कोई किसान खेत की मृदा की किस परिस्थिति में बिना बुझा हुआ चूना (कैल्सियम ऑक्साइड) बुझा हुआ चूना ( कैल्सियम हाइड्रॉक्साइड) या चॉक (कैल्सियम कार्बोनेट ) का उपयोग करेगा ?
कोई किसान खेत की मृदा की किस परिस्थिति में बिना बुझा हुआ चूना (कैल्सियम ऑक्साइड) बुझा हुआ चूना ( कैल्सियम हाइड्रॉक्साइड) या चॉक (कैल्सियम कार्बोनेट ) का उपयोग करेगा ?
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कैल्सियम ऑक्साइड या अनबुझा चूना|कैल्सियम कार्बोनेट|प्लास्टर ऑफ पेरिस|सीमेंट|मैग्नीशियम एवं कैल्सियम का जैविक महत्व
हमें स्वतंत्र हुए 15 वर्ष ही हुए थे कि पड़ोसी चीन ने हमारी पीठ में छुरा भोंक दिया। उत्तरी सीमा की सफेद बर्फीली चोटियाँ शहीदों के खून से सनकर लाल हो गई। हज़ारों माँओं की गोदें सूनी हुई. हज़ारों की माँग का सिंदूर पुंछ गया और लाखों अभागे बच्चे पिता के प्यार से वंचित हो गए। गणतंत्र दिवस निकट आ रहा था। देश का हौसला पस्त था। कोई उमग नहीं रह गई थी पर्व मनाने की। तब यह सोचा गया कि जानी-मानी फिल्मी हस्तियाँ आयोजन में शामिल हों तो भीड़ उमड़ेगी। वहाँ कोई ऐसा गीत प्रस्तुत हो जो लोगों के दिलों को छूकर उन्हें झकझोर सके। चुनौती फिल्म जगत तक पहुँची। एक नौजवान गीतकार प्रदीप ने चुनौती स्वीकारने का मन बनाया और गीत लिखना शुरू किया। लेकिन सुर और स्वर के बिना गीत का क्या! प्रदीप संगीत निर्देशक सी. रामचंद्र के पास पहुंचे। उन्हें गीत पंसद आया और रक्षा मंत्रालय को सूचना दे दी गई। 26 जनवरी का शुभ दिन आया। लाखों की भीड़ बड़ी उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रही थी। तब तक जो धुन बज रही थी वह हटी और थोड़ी देर शाति रही। तभी उस शांति को चीरता हुआ लता मंगेशकर का वेदना और चुनौती भरा स्वर सुनाई पड़ा -"ऐ मेरे वतन के लोगों, जरा आँख में भर लो पानी।" समय जैसे थम गया। सभी के मन एक ही भाव, एक ही रस में डूब गए। गीत समाप्त हुआ तो लगभग दो लाख लोग सिसक रहे थे। आँसू थे कि थमते ही न थे। 'उमड़ना' क्रिया का कौन-सा प्रयोग ठीक नहीं है?
गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। जिनमें सहिष्णुता की भावना होती है, केवल ऐसे लोग अध्यापक होने योग्य होते हैं। जिनका बच्चों से प्यार भरा लगाव होता है, उनमें धैर्य स्वभावतः आ जाता है। अध्यापकों को जिस अननिहित गंभीर समस्या से जूझना पड़ता है. वह यह है कि उन्हें जिनको देखना है वे शक्ति और प्रभुता में उनकी बराबरी के नहीं होते। अध्यापक के लिए एकदम तुच्छ या बिना किसी कारण के या फिर वास्तविक की बजाए किसी काल्पनिक कारण के चलते अपने छात्रों के सामने धैर्य खो देना, उनकी खिल्ली उड़ाना, उन्हें अपमानिच या दंडित करना एकदम आसान और संभव है। जो एक निर्बल अधीन राष्ट्र पर शासन करते हैं, उनमें न चाहते हुए भी गलत काम करने की प्रवृचि पाई । जाती है। उसी तरह ऐसे अध्यापक होते हैं जो बच्चों के कपर अपने प्रभुत्व का शिकार हो जाते हैं। जो शासन के अयोग्य होते हैं, उन्हें न केवल कमजोर लोगों पर अन्याय करते हुए कोई अपराध-बोध नहीं होता, बल्कि ऐसा करने में उन्हें एक खास तरह का मजा मिलता है। बच्चे अपनी माँ की गोद में कमजोर, असहाय और अज्ञानी होते हैं। माता के हृदय में स्थित प्रचुर प्यार हो उनकी रक्षा की एकमात्र गारंटी होता है। इसके बावजूद हमारे घरों में इस बात के उदाहरण कम नहीं है कि कैसे हमारे स्वाभाविक प्यार पर धीरज का अभाव और उद्धत प्राधिकार विजय प्राप्त कर लेते हैं और बच्चों को अनुचित कारणों से बाँडित होना पड़ता है। किस तरह के लोग कमजोर लोगों पर अन्याय करते है?
हमारा जीवन जिन मानवीय सिद्धांतों, अनुभवों और सांस्कृतिक संस्कारों के संबल से समस्त सृष्टि के लिए महत्त्वपूर्ण बना है, परोपकार की भावना उन्हीं में एक है। मानव को दूसरे मानव के प्रति वैसा ही संवेदनात्मक उत्तरदायित्व निभाना चाहिए, जैसे वह स्वयं के प्रति निभाता है। जीवन को केवल परोपकार, पर सेवा और निःस्वार्थ प्रेम के लिए ही वास्तविक समझना चाहिए क्योंकि नश्वर शरीर जब नष्ट हो जाएगा तो उसके बाद हमारा कुछ भी इस दुनिया के जीवों की स्मृति में नही रहेगा। हम जग जीवों की स्मृति में सदा-सदा के लिए तभी बने रह सकते हैं, जब हम अपने नश्वर शरीर को वैचारिक, बौद्धिक और आत्मिक चेतना से पूर्ण कर निःस्वार्थ भाव से स्वयं को जीव सेवा में समर्पित करेंगे। हमें स्थिरता से और शांतिपूर्वक यह विचार करते रहना चाहिए कि हमारे जीवन का सर्वश्रेष्ठ उद्देश्य और एकमात्र लक्ष्य हमारे द्वारा किया जाने वाला त्याग है। त्याग योग्य व्यक्तित्व प्राप्त करने के लिए गहन तप की आवश्यकता है। त्याग का भाव किसी मनुष्य में साधारण होते हुए नही जन्म लेता। इसके लिए मनुष्य को जीवन-जगत और इसके जीवों के संबंध में असाधारण वैचारिक रचनात्मकता अपनाकर निरंतर योग, ध्यान, तप व साधना करनी होगी। उसे इस स्थिति से विचरते हुए विशिष्ट आध्यात्मिक अनुभवों से लैस होना होगा। आवश्यकता होने पर उसे जीवों की वास्तविक सेवा करनी होगी। जब ऐसी विशेष मानवीय परिस्थितियों उत्पन्न होंगी, तब ही मानव में त्याग भाव आकार ग्रहण करेगा। 'आध्यात्मिक शब्द का निर्माण किस उपसर्ग की सहायता से हुआ है?
गोदान' प्रेमचन्द जी का एक ऐसा क्रान्तिकारी उपन्यास है, जिसमें तत्कालीन युग अपनी समस्त विकृतियों, विडम्बनाओं एवं सच्चाइयों के साथ चित्रित हो गया है। उसमें अपने समय का यथार्थ ही चित्रित नहीं हुआ है वरन् तत्कालीन भारतीय कृषक वर्ग का इतिहास भी संरक्षित हुआ है। प्रेमचन्द जी अपने युग और उसकी परिस्थितियों से पूर्णतः परिचित थे। इसी कारण छोटे-छोटे प्रसंग भी उनकी दृष्टि से ओझल नहीं रहे हैं। अपने समाज की यह पहचान और इसे औपन्यासिक परिस्थितियों से अनुस्यूत कर देने की क्षमता बिरले लोगों में ही होती है। वे यह जानते थे कि एक निष्क्रिय समाज पतन के लिए किस बिन्दु पर खड़ा है तथा वही समाज सामाजिक जागृति पाकर जब जागता है, तो वह किस तरह अपने अतीत और वर्तमान के संकटों के बीच भविष्य के प्रति आशावादी होता है। सामाजिक चेतना के महीन बिन्दुओं को, उन सामाजिकों के बीच प्रेमचन्द ने पहचाना था, जिन्होंने उस चेतना को स्वाभाविक रूप में प्राप्त किया। डॉ। गंगा प्रसाद विमल इसी प्रसंग में लिखते हैं---उपन्यास कथा, होरी जैसे साधारण किसान को केन्द्र बनाकर चलती है, किन्तु केन्द्रीय कथा में होरी मात्र नायक के रूप में ही प्रस्तावित नहीं है, अपितु वह स्वयं एक कथा सत्य के रूप में स्थापित होता है। होरी की कथा में नगर एवं गाँव दोनों के अर्थतन्त्र का खुला हिसाब प्रतीत होता है, परन्तु इन आधारों पर गोदान केवल ₹ एक विचारकथा या समस्याओं की कथा नहीं है, बल्कि वह मानवीय संघर्ष की कथा है। ऐसी कथा जिसमें स्वाधीनता युग की स्वर क्रान्ति की लहरी का ज्वार भी है, तो सारी लड़ाई का पराजय बोध भी। वस्तुत: पराजय बोध के केन्द्र से यदि हम इस कथा कृति का अवलोकन करें, तो हम पाएँगे कि गोदान में एक सच्ची त्रासदी की तस्वीर अवतरित हुई है। उपन्यास का नायक होरी इतना दीन-हीन किसान है कि उसके माध्यम से भारतीय कृषक वर्ग की करुणा और मार्मिक जीवन-यात्रा की सजीव झाँकी प्रस्तुत हो गई है। भारतीय किसान ऋण में ही पैदा होता है, ऋण में ही जीवित रहता है और अपने उत्तराधिकारी पर ऋण का भार छोड़कर मर जाता है। मरते समय उसके पास एक गाय तक नहीं रहती। गोदान उपन्यास ऐसे ही भारतीय किसान के जीवन को करुण त्रासदी है। माय की आकांक्षा होरी के जीवन का सबसे मधुर स्वप्न उसके जीवन की सबसे बड़ी अभिलाषा है। अपनी यह आकांक्षा पूरी करने के लिए वह कोई भी जोखिम उठा सकता है पर पूँजीवादी शोषणचक्र उसकी अभिलाषा को पीस डालता है। अन्त में इस आकांक्षा की पूर्ति के लिए वह ऐसा जी-तोड़ परिश्रम करता है, जो उसकी मृत्यु का कारण बनता है और वह गाय की अभिलाषा मन में ही लिए मृत्यु का वरण कर लेता है। क्रान्तिकारी शब्द है
गोदान' प्रेमचन्द जी का एक ऐसा क्रान्तिकारी उपन्यास है, जिसमें तत्कालीन युग अपनी समस्त विकृतियों, विडम्बनाओं एवं सच्चाइयों के साथ चित्रित हो गया है। उसमें अपने समय का यथार्थ ही चित्रित नहीं हुआ है वरन् तत्कालीन भारतीय कृषक वर्ग का इतिहास भी संरक्षित हुआ है। प्रेमचन्द जी अपने युग और उसकी परिस्थितियों से पूर्णतः परिचित थे। इसी कारण छोटे-छोटे प्रसंग भी उनकी दृष्टि से ओझल नहीं रहे हैं। अपने समाज की यह पहचान और इसे औपन्यासिक परिस्थितियों से अनुस्यूत कर देने की क्षमता बिरले लोगों में ही होती है। वे यह जानते थे कि एक निष्क्रिय समाज पतन के लिए किस बिन्दु पर खड़ा है तथा वही समाज सामाजिक जागृति पाकर जब जागता है, तो वह किस तरह अपने अतीत और वर्तमान के संकटों के बीच भविष्य के प्रति आशावादी होता है। सामाजिक चेतना के महीन बिन्दुओं को, उन सामाजिकों के बीच प्रेमचन्द ने पहचाना था, जिन्होंने उस चेतना को स्वाभाविक रूप में प्राप्त किया। डॉ। गंगा प्रसाद विमल इसी प्रसंग में लिखते हैं---उपन्यास कथा, होरी जैसे साधारण किसान को केन्द्र बनाकर चलती है, किन्तु केन्द्रीय कथा में होरी मात्र नायक के रूप में ही प्रस्तावित नहीं है, अपितु वह स्वयं एक कथा सत्य के रूप में स्थापित होता है। होरी की कथा में नगर एवं गाँव दोनों के अर्थतन्त्र का खुला हिसाब प्रतीत होता है, परन्तु इन आधारों पर गोदान केवल ₹ एक विचारकथा या समस्याओं की कथा नहीं है, बल्कि वह मानवीय संघर्ष की कथा है। ऐसी कथा जिसमें स्वाधीनता युग की स्वर क्रान्ति की लहरी का ज्वार भी है, तो सारी लड़ाई का पराजय बोध भी। वस्तुत: पराजय बोध के केन्द्र से यदि हम इस कथा कृति का अवलोकन करें, तो हम पाएँगे कि गोदान में एक सच्ची त्रासदी की तस्वीर अवतरित हुई है। उपन्यास का नायक होरी इतना दीन-हीन किसान है कि उसके माध्यम से भारतीय कृषक वर्ग की करुणा और मार्मिक जीवन-यात्रा की सजीव झाँकी प्रस्तुत हो गई है। भारतीय किसान ऋण में ही पैदा होता है, ऋण में ही जीवित रहता है और अपने उत्तराधिकारी पर ऋण का भार छोड़कर मर जाता है। मरते समय उसके पास एक गाय तक नहीं रहती। गोदान उपन्यास ऐसे ही भारतीय किसान के जीवन को करुण त्रासदी है। माय की आकांक्षा होरी के जीवन का सबसे मधुर स्वप्न उसके जीवन की सबसे बड़ी अभिलाषा है। अपनी यह आकांक्षा पूरी करने के लिए वह कोई भी जोखिम उठा सकता है पर पूँजीवादी शोषणचक्र उसकी अभिलाषा को पीस डालता है। अन्त में इस आकांक्षा की पूर्ति के लिए वह ऐसा जी-तोड़ परिश्रम करता है, जो उसकी मृत्यु का कारण बनता है और वह गाय की अभिलाषा मन में ही लिए मृत्यु का वरण कर लेता है। गोदान' का नायक कौन है?
गोदान' प्रेमचन्द जी का एक ऐसा क्रान्तिकारी उपन्यास है, जिसमें तत्कालीन युग अपनी समस्त विकृतियों, विडम्बनाओं एवं सच्चाइयों के साथ चित्रित हो गया है। उसमें अपने समय का यथार्थ ही चित्रित नहीं हुआ है वरन् तत्कालीन भारतीय कृषक वर्ग का इतिहास भी संरक्षित हुआ है। प्रेमचन्द जी अपने युग और उसकी परिस्थितियों से पूर्णतः परिचित थे। इसी कारण छोटे-छोटे प्रसंग भी उनकी दृष्टि से ओझल नहीं रहे हैं। अपने समाज की यह पहचान और इसे औपन्यासिक परिस्थितियों से अनुस्यूत कर देने की क्षमता बिरले लोगों में ही होती है। वे यह जानते थे कि एक निष्क्रिय समाज पतन के लिए किस बिन्दु पर खड़ा है तथा वही समाज सामाजिक जागृति पाकर जब जागता है, तो वह किस तरह अपने अतीत और वर्तमान के संकटों के बीच भविष्य के प्रति आशावादी होता है। सामाजिक चेतना के महीन बिन्दुओं को, उन सामाजिकों के बीच प्रेमचन्द ने पहचाना था, जिन्होंने उस चेतना को स्वाभाविक रूप में प्राप्त किया। डॉ। गंगा प्रसाद विमल इसी प्रसंग में लिखते हैं---उपन्यास कथा, होरी जैसे साधारण किसान को केन्द्र बनाकर चलती है, किन्तु केन्द्रीय कथा में होरी मात्र नायक के रूप में ही प्रस्तावित नहीं है, अपितु वह स्वयं एक कथा सत्य के रूप में स्थापित होता है। होरी की कथा में नगर एवं गाँव दोनों के अर्थतन्त्र का खुला हिसाब प्रतीत होता है, परन्तु इन आधारों पर गोदान केवल ₹ एक विचारकथा या समस्याओं की कथा नहीं है, बल्कि वह मानवीय संघर्ष की कथा है। ऐसी कथा जिसमें स्वाधीनता युग की स्वर क्रान्ति की लहरी का ज्वार भी है, तो सारी लड़ाई का पराजय बोध भी। वस्तुत: पराजय बोध के केन्द्र से यदि हम इस कथा कृति का अवलोकन करें, तो हम पाएँगे कि गोदान में एक सच्ची त्रासदी की तस्वीर अवतरित हुई है। उपन्यास का नायक होरी इतना दीन-हीन किसान है कि उसके माध्यम से भारतीय कृषक वर्ग की करुणा और मार्मिक जीवन-यात्रा की सजीव झाँकी प्रस्तुत हो गई है। भारतीय किसान ऋण में ही पैदा होता है, ऋण में ही जीवित रहता है और अपने उत्तराधिकारी पर ऋण का भार छोड़कर मर जाता है। मरते समय उसके पास एक गाय तक नहीं रहती। गोदान उपन्यास ऐसे ही भारतीय किसान के जीवन को करुण त्रासदी है। माय की आकांक्षा होरी के जीवन का सबसे मधुर स्वप्न उसके जीवन की सबसे बड़ी अभिलाषा है। अपनी यह आकांक्षा पूरी करने के लिए वह कोई भी जोखिम उठा सकता है पर पूँजीवादी शोषणचक्र उसकी अभिलाषा को पीस डालता है। अन्त में इस आकांक्षा की पूर्ति के लिए वह ऐसा जी-तोड़ परिश्रम करता है, जो उसकी मृत्यु का कारण बनता है और वह गाय की अभिलाषा मन में ही लिए मृत्यु का वरण कर लेता है। गोदान में निम्नलिखित में से किसका वर्णन नहीं है?
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