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Class 11
PHYSICS
पृथ्वी तल से ऊर्ध्वाधरतः ऊपर की ओर फेंकी...

पृथ्वी तल से ऊर्ध्वाधरतः ऊपर की ओर फेंकी गयी गेंद h मी. ऊँचाई पर जाकर कुछ समय पश्चात पृथ्वी पर ही लौट आती है, तब उसकी दूरी .................. तथा विस्थापन................. होंगे |

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Given that the lengths of the paths of a ball thrown with different speeds by two boys are the same, and the average speed for the first and second throws are respectively 90 km/h and 162 km/h, then what is the time taken by the first throw to cover the length if the same for the second thrown is one second? दिया गया है कि दो लड़कों के द्वारा अलग-अलग चाल से फेंकी गयी गेंदों के मार्ग की लंबाई समान है तथा पहले और दूसरे फेंकी गयी गेंदों की औसत गति क्रमशः 90 किमी / घंटा और 162 किमी / घंटा है, अगर दूसरे फेंकी गयी गेंद ने इस लंबाई को कवर करने के लिए एक सेकंड का समय लिया तो पहली फेंकी गयी गेंद द्वारा इस लंबाई को कवर करने के लिए लिया गया समय क्या है?

सुप्रसिद्ध गीतकार गोपालदास 'नीरज' ने अपनी एक रचना में कहा है। जैसा हो आघात रे वैसा बजे सितार, तेरी ही आवाज को प्रतिध्वनि है संसारा हम वाद्ययंत्रों पर जैसा आघात करते हैं वैसी ही ध्वनि उनसे निकलती है। यदि कठोरता से आघात करते हैं तो कठोर ध्वनिः उत्पन्न होती है, लेकिन यदि कोमलता से आघात करते हैं तो कर्णप्रिय कोमल ध्वनि उत्पन्न होती है। यदि हम किसी वाद्ययंत्र को । नियमपूर्वक ठीक से बजाते हैं तो सही राग उत्पन्न होता है, अन्यथा सही राग उत्पन्न होने का प्रश्न ही नहीं उठता। सही राग उत्पन्न न होने की स्थिति में गुणीजन हमारे गायन अथवा वादन की ओर आकर्षित ही नहीं होंगे। हमारे जीवन रूपी सितार की भी यही स्थिति - होती है। यदि हम अनुशासन में रहते हुए प्रत्येक कार्य नियमानुसार करते हैं तो जीवन रूपी सितार से उत्पन्न होने वाला प्रत्येक राग रूपी कार्य हमें सार्थकता और आनंद ही प्रदान करेगा। इस संसार में हम जो कुछ सोचते, की '' है " वहीं हमारे पास लौटकर आता है। न कम, न अधिक। जब हम किसी खंडहर अथवा वादी में कोई अच्छा शब्द या वाक्य बोलते हैं तो कुछ देर बाद वही अच्छा शब्द या वाक्य गँजता हुआ हमें सुनाई पड़ता है। और यदि हम कोई बुरा, अपमानजनक अथवा घृणास्पद शब्द या वाक्य बोलते हैं तो कुछ देर बाद वही बुरा, अपमानजनक नि अथवा घृणास्पद शब्द या वाक्य हमें सुनाई पड़ता है। यदि हम उ सुरीली आवाज निकालते हैं तो वैसी ही सुरीली आवाज लौटकर हा हमारे पास आती है, लेकिन यदि हम डरावनी आवाज निकालते हैं सं तो वैसी ही डरावनी आवाज लौटकर आती है। हम जैसा एक बार बोलते हैं। वैसा ही कई बार सुनने को अभिशप्त होते हैं। पर यह बात अनुभव करते हुए भी इसका आशय हम समझते नहीं। चूँकि आवाज के लौटकर आने में थोड़ा वक्त लगता है, इसलिए हम उसे स्वतंत्र घटना मान लेते हैं। यह अहसास नहीं कर पाते कि हमारे ही किए हुए काज, हमारे ही सोचे हुए भाव अलग दिशा से हमारे पास आते दिख रहे हैं। एक ही वाद्ययंत्र से कोमल और कठोर ध्वनि निकलना किस पर निर्भर होता है?

सुप्रसिद्ध गीतकार गोपालदास 'नीरज' ने अपनी एक रचना में कहा है। जैसा हो आघात रे वैसा बजे सितार, तेरी ही आवाज को प्रतिध्वनि है संसारा हम वाद्ययंत्रों पर जैसा आघात करते हैं वैसी ही ध्वनि उनसे निकलती है। यदि कठोरता से आघात करते हैं तो कठोर ध्वनिः उत्पन्न होती है, लेकिन यदि कोमलता से आघात करते हैं तो कर्णप्रिय कोमल ध्वनि उत्पन्न होती है। यदि हम किसी वाद्ययंत्र को । नियमपूर्वक ठीक से बजाते हैं तो सही राग उत्पन्न होता है, अन्यथा सही राग उत्पन्न होने का प्रश्न ही नहीं उठता। सही राग उत्पन्न न होने की स्थिति में गुणीजन हमारे गायन अथवा वादन की ओर आकर्षित ही नहीं होंगे। हमारे जीवन रूपी सितार की भी यही स्थिति - होती है। यदि हम अनुशासन में रहते हुए प्रत्येक कार्य नियमानुसार करते हैं तो जीवन रूपी सितार से उत्पन्न होने वाला प्रत्येक राग रूपी कार्य हमें सार्थकता और आनंद ही प्रदान करेगा। इस संसार में हम जो कुछ सोचते, की '' है " वहीं हमारे पास लौटकर आता है। न कम, न अधिक। जब हम किसी खंडहर अथवा वादी में कोई अच्छा शब्द या वाक्य बोलते हैं तो कुछ देर बाद वही अच्छा शब्द या वाक्य गँजता हुआ हमें सुनाई पड़ता है। और यदि हम कोई बुरा, अपमानजनक अथवा घृणास्पद शब्द या वाक्य बोलते हैं तो कुछ देर बाद वही बुरा, अपमानजनक नि अथवा घृणास्पद शब्द या वाक्य हमें सुनाई पड़ता है। यदि हम उ सुरीली आवाज निकालते हैं तो वैसी ही सुरीली आवाज लौटकर हा हमारे पास आती है, लेकिन यदि हम डरावनी आवाज निकालते हैं सं तो वैसी ही डरावनी आवाज लौटकर आती है। हम जैसा एक बार बोलते हैं। वैसा ही कई बार सुनने को अभिशप्त होते हैं। पर यह बात अनुभव करते हुए भी इसका आशय हम समझते नहीं। चूँकि आवाज के लौटकर आने में थोड़ा वक्त लगता है, इसलिए हम उसे स्वतंत्र घटना मान लेते हैं। यह अहसास नहीं कर पाते कि हमारे ही किए हुए काज, हमारे ही सोचे हुए भाव अलग दिशा से हमारे पास आते दिख रहे हैं। 'कर्णप्रिय ध्वनि का आशय है

सुप्रसिद्ध गीतकार गोपालदास 'नीरज' ने अपनी एक रचना में कहा है। जैसा हो आघात रे वैसा बजे सितार, तेरी ही आवाज को प्रतिध्वनि है संसारा हम वाद्ययंत्रों पर जैसा आघात करते हैं वैसी ही ध्वनि उनसे निकलती है। यदि कठोरता से आघात करते हैं तो कठोर ध्वनिः उत्पन्न होती है, लेकिन यदि कोमलता से आघात करते हैं तो कर्णप्रिय कोमल ध्वनि उत्पन्न होती है। यदि हम किसी वाद्ययंत्र को । नियमपूर्वक ठीक से बजाते हैं तो सही राग उत्पन्न होता है, अन्यथा सही राग उत्पन्न होने का प्रश्न ही नहीं उठता। सही राग उत्पन्न न होने की स्थिति में गुणीजन हमारे गायन अथवा वादन की ओर आकर्षित ही नहीं होंगे। हमारे जीवन रूपी सितार की भी यही स्थिति - होती है। यदि हम अनुशासन में रहते हुए प्रत्येक कार्य नियमानुसार करते हैं तो जीवन रूपी सितार से उत्पन्न होने वाला प्रत्येक राग रूपी कार्य हमें सार्थकता और आनंद ही प्रदान करेगा। इस संसार में हम जो कुछ सोचते, की '' है " वहीं हमारे पास लौटकर आता है। न कम, न अधिक। जब हम किसी खंडहर अथवा वादी में कोई अच्छा शब्द या वाक्य बोलते हैं तो कुछ देर बाद वही अच्छा शब्द या वाक्य गँजता हुआ हमें सुनाई पड़ता है। और यदि हम कोई बुरा, अपमानजनक अथवा घृणास्पद शब्द या वाक्य बोलते हैं तो कुछ देर बाद वही बुरा, अपमानजनक नि अथवा घृणास्पद शब्द या वाक्य हमें सुनाई पड़ता है। यदि हम उ सुरीली आवाज निकालते हैं तो वैसी ही सुरीली आवाज लौटकर हा हमारे पास आती है, लेकिन यदि हम डरावनी आवाज निकालते हैं सं तो वैसी ही डरावनी आवाज लौटकर आती है। हम जैसा एक बार बोलते हैं। वैसा ही कई बार सुनने को अभिशप्त होते हैं। पर यह बात अनुभव करते हुए भी इसका आशय हम समझते नहीं। चूँकि आवाज के लौटकर आने में थोड़ा वक्त लगता है, इसलिए हम उसे स्वतंत्र घटना मान लेते हैं। यह अहसास नहीं कर पाते कि हमारे ही किए हुए काज, हमारे ही सोचे हुए भाव अलग दिशा से हमारे पास आते दिख रहे हैं। जीवन के साथ सितार की तुलना किसलिए की गई है?

सुप्रसिद्ध गीतकार गोपालदास 'नीरज' ने अपनी एक रचना में कहा है। जैसा हो आघात रे वैसा बजे सितार, तेरी ही आवाज को प्रतिध्वनि है संसारा हम वाद्ययंत्रों पर जैसा आघात करते हैं वैसी ही ध्वनि उनसे निकलती है। यदि कठोरता से आघात करते हैं तो कठोर ध्वनिः उत्पन्न होती है, लेकिन यदि कोमलता से आघात करते हैं तो कर्णप्रिय कोमल ध्वनि उत्पन्न होती है। यदि हम किसी वाद्ययंत्र को । नियमपूर्वक ठीक से बजाते हैं तो सही राग उत्पन्न होता है, अन्यथा सही राग उत्पन्न होने का प्रश्न ही नहीं उठता। सही राग उत्पन्न न होने की स्थिति में गुणीजन हमारे गायन अथवा वादन की ओर आकर्षित ही नहीं होंगे। हमारे जीवन रूपी सितार की भी यही स्थिति - होती है। यदि हम अनुशासन में रहते हुए प्रत्येक कार्य नियमानुसार करते हैं तो जीवन रूपी सितार से उत्पन्न होने वाला प्रत्येक राग रूपी कार्य हमें सार्थकता और आनंद ही प्रदान करेगा। इस संसार में हम जो कुछ सोचते, की '' है " वहीं हमारे पास लौटकर आता है। न कम, न अधिक। जब हम किसी खंडहर अथवा वादी में कोई अच्छा शब्द या वाक्य बोलते हैं तो कुछ देर बाद वही अच्छा शब्द या वाक्य गँजता हुआ हमें सुनाई पड़ता है। और यदि हम कोई बुरा, अपमानजनक अथवा घृणास्पद शब्द या वाक्य बोलते हैं तो कुछ देर बाद वही बुरा, अपमानजनक नि अथवा घृणास्पद शब्द या वाक्य हमें सुनाई पड़ता है। यदि हम उ सुरीली आवाज निकालते हैं तो वैसी ही सुरीली आवाज लौटकर हा हमारे पास आती है, लेकिन यदि हम डरावनी आवाज निकालते हैं सं तो वैसी ही डरावनी आवाज लौटकर आती है। हम जैसा एक बार बोलते हैं। वैसा ही कई बार सुनने को अभिशप्त होते हैं। पर यह बात अनुभव करते हुए भी इसका आशय हम समझते नहीं। चूँकि आवाज के लौटकर आने में थोड़ा वक्त लगता है, इसलिए हम उसे स्वतंत्र घटना मान लेते हैं। यह अहसास नहीं कर पाते कि हमारे ही किए हुए काज, हमारे ही सोचे हुए भाव अलग दिशा से हमारे पास आते दिख रहे हैं। 'हम जैसा करते हैं वैसा पाते हैं''- यह समझाने के लिए लेखक ने किसका उदाहरण दिया है?

A pyramid has a square base. The side of square is 12 cm and height of pyramid is 21 cm. The pyramid is cut into 3 parts by 2 cuts parallel to its base. The cuts are at height of 7 cm and 14 cm respectively from the base. What is the difference (in cm^3 ) in the volume of top most and bottom most part? एक पिरामिड का आधार एक वर्ग है। वर्ग की भुजा 12 से.मी. तथा पिसमिड की ऊँचाई 21 से.मी. है। पिरामिड को उसके आधार के समांतर 2 कर्टावों से 3 भागों में काटा जाता है। कटाव आधार से. क्रमशः 7 से.मी. तथा 14 से.मी. को ऊँचाई पर है। सबसे ऊपर तथा सबसे नीचे के भाग के आयतन का अंतर ( से.मी.^3 में)क्या हैं।

An aeroplane flying horizontally at a height of 3 Km. above the ground is observed at a certain point on earth to subtend an angle of 60^@ . After 15 sec flight, its angle of elevation is changed to 30^@ . The speed of the aeroplane (taking sqrt3 = 1.732) is- कोई वायुयान पृथ्वी की सतह से 3 कि.मी. ऊपर क्षेतिज उड़ रहा है। पृथ्वी से किसी बिन्दु से यह देखने में आता है कि वह 60^@ के कोण पर कक्षांतरित होता है। 15 सेकण्ड बाद उसका उन्नयन कोण 30^@ परिवर्तित हो जाता हैं वायुयान की चाल बताइए। ( sqrt3 =1.732)