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MATHS
आफताब अपनी पुत्री से कहता है , सात वर्ष ...

आफताब अपनी पुत्री से कहता है , सात वर्ष पूर्व मै तुमसे सात गुनी आयु का था । अब से 3 वर्ष बाद मै तुमसे केवल तीन गुनी आयु का रह जाऊँगा । इस स्थिति को बीजगणितीय एवं ग्राफिय रूपों में व्यक्त कीजिए ।

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10 years ago, a father’s age was 3 2 1 times that of his son and 10 years from now, the father’s age will be 2 times 4 1 that of the son. What will be the sum of the ages of the father and the son at present? 10 वर्ष पहले, पिता की आयु उसके बेटे की आयु की 3 1/2 गुना थी तथा अब से 10 साल बाद पिता की आयु बेटे की आयु की 2 1/4 हो जाएगी । वर्तमान में पिता एवं पुत्र की उम्र का योग क्या होगा?

Eight years ago, the ratio of ages of A and B was 9: 10. The ratio of their ages four years from now will be 12 : 13. What is the age (In years) of C now, if his age is 6 years more than that of A? आठ वर्ष पहले, A और B की उम्र में 9 : 10 का अनुपात था | अब से चार वर्ष बाद उनकी उम्र का अनुपात 12:13 हो जाएगा | C की वर्तमान आयु ( वर्ष में ) ज्ञात करें, यदि उसकी उम्र A की उम्र से 6 साल अधिक है |

10 years ago, a father’s age was 3 2 1 times that of his son and 10 years from now, the father’s age will be 2 times 4 1 that of the son. What will be the sum of the ages of the father and the son at present? 10 वर्ष पहले, एक पिता की आयु उसके बेटे की आयु की 3 1/2 गुना थी तथा अब से 10 साल बाद पिता की आयु बेटे की आयु से 2 1/4 गुना हो जाएगी। वर्तमान में पिता एवं पुत्र की उम्र का योग क्या होगा?

In a school, 3/8 of the number of students are girls and the rest are boys, One -third of the number of boys are below 10 years and 2/3 of the number of girls are also below 10 years. If the number of students of age 10 Or more years is 260, then the number of boys in the school is: किसी विद्यालय में छात्रों की संख्या का 3/8 भाग लड़कियाँ और शेष लड़के है| लड़को की संख्या का एक तिहाई 10 वर्ष से कम है और लड़कियों की संख्या का 2/3 भी 10 वर्ष से कम है| यदि 10 वर्ष या उससे अधिक आयु वाले छात्रों की संख्या 260 है, तो विद्यालय में लड़को की संख्या ज्ञात कीजिए |

बौद्ध शिक्षण पद्धति का आरम्भ स्वयं बुद्ध ने सरल तथा जनमानस की भाषा में जीवन के तत्त्वों के उपदेश तथा जगह-जगह चर्चा करके किया। लोगों को शिक्षित करने के लिए महात्मा बुद्ध ने व्याख्यान, प्रश्नोत्तर प्रासंगिक उपमा, दृष्टान्त एवं कथा को माध्यम बनाया बुद्ध के बाद से बौद्ध शिक्षा पद्धति भी एक निश्चित स्वरूप, संगठन के साथ हिन्दू शिक्षा पद्धति से अलग स्वतन्त्र शिक्षा पद्धति के रूप में विकसित हुई। प्रारम्भ में हिन्दू तथा बौद्ध शिक्षा पद्धति के मूल में कोई विशेष अन्तर नहीं था, किन्तु बाद में आकर दोनों शिक्षा प्रणालियों के आदर्श एवं पद्धति में विशेष रूप से उस पाठ्यक्रम में जो विशेष रूप से आम उपासक की बजाय बौद्ध भिक्षु-भिक्षुणियों के लिए था, बहुत कम समानता रह गई थी। बौद्ध धर्म में शिक्षा प्रारम्भ संस्कार ब्राह्मणों के उपनयन संस्कार की भाँति होता था। बौद्ध संघ में सम्मिलित होने के लिए दो संस्कार आवश्यक थे प्रथम था 'पब्बज्जा' तथा दूसरा उपसम्पदा पब्बज्जा से उपासकत्व का प्रारम्भ होता था। उपनयन की भाँति इसे भी आध्यात्मिक जन्म कहा गया है। यह 8 वर्ष से अधिक आयु के किसी भी व्यक्ति को दी जा सकती थी। संरक्षक की अनुज्ञा इसके लिए आवश्यक थी। व्यक्ति को तीन प्रकार की शरण की शपथ एवं दस धर्मादेश दिए जाते थे। ये शरण बुद्ध धर्म एवं संघ की होती थी। दस धर्मादेशों में निम्न की मनाही थी 1 1। पारिवारिक जीवन 2। ऐसी वस्तु ग्रहण करना जो दी न हो 3। अशुद्ध आचरण 4। झूठ बोलना 5। मादक द्रव्यों का सेवन 6। असमय भोजन 7। नृत्य-गायन 8। पुष्प माला, इत्र, गहने आदि का प्रयोग 9। उच्च आसन का प्रयोग 10। सोना एवं चाँदी की प्राप्ति प्रस्तुत गद्यांश का सर्वाधिक उपयुक्त शीर्षक निम्नलिखित में से क्या हो सकता है?

बौद्ध शिक्षण पद्धति का आरम्भ स्वयं बुद्ध ने सरल तथा जनमानस की भाषा में जीवन के तत्त्वों के उपदेश तथा जगह-जगह चर्चा करके किया। लोगों को शिक्षित करने के लिए महात्मा बुद्ध ने व्याख्यान, प्रश्नोत्तर प्रासंगिक उपमा, दृष्टान्त एवं कथा को माध्यम बनाया बुद्ध के बाद से बौद्ध शिक्षा पद्धति भी एक निश्चित स्वरूप, संगठन के साथ हिन्दू शिक्षा पद्धति से अलग स्वतन्त्र शिक्षा पद्धति के रूप में विकसित हुई। प्रारम्भ में हिन्दू तथा बौद्ध शिक्षा पद्धति के मूल में कोई विशेष अन्तर नहीं था, किन्तु बाद में आकर दोनों शिक्षा प्रणालियों के आदर्श एवं पद्धति में विशेष रूप से उस पाठ्यक्रम में जो विशेष रूप से आम उपासक की बजाय बौद्ध भिक्षु-भिक्षुणियों के लिए था, बहुत कम समानता रह गई थी। बौद्ध धर्म में शिक्षा प्रारम्भ संस्कार ब्राह्मणों के उपनयन संस्कार की भाँति होता था। बौद्ध संघ में सम्मिलित होने के लिए दो संस्कार आवश्यक थे प्रथम था 'पब्बज्जा' तथा दूसरा उपसम्पदा पब्बज्जा से उपासकत्व का प्रारम्भ होता था। उपनयन की भाँति इसे भी आध्यात्मिक जन्म कहा गया है। यह 8 वर्ष से अधिक आयु के किसी भी व्यक्ति को दी जा सकती थी। संरक्षक की अनुज्ञा इसके लिए आवश्यक थी। व्यक्ति को तीन प्रकार की शरण की शपथ एवं दस धर्मादेश दिए जाते थे। ये शरण बुद्ध धर्म एवं संघ की होती थी। दस धर्मादेशों में निम्न की मनाही थी 1 1। पारिवारिक जीवन 2। ऐसी वस्तु ग्रहण करना जो दी न हो 3। अशुद्ध आचरण 4। झूठ बोलना 5। मादक द्रव्यों का सेवन 6। असमय भोजन 7। नृत्य-गायन 8। पुष्प माला, इत्र, गहने आदि का प्रयोग 9। उच्च आसन का प्रयोग 10। सोना एवं चाँदी की प्राप्ति संरक्षक की अनुमति किसके लिए आवश्यक थी?