विवर्तन तथा व्यतिकरण में अन्तर-(लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर-1 16 देखिए।)
एकल झिरों द्वारा विवर्तन प्रतिरूप प्राप्त करने की ज्यामितीय व्यवस्था-एकल झिरों द्वारा प्रकाश का विवर्तन प्रतिरूप प्राप्त करने के लिए प्रयक्त उपकरण की व्यवस्था चित्र में प्रदर्शित है। इसमें AB एक संकीर्ण झिरी है. जिसकी लम्बाई कागज के तल के लम्बवत् है। S एक लम्बा एकवर्णी प्रकाश स्रोत है, जिसकी लम्बाई झिरी के समान्तर है। प्रकाश स्रोत व झिरों के बीच एक उत्तल लेन्स L, इस प्रकार रखा है कि प्रकाश स्रोत S, लेन्स `L_(1)` के फोकस तल में है। झिरी के दूसरी ओर उसके बिल्कुल समीप ही एक अन्य उत्तल लेन्स `L_(2)` रखा है तथा इस लेन्स के फोकस तल में एक पर्दा X-Y रखा है। लेन्स `L_(1)` प्रकाश स्रोत S से चलने वाले प्रकाश पुंज को समान्तर कर देता है तथा लेन्स `L_(2)`, झिरी से विवर्तित प्रकाश को पर्दे X-Y पर फोकस कर देता है। इस प्रकार पर्दे पर एकल झिरों का विवर्तन प्रतिरूप प्राप्त होता है।
व्याख्या-हाइगेन्स के तरंग सिद्धान्त से झिरीं AB के प्रत्येक बिन्दु से निकलने वाली द्वितीयक तरंगिकाएँ सभी दिशाओं में आगे बढ़ती है, जो तरंगिकाएँ विचलित नहीं होती हैं, वे लेन्स `L_(2)` द्वारा बिन्दु O पर फोकस हो जाती हैं। चूँकि ये सभी तरंगिकाएँ एक ही कला में है, अत: ये केन्द्रीय बिन्दु ०पर दीप्त बैण्ड बनाती हैं, जिसे मुख्य उच्चिष्ठ कहते हैं।
निम्निष्ठों की स्थिति–माना झिरौं AB से `theta` कोण पर विवर्तित होने वाली तरंगिकाएँ पर्दे के Pबिन्दु पर फोकस होती हैं। बिन्दुओं A तथा Bसे, बिन्दु P तक पहुँचने वाली तरंगों के बीच पथान्तर ज्ञात करने हेतु बिन्दु A तथा बिन्दु B से P तक पहुँचने वाली तरंगिका के मार्ग पर लम्ब AK डालते हैं। स्पष्ट है कि बिन्दुओं A व B से बिन्दु P तक पहुंचने वाली तरंगिकाओं के बीच पथान्तर BK है। माना `BK = lambda`, जहाँ मे`lambda` प्रयुक्त प्रकाश की तरंगदैर्घ्य है।

माना झिरी AB को । बराबर भागों में विभक्त किया जाता है। अतः ये बिन्दु P पर अदीप्त बैण्ड उत्पन्न करेंगे। अत: P बिन्दु पर पहुँचने वाली तरंगिकाओं के बीच `lambda//2` का पथान्तर होगा।
माना झिरौं AB की चौड़ाई e है, तब `triangleAKB` से,`sintheta= BK//AB`
, अर्थात्`BK = AB sintheta = e sin theta`
यदि बिन्दु P पर mवें निम्निष्ठ के लिए विवर्तन कोण मे`theta` है तो पथान्तर `BK = mlambda` होगा। अतः सभी निम्निष्ठों की स्थितियों `(theta)` के लिए व्यापक सूत्र
`esintheta=+-mlambda`(जहाँ m = 1,2,3, .......) यदि `theta` बहुत छोटा है तो `sin theta~~theta`, अतः `etheta = +- mlambda`
अथवा`theta= +- mlambda//e`
इस प्रकार प्रथम, द्वितीय, तृतीय निम्निष्ठों के लिए विवर्तन कोण क्रमशः`theta_(1)=+-lambda//e,theta_(2)=+-2lambda//e,theta_(3)=+-3lambda//e,.....` होंगे।
+-चिह्न प्रदर्शित करता है कि ये निम्निष्ठ मुख्य उच्चिष्ठ के दोनों ओर प्राप्त होते हैं।
केन्द्रीय उच्चिष्ठ की कोणीय चौड़ाई-"केन्द्रीय उच्चिष्ठ के दोनों ओर प्रथम निम्निष्ठों के बीच की कोणीय दूरी को केन्द्रीय उच्चिष्ठ की कोणीय चौड़ाई कहते हैं।"
यदि विवर्तन कोण 0 तथा तीव्रता I के बीच वक्र खींचा जाए तो यह वक्र चित्र के अनुसार प्राप्त होता है।
चूँकि प्रथम निम्निष्ठ, केन्द्रीय उच्चिष्ठ के दोनों ओर उस कोण `theta` की दिशा में पड़ते हैं, जिसके लिए
`e sin theta=lambda`
अथवा`sin theta= lambda//e`
यदि कोण `theta` छोटा है तो `sin theta ~~theta`
कुल कोणीय चौड़ाई `2theta =(2lambda)/(e)`

यदि पर्दे व झिरों के बीच की दूरी D है तथा केन्द्रीय उच्चिष्ठ दोनों ओर 2 x दूरी तक फैला है तो
केन्द्रीय उच्चिष्ठ की रैखिक चौड़ाई `2x=(2lambda)/(e)xxD`
यदि फोकसन लेन्स, झिरौं AB के बहुत समीप स्थित है तथा इसकी फोकस दूरी / है तो पर्दे पर केन्द्रीय उच्चिष्ठ की रैखिक चौड़ाई
`2x=(2lambda)/(e)xxf`
जहाँ xप्रथम निम्निष्ठ की केन्द्रीय उच्चिष्ठ से रेखीय दूरी है।
