका विक्रय मूल्य, एक दूसरी वस्तु के क्रय मूल्य पर 25% की छूट दिए जाने के बाद उसके विक्रय मूल्य के बराबर है। यदि दोनों वस्तुओं के क्रय मूल्यों का योग रु.640 है, तो प्रत्येक वस्तु का विक्रय मूल्य ज्ञात कीजिए।

जड़त्व के चैतन्य के साथ लगातार रहवासी बनकर पुल स्वयं चैतन्यमय हो उठता है प्राकृतिक जड़ भी अपनी अंतवर्ती चेतना में प्राणवान है मनुष्य द्वारा निर्मित पुरातत्व भी प्रकृति के इन्ही है प्राणो से मिलकर उसके साहचर्य के परिणाम स्वरूप कालांतर में प्रकृति में ही तब्दील हो जाता है। प्रकृति , जो ऊपर से जड़ दिखती है वह अपनी गतिशील उपस्थिति में सक्रीय और जीवट है। पहाड़ , नदी , निर्झर , पेड़ , गलम , वीरुघि सभी जड़ प्राकृति के चैतन्य अंश से लबालब है इनकी गतिमीयता , इनकी परिवर्तनशीलता कभी - कभी अलक्षित रहकर भी अपनी जीवंतता को प्रमाणित करती रहती है इसी जीवंतता के साथ मनुष्यकृत किले , पुल , मंदिर अपनी दीर्घयात्रा में प्रकृति गतिशील अंग बन जाते है। नदी की गतिशील भंगिमाओं , नदी की बदलती छवियों , नदी की जिवंत हरकतों के बीच बरसो से खड़ा पुल अपनी लखोरी ईंटो में अनंत सुर्यास्तो की लालिमा से रंजीत मात्र एक दृश्य नहीं रह जाता है। उसके व्यक्तित्व की रक्तिम आभा सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक न जाने कितने शेड्स में बदलकर उसे प्रकृति का हिस्सा बना देती है उसे अनंत रंग - स्पन्दों में बदल देती है नदी के बरजोर प्रवाह से निरंतर होड़ लेती आदि धार में कड़ी अपना प्रतिबिम्ब झांकती पुल की मेहराबे , तिकोने अनियारे दृढ़व्रती स्तम्भ और पुल के अंतराल में अनुगूँज भर्ती लहरों की लीला -ध्वनियाँ पुल को महज चुना , ईंट , रेत, पत्थर , लोहा और अन्य पार्थिव वस्तुओ का संपुंजित सायुज्य नहीं रहने देती है। कालांतर में पुल प्रकृति में तब्दील होकर चैतन्य में अपनी संवेदना -प्रणाली का भाव -विस्तार बनकर विराट जीवन की स्पंदित फांक बन जाता है। ऐसे में पुल केवल यात्राओं का साधन नहीं रहता है , वह अनेक सांस्कृतिक यात्राओं की बिम्बधमी फ्लापी नदी के विस्तृत मॉनिटर -पॉट के लहरीले स्क्रीन पर अनेक दृशय इबारते लिखता रहता ह| शिक्षण अधिगम सामग्री के सन्दर्भ में ये किस विद्वान के विचार है : "सहायक सामग्री वह सामग्री है जो कक्षा में या अन्य शिक्षण परिस्थितियों में लिखित या बोली गई पाठ्य -सामग्री को समझने में सहायता प्रदान करती है। "

जड़त्व के चैतन्य के साथ लगातार रहवासी बनकर पुल स्वयं चैतन्यमय हो उठता है प्राकृतिक जड़ भी अपनी अंतवर्ती चेतना में प्राणवान है मनुष्य द्वारा निर्मित पुरातत्व भी प्रकृति के इन्ही है प्राणो से मिलकर उसके साहचर्य के परिणाम स्वरूप कालांतर में प्रकृति में ही तब्दील हो जाता है। प्रकृति , जो ऊपर से जड़ दिखती है वह अपनी गतिशील उपस्थिति में सक्रीय और जीवट है। पहाड़ , नदी , निर्झर , पेड़ , गलम , वीरुघि सभी जड़ प्राकृति के चैतन्य अंश से लबालब है इनकी गतिमीयता , इनकी परिवर्तनशीलता कभी - कभी अलक्षित रहकर भी अपनी जीवंतता को प्रमाणित करती रहती है इसी जीवंतता के साथ मनुष्यकृत किले , पुल , मंदिर अपनी दीर्घयात्रा में प्रकृति गतिशील अंग बन जाते है। नदी की गतिशील भंगिमाओं , नदी की बदलती छवियों , नदी की जिवंत हरकतों के बीच बरसो से खड़ा पुल अपनी लखोरी ईंटो में अनंत सुर्यास्तो की लालिमा से रंजीत मात्र एक दृश्य नहीं रह जाता है। उसके व्यक्तित्व की रक्तिम आभा सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक न जाने कितने शेड्स में बदलकर उसे प्रकृति का हिस्सा बना देती है उसे अनंत रंग - स्पन्दों में बदल देती है नदी के बरजोर प्रवाह से निरंतर होड़ लेती आदि धार में कड़ी अपना प्रतिबिम्ब झांकती पुल की मेहराबे , तिकोने अनियारे दृढ़व्रती स्तम्भ और पुल के अंतराल में अनुगूँज भर्ती लहरों की लीला -ध्वनियाँ पुल को महज चुना , ईंट , रेत, पत्थर , लोहा और अन्य पार्थिव वस्तुओ का संपुंजित सायुज्य नहीं रहने देती है। कालांतर में पुल प्रकृति में तब्दील होकर चैतन्य में अपनी संवेदना -प्रणाली का भाव -विस्तार बनकर विराट जीवन की स्पंदित फांक बन जाता है। ऐसे में पुल केवल यात्राओं का साधन नहीं रहता है , वह अनेक सांस्कृतिक यात्राओं की बिम्बधमी फ्लापी नदी के विस्तृत मॉनिटर -पॉट के लहरीले स्क्रीन पर अनेक दृशय इबारते लिखता रहता है। प्रकृति के चैतन्य से कौन- सी वस्तु लबालब है ?

जड़त्व के चैतन्य के साथ लगातार रहवासी बनकर पुल स्वयं चैतन्यमय हो उठता है प्राकृतिक जड़ भी अपनी अंतवर्ती चेतना में प्राणवान है मनुष्य द्वारा निर्मित पुरातत्व भी प्रकृति के इन्ही है प्राणो से मिलकर उसके साहचर्य के परिणाम स्वरूप कालांतर में प्रकृति में ही तब्दील हो जाता है। प्रकृति , जो ऊपर से जड़ दिखती है वह अपनी गतिशील उपस्थिति में सक्रीय और जीवट है। पहाड़ , नदी , निर्झर , पेड़ , गलम , वीरुघि सभी जड़ प्राकृति के चैतन्य अंश से लबालब है इनकी गतिमीयता , इनकी परिवर्तनशीलता कभी - कभी अलक्षित रहकर भी अपनी जीवंतता को प्रमाणित करती रहती है इसी जीवंतता के साथ मनुष्यकृत किले , पुल , मंदिर अपनी दीर्घयात्रा में प्रकृति गतिशील अंग बन जाते है। नदी की गतिशील भंगिमाओं , नदी की बदलती छवियों , नदी की जिवंत हरकतों के बीच बरसो से खड़ा पुल अपनी लखोरी ईंटो में अनंत सुर्यास्तो की लालिमा से रंजीत मात्र एक दृश्य नहीं रह जाता है। उसके व्यक्तित्व की रक्तिम आभा सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक न जाने कितने शेड्स में बदलकर उसे प्रकृति का हिस्सा बना देती है उसे अनंत रंग - स्पन्दों में बदल देती है नदी के बरजोर प्रवाह से निरंतर होड़ लेती आदि धार में कड़ी अपना प्रतिबिम्ब झांकती पुल की मेहराबे , तिकोने अनियारे दृढ़व्रती स्तम्भ और पुल के अंतराल में अनुगूँज भर्ती लहरों की लीला -ध्वनियाँ पुल को महज चुना , ईंट , रेत, पत्थर , लोहा और अन्य पार्थिव वस्तुओ का संपुंजित सायुज्य नहीं रहने देती है। कालांतर में पुल प्रकृति में तब्दील होकर चैतन्य में अपनी संवेदना -प्रणाली का भाव -विस्तार बनकर विराट जीवन की स्पंदित फांक बन जाता है। ऐसे में पुल केवल यात्राओं का साधन नहीं रहता है , वह अनेक सांस्कृतिक यात्राओं की बिम्बधमी फ्लापी नदी के विस्तृत मॉनिटर -पॉट के लहरीले स्क्रीन पर अनेक दृशय इबारते लिखता रहता है। नदी की धारा में अपना प्रतिबिम्ब कौन निहारती है ?

जड़त्व के चैतन्य के साथ लगातार रहवासी बनकर पुल स्वयं चैतन्यमय हो उठता है प्राकृतिक जड़ भी अपनी अंतवर्ती चेतना में प्राणवान है मनुष्य द्वारा निर्मित पुरातत्व भी प्रकृति के इन्ही है प्राणो से मिलकर उसके साहचर्य के परिणाम स्वरूप कालांतर में प्रकृति में ही तब्दील हो जाता है। प्रकृति , जो ऊपर से जड़ दिखती है वह अपनी गतिशील उपस्थिति में सक्रीय और जीवट है। पहाड़ , नदी , निर्झर , पेड़ , गलम , वीरुघि सभी जड़ प्राकृति के चैतन्य अंश से लबालब है इनकी गतिमीयता , इनकी परिवर्तनशीलता कभी - कभी अलक्षित रहकर भी अपनी जीवंतता को प्रमाणित करती रहती है इसी जीवंतता के साथ मनुष्यकृत किले , पुल , मंदिर अपनी दीर्घयात्रा में प्रकृति गतिशील अंग बन जाते है। नदी की गतिशील भंगिमाओं , नदी की बदलती छवियों , नदी की जिवंत हरकतों के बीच बरसो से खड़ा पुल अपनी लखोरी ईंटो में अनंत सुर्यास्तो की लालिमा से रंजीत मात्र एक दृश्य नहीं रह जाता है। उसके व्यक्तित्व की रक्तिम आभा सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक न जाने कितने शेड्स में बदलकर उसे प्रकृति का हिस्सा बना देती है उसे अनंत रंग - स्पन्दों में बदल देती है नदी के बरजोर प्रवाह से निरंतर होड़ लेती आदि धार में कड़ी अपना प्रतिबिम्ब झांकती पुल की मेहराबे , तिकोने अनियारे दृढ़व्रती स्तम्भ और पुल के अंतराल में अनुगूँज भर्ती लहरों की लीला -ध्वनियाँ पुल को महज चुना , ईंट , रेत, पत्थर , लोहा और अन्य पार्थिव वस्तुओ का संपुंजित सायुज्य नहीं रहने देती है। कालांतर में पुल प्रकृति में तब्दील होकर चैतन्य में अपनी संवेदना -प्रणाली का भाव -विस्तार बनकर विराट जीवन की स्पंदित फांक बन जाता है। ऐसे में पुल केवल यात्राओं का साधन नहीं रहता है , वह अनेक सांस्कृतिक यात्राओं की बिम्बधमी फ्लापी नदी के विस्तृत मॉनिटर -पॉट के लहरीले स्क्रीन पर अनेक दृशय इबारते लिखता रहता है। लेखक के अनुसार पुरातत्व का निर्माण किसने किया है ?

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