ऐसी प्रेरित विद्युत धारा जिसमें धारा की दिशा एवं मान समय के साथ परवर्तित होते रहते हैं, प्रत्यावर्ती धारा कहलाती है। र प्रत्यावर्ती धारा को उत्पन्न करने वाली युक्ति को प्रत्यावर्ती धारा जनित्र कहते हैं।
बनावट - इसमें एक विद्युत रोधी तांबे के तारों की बनी आयताकार कुण्डली ABCD होती है। इसे कच्चे लोहे की छड़ पर लपेटा जाता है जिसे आर्मेचर कहते हैं । आर्मेचर को स्थायी चुम्बकों के मध्य रखा जाता है। इस कुण्डली के दोनों सिरे आर्मेचर की भुजा पर लगे धातु वलयों से जुड़े रहते हैं। इन वलयों को सीवलय कहते हैं। सपीवलय `R_1` व `R_2` का बंध कार्बन ब्रुशों `B_1` व `B_2` से होता है। कार्बन ब्रुशों की सहायता से बाहरी परिपथ में धारा प्राप्त होती है।
सिद्धान्त-यह युक्ति विद्युत चुम्बकीय प्रेरण पर आधारित है।
कार्यविधि-जब आर्मेचर को शक्तिशाली चुम्बकों के मध्य गति करवाई जाती है तब चुम्बकीय प्रेरण के कारण आर्मेचर की कुण्डली में प्रेरित विद्युत धारा उत्पन्न होती है। प्रेरित धारा का मान आर्मेचर के घूर्णन पर निर्भर करता है। जब आर्मेचर चुम्बकीय क्षेत्र के लम्बवत् आता है तब धारा का मान अधिकतम एवं दिशा अलग होती है। जब आर्मेचर के आधे घूर्णन के बाद कुण्डली चुम्बकीय क्षेत्र के समान्तर आती है तब धारा का मान न्यूनतम एवं दिशा पूर्व की विपरीत होती है। इस प्रकार एक घूर्णन में धारा का मान एवं दिशा परिवर्तित होती रहती है, अत: बाहरी परिपथ में बदलने वाली धारा प्राप्त होती है जिसे प्रत्यावर्ती धारा कहते हैं। विद्युत धारा का मान चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता, कुण्डली के फेरों की संख्या एवं आर्मेचर के घूर्णन पर निर्भर करती है।