निम्नलिखित में विद्युतचुम्बकीय तरंजो चुनिए :
केथोड किरणे, धन-किरणें, X - किरणे, ` alpha `- किरणे, ` beta `-किरणों तथा ` gamma `- किरणें ।
निम्नलिखित में विद्युतचुम्बकीय तरंजो चुनिए :
केथोड किरणे, धन-किरणें, X - किरणे, ` alpha `- किरणे, ` beta `-किरणों तथा ` gamma `- किरणें ।
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गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित में सबसे उचित विकल्प को चुनिए। मेरी कल्पना के सुन्दर स्वप्नों का प्रभात हो रहा है। नाचती हुई नीहार कणिकाओं पर तीखी किरणों के भाले ! ओह 1 सोचा था कि देवता जायेंगे, एक बार आर्यावर्त में गौरव का सूर्य चमकेगा और पुण्य कर्मों से समस्त पाप-पंक घो जायेंगे। हिमालय से निकलती हुई सप्त सिन्धु तथा गंगा-यमुना की घाटियाँ किसी आर्य सद्गृहस्थ के स्वच्छ और पवित्र आंगन-सी भूखी जाति के निर्वासित प्राणियों को अन्नदान देकर संतुष्ट करेंगी और आर्य जाति अपने दृढ़ सबल हाथों में शस्त्र ग्रहण करके पुण्य का पुरस्कार और पाप का तिरस्कार करती हुई, अचल हिमाचल की भांति सिर ऊँचा किये, विश्व को सदाचरण के लिए सावधान करती रहेगी, आलस्य-सिन्धु में शेष पर्यकशायी सुषुपत्ति नाथ जायेंगे। प्रस्तुत गद्यांश में किस प्रकार के सुन्दर स्वप्नों का प्रभात हो रहा है।
गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित में सबसे उचित विकल्प को चुनिए। मेरी कल्पना के सुन्दर स्वप्नों का प्रभात हो रहा है। नाचती हुई नीहार कणिकाओं पर तीखी किरणों के भाले ! ओह 1 सोचा था कि देवता जायेंगे, एक बार आर्यावर्त में गौरव का सूर्य चमकेगा और पुण्य कर्मों से समस्त पाप-पंक घो जायेंगे। हिमालय से निकलती हुई सप्त सिन्धु तथा गंगा-यमुना की घाटियाँ किसी आर्य सद्गृहस्थ के स्वच्छ और पवित्र आंगन-सी भूखी जाति के निर्वासित प्राणियों को अन्नदान देकर संतुष्ट करेंगी और आर्य जाति अपने दृढ़ सबल हाथों में शस्त्र ग्रहण करके पुण्य का पुरस्कार और पाप का तिरस्कार करती हुई, अचल हिमाचल की भांति सिर ऊँचा किये, विश्व को सदाचरण के लिए सावधान करती रहेगी, आलस्य-सिन्धु में शेष पर्यकशायी सुषुपत्ति नाथ जायेंगे। आर्य जाति अपने हाथों में क्या ग्रहण कर पाप का तिरस्कार करती है?
गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित में सबसे उचित विकल्प को चुनिए। मेरी कल्पना के सुन्दर स्वप्नों का प्रभात हो रहा है। नाचती हुई नीहार कणिकाओं पर तीखी किरणों के भाले ! ओह 1 सोचा था कि देवता जायेंगे, एक बार आर्यावर्त में गौरव का सूर्य चमकेगा और पुण्य कर्मों से समस्त पाप-पंक घो जायेंगे। हिमालय से निकलती हुई सप्त सिन्धु तथा गंगा-यमुना की घाटियाँ किसी आर्य सद्गृहस्थ के स्वच्छ और पवित्र आंगन-सी भूखी जाति के निर्वासित प्राणियों को अन्नदान देकर संतुष्ट करेंगी और आर्य जाति अपने दृढ़ सबल हाथों में शस्त्र ग्रहण करके पुण्य का पुरस्कार और पाप का तिरस्कार करती हुई, अचल हिमाचल की भांति सिर ऊँचा किये, विश्व को सदाचरण के लिए सावधान करती रहेगी, आलस्य-सिन्धु में शेष पर्यकशायी सुषुपत्ति नाथ जायेंगे। गौरव का सूर्य कहाँ चमकेगा?
गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित में सबसे उचित विकल्प को चुनिए। मेरी कल्पना के सुन्दर स्वप्नों का प्रभात हो रहा है। नाचती हुई नीहार कणिकाओं पर तीखी किरणों के भाले ! ओह 1 सोचा था कि देवता जायेंगे, एक बार आर्यावर्त में गौरव का सूर्य चमकेगा और पुण्य कर्मों से समस्त पाप-पंक घो जायेंगे। हिमालय से निकलती हुई सप्त सिन्धु तथा गंगा-यमुना की घाटियाँ किसी आर्य सद्गृहस्थ के स्वच्छ और पवित्र आंगन-सी भूखी जाति के निर्वासित प्राणियों को अन्नदान देकर संतुष्ट करेंगी और आर्य जाति अपने दृढ़ सबल हाथों में शस्त्र ग्रहण करके पुण्य का पुरस्कार और पाप का तिरस्कार करती हुई, अचल हिमाचल की भांति सिर ऊँचा किये, विश्व को सदाचरण के लिए सावधान करती रहेगी, आलस्य-सिन्धु में शेष पर्यकशायी सुषुपत्ति नाथ जायेंगे। विश्व को सदाचरण के लिए कौन सावधान करती रहेगी।
गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। यह तो आप जानते हैं कि पृथ्वी प्रारंभ में आग का गोला थी। मुझे ठीक-ठीक नहीं पता कि ऐसी आग में मुझ पानी का जन्म कैसे हुआ। लगता यह है कि हमारी पृथ्वी ज्यों-ज्यों ठंडी होती गई तो उसमें मौजूद गैसों में क्रियाएँ हुईं। हाइड्रोजन और ऑक्सीजन की रासायनिक क्रियाओं से मेरा जन्म हुआ है। इन दोनों ने आपना अस्तित्व मिटाकर मुझे बनाया! पहले मैं पृथ्वी के ऊपर भाप रूप में ही था। फिर जाने क्या हुआ कि मैं ठोस बर्फ बन गया। कल्पना करो चारों ओर बर्फ ही बर्फ। जब सूर्य की किरणें हम पर पड़ती तो चारों और सौन्दर्य बिखर पड़ता। लाखों वर्षों तक इस रूप में रहने के बाद मैं फिसलने लगा क्योंकि बर्फ के ही दबाव से निचली परत पिघलने लगी थी। फिसलकर हम पहुँचे सागर में। वहाँ की तो बात ही निराली थी। वहाँ अब तक हमसे पहले पहुँचे पानी में छोटे-छोटे जीव तैरने लगे थे। घोंघे, मछलियाँ और कछुवे भी। धीरे-धीरे सृष्टि का विस्तार हुआ। जल के बाद स्थल में जीव बनने लगे और आज आप उसी श्रृंखला के अंग हैं और अपने को मनुष्य कहते हैं। कौन-सी संज्ञा बहुवचन में नहीं है?
गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। यह तो आप जानते हैं कि पृथ्वी प्रारंभ में आग का गोला थी। मुझे ठीक-ठीक नहीं पता कि ऐसी आग में मुझ पानी का जन्म कैसे हुआ। लगता यह है कि हमारी पृथ्वी ज्यों-ज्यों ठंडी होती गई तो उसमें मौजूद गैसों में क्रियाएँ हुईं। हाइड्रोजन और ऑक्सीजन की रासायनिक क्रियाओं से मेरा जन्म हुआ है। इन दोनों ने आपना अस्तित्व मिटाकर मुझे बनाया! पहले मैं पृथ्वी के ऊपर भाप रूप में ही था। फिर जाने क्या हुआ कि मैं ठोस बर्फ बन गया। कल्पना करो चारों ओर बर्फ ही बर्फ। जब सूर्य की किरणें हम पर पड़ती तो चारों और सौन्दर्य बिखर पड़ता। लाखों वर्षों तक इस रूप में रहने के बाद मैं फिसलने लगा क्योंकि बर्फ के ही दबाव से निचली परत पिघलने लगी थी। फिसलकर हम पहुँचे सागर में। वहाँ की तो बात ही निराली थी। वहाँ अब तक हमसे पहले पहुँचे पानी में छोटे-छोटे जीव तैरने लगे थे। घोंघे, मछलियाँ और कछुवे भी। धीरे-धीरे सृष्टि का विस्तार हुआ। जल के बाद स्थल में जीव बनने लगे और आज आप उसी श्रृंखला के अंग हैं और अपने को मनुष्य कहते हैं। यह आत्मकथा किसकी है?
गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। यह तो आप जानते हैं कि पृथ्वी प्रारंभ में आग का गोला थी। मुझे ठीक-ठीक नहीं पता कि ऐसी आग में मुझ पानी का जन्म कैसे हुआ। लगता यह है कि हमारी पृथ्वी ज्यों-ज्यों ठंडी होती गई तो उसमें मौजूद गैसों में क्रियाएँ हुईं। हाइड्रोजन और ऑक्सीजन की रासायनिक क्रियाओं से मेरा जन्म हुआ है। इन दोनों ने आपना अस्तित्व मिटाकर मुझे बनाया! पहले मैं पृथ्वी के ऊपर भाप रूप में ही था। फिर जाने क्या हुआ कि मैं ठोस बर्फ बन गया। कल्पना करो चारों ओर बर्फ ही बर्फ। जब सूर्य की किरणें हम पर पड़ती तो चारों और सौन्दर्य बिखर पड़ता। लाखों वर्षों तक इस रूप में रहने के बाद मैं फिसलने लगा क्योंकि बर्फ के ही दबाव से निचली परत पिघलने लगी थी। फिसलकर हम पहुँचे सागर में। वहाँ की तो बात ही निराली थी। वहाँ अब तक हमसे पहले पहुँचे पानी में छोटे-छोटे जीव तैरने लगे थे। घोंघे, मछलियाँ और कछुवे भी। धीरे-धीरे सृष्टि का विस्तार हुआ। जल के बाद स्थल में जीव बनने लगे और आज आप उसी श्रृंखला के अंग हैं और अपने को मनुष्य कहते हैं। सबसे पहले जीवधारी कहाँ पैदा हुए?
गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। यह तो आप जानते हैं कि पृथ्वी प्रारंभ में आग का गोला थी। मुझे ठीक-ठीक नहीं पता कि ऐसी आग में मुझ पानी का जन्म कैसे हुआ। लगता यह है कि हमारी पृथ्वी ज्यों-ज्यों ठंडी होती गई तो उसमें मौजूद गैसों में क्रियाएँ हुईं। हाइड्रोजन और ऑक्सीजन की रासायनिक क्रियाओं से मेरा जन्म हुआ है। इन दोनों ने आपना अस्तित्व मिटाकर मुझे बनाया! पहले मैं पृथ्वी के ऊपर भाप रूप में ही था। फिर जाने क्या हुआ कि मैं ठोस बर्फ बन गया। कल्पना करो चारों ओर बर्फ ही बर्फ। जब सूर्य की किरणें हम पर पड़ती तो चारों और सौन्दर्य बिखर पड़ता। लाखों वर्षों तक इस रूप में रहने के बाद मैं फिसलने लगा क्योंकि बर्फ के ही दबाव से निचली परत पिघलने लगी थी। फिसलकर हम पहुँचे सागर में। वहाँ की तो बात ही निराली थी। वहाँ अब तक हमसे पहले पहुँचे पानी में छोटे-छोटे जीव तैरने लगे थे। घोंघे, मछलियाँ और कछुवे भी। धीरे-धीरे सृष्टि का विस्तार हुआ। जल के बाद स्थल में जीव बनने लगे और आज आप उसी श्रृंखला के अंग हैं और अपने को मनुष्य कहते हैं। बर्फ़ क्यों फिसलने लगी थी?
गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। यह तो आप जानते हैं कि पृथ्वी प्रारंभ में आग का गोला थी। मुझे ठीक-ठीक नहीं पता कि ऐसी आग में मुझ पानी का जन्म कैसे हुआ। लगता यह है कि हमारी पृथ्वी ज्यों-ज्यों ठंडी होती गई तो उसमें मौजूद गैसों में क्रियाएँ हुईं। हाइड्रोजन और ऑक्सीजन की रासायनिक क्रियाओं से मेरा जन्म हुआ है। इन दोनों ने आपना अस्तित्व मिटाकर मुझे बनाया! पहले मैं पृथ्वी के ऊपर भाप रूप में ही था। फिर जाने क्या हुआ कि मैं ठोस बर्फ बन गया। कल्पना करो चारों ओर बर्फ ही बर्फ। जब सूर्य की किरणें हम पर पड़ती तो चारों और सौन्दर्य बिखर पड़ता। लाखों वर्षों तक इस रूप में रहने के बाद मैं फिसलने लगा क्योंकि बर्फ के ही दबाव से निचली परत पिघलने लगी थी। फिसलकर हम पहुँचे सागर में। वहाँ की तो बात ही निराली थी। वहाँ अब तक हमसे पहले पहुँचे पानी में छोटे-छोटे जीव तैरने लगे थे। घोंघे, मछलियाँ और कछुवे भी। धीरे-धीरे सृष्टि का विस्तार हुआ। जल के बाद स्थल में जीव बनने लगे और आज आप उसी श्रृंखला के अंग हैं और अपने को मनुष्य कहते हैं। मनुष्य किस श्रृंखला का अंग है?
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