दो तरंगों का व्यतिकरण-"जब किसी माध्यम में समान आवृत्ति तथा लगभग समान आयाम की दो तरंगें एकसाथ एक ही दिशा में चलती है तो इनके अध्यारोपण से माध्यम के कुछ बिन्दुओं पर परिणामी तीव्रता अधिकतम होती है। इसके विपरीत कुछ अन्य बिन्दुओं पर परिणामी तीव्रता न्यूनतम होती है। अध्यारोपण के कारण ऊर्जा के पुनर्वितरण की इस घटना को व्यतिकरण कहते हैं।" जिन बिन्दुओं पर तीव्रता अधिकतम होती है, उन स्थानों पर हुए व्यतिकरण को संपोषी व्यतिकरण (constructive interference) तथा जिन बिन्दुओं पर तीव्रता न्यूनतम होती है, उन स्थानों पर हुए व्यतिकरण को विनाशी व्यतिकरण (destructive interference) कहते हैं।
परिणामी तीव्रता का व्यंजक-माना किसी माध्यम में एक ही आवृत्ति की दो सरल आवर्त प्रगामी तरंगें, जिनके आयाम `a_(1)` तथा `a_(2)` है, एकसाथ एक ही दिशा में चल रही हैं। यदि किसी क्षण : पर माध्यम के किसी बिन्दु पर इन तरंगों के कारण कण के विस्थापन क्रमशः `y_(1)` व `y_(2)` हैं तथा तरंगों के बीच कलान्तर `phi`है,तब
`y_(1) = a_(1) sin (omegat-kx)`...(1)
तथा `y_(2) = a_(2) sin (omegat-kx+phi)....(2)`
जहाँ `omega= 2pi n` तथा n, प्रत्येक तरंग की आवृत्ति है। अध्यारोपण के सिद्धान्त से
के उस बिन्दु पर परिणामी विस्थापन
`y=y_(1)+y_(2)`
`=a_(1)sin(omegat-kx)+a_(2)sin(omegat-kx+phi)`
`=a_(1)sin(omegat-kx)+a_(2)sin(omegat-kx)cosphi`
`+a_(2)cos(omegat-kx)sinphi`
`=(a_(1)+a_(2)cosphi)sin(omegat-kx)`
`+(a_(2)sinphi)cos(omegat-kx)`
`a_(1)+a_(2)cosphi=Rcos theta...(3)`
`a_(2)sintheta=Rsintheta...(4)`
जहाँ R व `theta` नए नियत्तांक है, तब
`y = R costheta sin (omegat-kx) +R sin theta cos (omegat-kx)`
अथवा `y = R sin (omegat - kx +theta)`
यह भी एक सरल आवर्त प्रगामी तरंग का समीकरण है, जिसका आयाम R है। समीकरण (3) व समीकरण (4) कावर्ग करके जोड़ने पर, `R^(2) (sin^(2)theta + cos^(2)theta)= (a_(1) + a_(2) cos phi)^(2) + (a_(2) sintheta)^(2)`
`=a_(2)^(1)+a_(2)^(2)cos^(2)phi+2a_(1)a_(2)cosphi`
`+a_(2)^(2)sin^(2)phi`
अथवा`R^(2)=a_(1)^(2)+a_(2)^(2)+2a_(1)a_(2)cosphi`
चूँकि तीव्रता, आयाम के वर्ग के अनुक्रमानुपाती होती है। अत: तरंग की परिणामी तीव्रता
`I=KR^(2)=Ka_(1)^(2)+Ka_(1)a_(2)costheta...(5)`
जहाँ K एक अनुक्रमानुपाती नियतांक है। यदि व्यतिकारी तरंगों की अलग-अलग तीव्रताएँ `I_(1)`व `I_(2)` हैं तो
`I_(1)=Ka_(1)^(2)`तथा `I_(2) = Ka_(2)^(2)`
अतः `I=I_(1) +I_(2)+2sqrt(I_(1)I_(2)cosphi)...(6)`
इस प्रकार किसी बिन्दु पर परिणामी तीव्रता उस बिन्दु पर मिलने वाली दोनों तरंगों के बीच कलान्तर`phi` पर निर्भर करती है।
संपोषी व्यतिकरण—किसी बिन्दु पर तीव्रता अधिकतम होगी, जब `cosphi=+1` अर्थात्
`phi= 0,2pi, 4pi,....`
अथवा कलान्तर `phi= 2 mpi` (जहाँ m = 0,1, 2,........) तथा पथान्तर = `(lambda)/(2pi)xx कलान्तर`
`(lambda)/(2pi)xx2mpi`
`=mlambda=0,lambda,2lambda,......`
अतः समीकरण (6) से,
`I_(max)=I_(1)+I_(2)+2sqrtI_(1)I_(2))`
`=(sqrtI_(1)+sqrtI_(2))^(2)`
`=K(a_(1)+a_(2))^(2)`
अत: जिन बिन्दुओं पर व्यतिकरण करने वाली तरंगें एक ही कला में मिलती हैं, अर्थात् जिनके बीच कलान्तर `0,2pi, 4pi,.......` तथा पथान्तर `0,lambda, 2lambda, .......` होता है, उन बिन्दुओं पर परिणामी तीव्रता अधिकतम होती है। इसका मान `K(a_(1) +a_(2))^(2)`, दोनों तरंगों की तीव्रताओं के योग `K (a_(1)^(2) +a_(2)^(2))`
से अधिक है। इन बिन्दुओं पर परिणामी आयाम `(a_(1) + a_(2))` दोनों तरंगों के आयामों के योग के बराबर होता है।
विनाशी व्यतिकरण—किसी बिन्दु पर तीव्रता न्यूनतम होगी, जब
`cosphi= -1`, अर्थात्
`phi= pi,3pi, 5pi, .....`
अथवा कलान्तर` phi= (2 m - 1) pi`[जहाँ m = 1, 2, 3,.......]
तथा पथान्तर `(lambda)/(2pi)= xx"कलान्तर"`
`=(lambda)/(2pi)xx(2m-1)pi=(2m-1)(lambda)/(2)=(lambda)/(2)`
`=(lambda)/(2),(3lambda)/(2),(5lambda)/(2),....`
अत: समीकरण (6) से,
`I_(max)=I_(1)+I_(2)-2sqrt(I_(1)I_(2))`
`=(sqrtI_(1)-sqrtI_(2))^(2)=K(a_(1)~a_(2))^(2)`
अत: जिन बिन्दुओं पर व्यतिकरण करने वाली तरंगें विपरीत कला में मिलती हैं, अर्थात् जिनके बीच कलान्तर `pi, 3pi, 5pi, .......`.तथा पथान्तर ,`(lambda)/(2), (3lambda)/(2) (5lambda)/(2)....` होता है, उन बिन्दुओं पर परिणामी तीव्रता न्यूनतम होती है, इसका मान `K(a_(1)~a_(2))^(2)`, दोनों तरंगों की तीव्रताओं के योग `K (a_(1)^(2)+a_(2)^(2)) `से कम है। इन बिन्दुओं पर परिणामी आयाम `(a_(1)~a_(2))`दोनों तरंगों के आयामों के अन्तर के बराबर होता है।