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Class 11
PHYSICS
एक घर्षणहीन क्षैतिज तल में चित्र के अनुस...

एक घर्षणहीन क्षैतिज तल में चित्र के अनुसार तीन ब्लॉक जुड़े है। ब्लॉकों को गति देने के लिए `40.0` न्यूटन का बल लगाने पर ज्ञात कीजिए: (i) ब्लॉकों का त्वरण, (ii) तनाव बल `T_1` (iii) तनाव बल `T_2`

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मानव के मर्मस्थल में परोपकार और त्याग जैसे सद्गुणों की जागृति । तभी हो पाती है, जब वह अपने तुच्छ भौतिक जीवन को नगण्य समझकर उत्साह-उमंग के साथ दूसरों की सेवा-सुश्रूषा तथा सत्कार करता है। यह कठोर सत्य है कि हम भौतिक रूप में इस संसार में सीमित अवधि तक ही रहेंगे। हमारी मृत्यु के बाद हमारे निकट संबंधी, मित्र, बंधु-बांधव जीवन भर हमारे लिए शोकाकुल और प्रेमाकुल भी नहीं रहेंगे। दुख मिश्रित इस निर्बल भावना पर विजय पाने के लिए तब हमारे अंतर्मन में एक विचार उठता है कि क्यों न हम अपने सत्कर्मों और सद्गुणों का प्रकाश फैलाकर सदा-सदा के लिए अमर हो जाएँ। सेवक-प्रवृत्ति अपनाकर हम ऐसा अवश्य कर सकते हैं। अपने निःस्वार्थ व्यक्तित्व और परहित कर्मों के बल पर हम हमेशा के लिए मानवीय जीवन हेतु उत्प्रेरणा बन सकते हैं । अनुपम मनुष्य जीवन को सद्गति प्रदान करने के लिए यह विचार नया नहीं है। ऐसे विचार सज्जन मनुष्यों के अंतर्मन में सदा उठते रहे हैं तथा इन्हें अपनाकर वे दुनिया में अमर भी हो गए। इस धरा पर स्थायी रूप में नहीं रहने पर भी ऐसे परहितकारी कालांतर तक पूजे जाते रहेंगे। अमूल्य मनुष्य जीवन की सर्वश्रेष्ठ शिक्षा यही है। यही सीखकर 'मनुष्य का जीवन आनंदमय और समृद्धिशाली हो सकता है। । ''यदि इस प्रकार मानव जीवन उन्नत होता है तो यह संपूर्ण संसार स्वर्गिक विस्तार ग्रहण कर लेगा। किसी भी मानव को "आध्यात्मिकता का जो अंतिम ज्ञान मिलेगा, वह भी यही शिक्षा देगा कि धर्म-कर्म का उद्देश्य सत्कर्मों और सद्गुणों की ज्योति फैलाना ही है |

हमारे देश में एक ऐसा भी युग था जब नैतिक और आध्यात्मिक विकास ही जीवन का वास्तविक लक्ष्य माना जाता था। अहिंसा की भावना सर्वोपरि थी। आज पूरा जीवन-दर्शन ही बदल गया है। सर्वत्र पैसे की हाय-हाय तथा धन का उपार्जन ही मुख्य ध्येय हो गया है. भले ही धन-उपार्जन के तरीके गलत ही क्यों न हों। इन सबका असर मनुष्य के प्रतिदिन के जीवन पर पड़ रहा है। समाज का वातावरण दूषित हो गया है। इन सबके कारण मानसिक और शारीरिक तनाव-खिंचाव और व्याधियाँ पैदा हो रही हैं। आज आदमी धन के पोछे अंधाधुंध दौड़ रहा है। पाँच रूपये मिलने पर दस, दस मिलने पर सौ और सौ मिलने पर हज़ार की लालसा लिए वह इस अंधी दौड़ में शामिल है। इस दौड़ का कोई अंत नहीं। धन की इस दौड़ में सभी पारिवारिक और मानवीय संबंध पीछे छूट गए हैं। व्यक्ति सत्य-असत्य, उचित-अनुचित, न्याय-अन्याय और अपने-पराए के भेद-भाव को भूल गया। उसके पास अपनी पत्नी और संतान के लिए समय नहीं। धन के लिए पुत्र का पिता के साथ, बेटी का माँ के साथ और पति का पत्नी के साथ झगड़ा हो रहा है। भाई-भाई के खून का प्यासा है। धन की लालसा व्यक्ति को जघन्य से जघन्य कार्य करने के लिए उकसा रही है। इस लालसा का ही परिणाम है कि जगह-जगह हत्या, लूट, अपहरण और चोरी-डकैती की घटनाएँ बढ़ रही हैं। इस रोगी मनोवृत्ति को बदलने के लिए हमें हर स्तर पर प्रयत्न करमे होंगे। मानसिक तनाव की व्याधियों का कारण लेखक ने क्या माना है?