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अनीता अपने गाँव में एक मेले में गई। वह ए...

अनीता अपने गाँव में एक मेले में गई। वह एक चरखी की सवारी करना चाहती थी हुपला खेलना चाहती थी। खेले गये हुपला की संख्या, चरखी की, की गयी सवारी की संख्या की आधी है। यदि प्रत्येक बार की सवारी लिए उसे रु 3 तथा हुपला खेलने के लिए रु 4 खर्च करने पड़े और मेले में उसने रु 20 खर्च किये तो इसका बीजगणितीय एवं ज्यामितीय निरूपण कीजिए।

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चेन्नई में आई बाढ़ अब उतार पर है। इस त्रासदी से निबटने में इस शहर ने जिस साहस का परिचय दिया, जिस तरह से सोशल मीडिया ने एक बार फिर बचाव के काम में अहम किरदार निभाया, बल्कि कुछ मामलों में तो जान बचाने में भी उसकी भूमिका रही, इसे देखते हुए उसकी जितनी तारीफ की जाए, वह कम है। इन तमाम अच्छी बातों के बावजूद इस वास्तविकता को भी नहीं झूठलाया जा सकता कि इस त्रासदी से बचा जा सकता था। चेन्नई में आई बाढ़ की असली वजह थी अडयार नदी-बेसिन का नए हवाई अड्डे के लिए अतिक्रमण। ठीक उसी तरह, जैसे दूसरे नदी विस्तारों का आवासीय निर्माण के लिए इस्तेमाल कर लिया गया है। नदी के कुदरती रास्तों को अवरूद्ध किए जाने से इसका जल आसपास के इलाकों में उमड़ गया। जब तक प्रकृति अपना क्रोध नहीं दिखाती, हमारे योजनाकार हर जोखिम को नजरअंदाज़ करते रहते हैं और उस चीज की तलाश में रहते हैं, जिसे वे ले सकते हैं। हमने इसी तरह का विध्वंसक सैलाब मुंबई में भी देखा। कुछ समय पहले श्रीनगर में भी ऐसी ही बर्बादी देखी। हर जगह मुख्य वजह मिली। अनियोजित शहरीकरण और बुनियादी नियमों की अनदेखीं। फिर भी हर बार त्रासदी की गंभीरता लोगों की यादों में धुंधली पड़ जाती है। चेनई की तरह दिल्ली में भी ऐसे सैलाब की संभावना है। इसलिए हमें यमुना नदी के बेसिन से छेड़छाड़ करने की 'बुद्धिमानी' से बचना होगा। गद्यांश में 'बाढ़' के लिए एक समानार्थी का प्रयोग हुआ है, वह है

चेन्नई में आई बाढ़ अब उतार पर है। इस त्रासदी से निबटने में इस शहर ने जिस साहस का परिचय दिया, जिस तरह से सोशल मीडिया ने एक बार फिर बचाव के काम में अहम किरदार निभाया, बल्कि कुछ मामलों में तो जान बचाने में भी उसकी भूमिका रही, इसे देखते हुए उसकी जितनी तारीफ की जाए, वह कम है। इन तमाम अच्छी बातों के बावजूद इस वास्तविकता को भी नहीं झूठलाया जा सकता कि इस त्रासदी से बचा जा सकता था। चेन्नई में आई बाढ़ की असली वजह थी अडयार नदी-बेसिन का नए हवाई अड्डे के लिए अतिक्रमण। ठीक उसी तरह, जैसे दूसरे नदी विस्तारों का आवासीय निर्माण के लिए इस्तेमाल कर लिया गया है। नदी के कुदरती रास्तों को अवरूद्ध किए जाने से इसका जल आसपास के इलाकों में उमड़ गया। जब तक प्रकृति अपना क्रोध नहीं दिखाती, हमारे योजनाकार हर जोखिम को नजरअंदाज़ करते रहते हैं और उस चीज की तलाश में रहते हैं, जिसे वे ले सकते हैं। हमने इसी तरह का विध्वंसक सैलाब मुंबई में भी देखा। कुछ समय पहले श्रीनगर में भी ऐसी ही बर्बादी देखी। हर जगह मुख्य वजह मिली। अनियोजित शहरीकरण और बुनियादी नियमों की अनदेखीं। फिर भी हर बार त्रासदी की गंभीरता लोगों की यादों में धुंधली पड़ जाती है। चेनई की तरह दिल्ली में भी ऐसे सैलाब की संभावना है। इसलिए हमें यमुना नदी के बेसिन से छेड़छाड़ करने की 'बुद्धिमानी' से बचना होगा। 'गंभीरता' शब्द व्याकरण की दृष्टि से है

गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नो में सबसे उचित विकल्प चुनिए काव्य कला के बारे में अपने वाल्मीकि की कथा सुनी है क्रोंच वध से फूटे हुए कविता के अजस्त्र निर्झर की बात आप अवश्य जानते है। वह कहानी सुन्दर है और उसके द्वारा कविता के स्वभाव की और जो संकेत होता है। की कविता मानव की आत्मा के आर्त्त -चीत्कार का सार्थक रूप है उसकी कई व्याख्याएँ की जा सकती है और की गयी है लेकिन हम इसे एक सुन्दर कल्पना से अधिक कुछ नहीं मानते। बल्कि हम कहेंगे की हम इससे अधिक कुछ मानना चाहते ही नहीं। क्योंकि हम यह नहीं मानना चाहते की कविता ने प्रकट होने के लिए इतनी देर तक प्रतीक्षा की। वाल्मीकि और रामचंद्र का काल और अयोध्या जैसी नगरी का काल , भारतीय सस्कृति की चरमोत्कर्ष का काल चाहे न भी रहा हो , यह स्पष्ट है की यह संस्कृति की एक पर्याप्त विकसित अवस्था का काल था , और हम यह नहीं मान सकते , नहीं मानना चाहते है की मौलिक ललित कलाओ में से कोई एक भी ऐसी थी जो इतने समय तक प्रकट हुए बिना ही रह गयी थी। अतएव हम जिस अवस्था की कल्पना करना चाहते है वह वाल्मीकि से बहुत पहले की अवस्था है। वैज्ञानिक मुहावरे की शरण लेकर कहे की वह नागरिक सभ्यता से पहले की अवस्था होनी चाहिए , वह खेतिहर सभ्यता से और चरवाहा से भी पहले की अवस्था होनी चाहिए। वह अवस्था जब मानव करारो में कंदराएँ खोदकर रहता था , और घास -पात या कभी पत्थर या ताम्बे के फरसों से आखेट करके मांस खाता था। नीचे दी गई विकल्पों में से किसकी रचना वाल्मीकि द्वारा हुई है ?

गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नो में सबसे उचित विकल्प चुनिए काव्य कला के बारे में अपने वाल्मीकि की कथा सुनी है क्रोंच वध से फूटे हुए कविता के अजस्त्र निर्झर की बात आप अवश्य जानते है। वह कहानी सुन्दर है और उसके द्वारा कविता के स्वभाव की और जो संकेत होता है। की कविता मानव की आत्मा के आर्त्त -चीत्कार का सार्थक रूप है उसकी कई व्याख्याएँ की जा सकती है और की गयी है लेकिन हम इसे एक सुन्दर कल्पना से अधिक कुछ नहीं मानते। बल्कि हम कहेंगे की हम इससे अधिक कुछ मानना चाहते ही नहीं। क्योंकि हम यह नहीं मानना चाहते की कविता ने प्रकट होने के लिए इतनी देर तक प्रतीक्षा की। वाल्मीकि और रामचंद्र का काल और अयोध्या जैसी नगरी का काल , भारतीय सस्कृति की चरमोत्कर्ष का काल चाहे न भी रहा हो , यह स्पष्ट है की यह संस्कृति की एक पर्याप्त विकसित अवस्था का काल था , और हम यह नहीं मान सकते , नहीं मानना चाहते है की मौलिक ललित कलाओ में से कोई एक भी ऐसी थी जो इतने समय तक प्रकट हुए बिना ही रह गयी थी। अतएव हम जिस अवस्था की कल्पना करना चाहते है वह वाल्मीकि से बहुत पहले की अवस्था है। वैज्ञानिक मुहावरे की शरण लेकर कहे की वह नागरिक सभ्यता से पहले की अवस्था होनी चाहिए , वह खेतिहर सभ्यता से और चरवाहा से भी पहले की अवस्था होनी चाहिए। वह अवस्था जब मानव करारो में कंदराएँ खोदकर रहता था , और घास -पात या कभी पत्थर या ताम्बे के फरसों से आखेट करके मांस खाता था। गद्यांश के लेखक किस सभ्यता की कल्पना करना चाहते है ?

गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नो में सबसे उचित विकल्प चुनिए काव्य कला के बारे में अपने वाल्मीकि की कथा सुनी है क्रोंच वध से फूटे हुए कविता के अजस्त्र निर्झर की बात आप अवश्य जानते है। वह कहानी सुन्दर है और उसके द्वारा कविता के स्वभाव की और जो संकेत होता है। की कविता मानव की आत्मा के आर्त्त -चीत्कार का सार्थक रूप है उसकी कई व्याख्याएँ की जा सकती है और की गयी है लेकिन हम इसे एक सुन्दर कल्पना से अधिक कुछ नहीं मानते। बल्कि हम कहेंगे की हम इससे अधिक कुछ मानना चाहते ही नहीं। क्योंकि हम यह नहीं मानना चाहते की कविता ने प्रकट होने के लिए इतनी देर तक प्रतीक्षा की। वाल्मीकि और रामचंद्र का काल और अयोध्या जैसी नगरी का काल , भारतीय सस्कृति की चरमोत्कर्ष का काल चाहे न भी रहा हो , यह स्पष्ट है की यह संस्कृति की एक पर्याप्त विकसित अवस्था का काल था , और हम यह नहीं मान सकते , नहीं मानना चाहते है की मौलिक ललित कलाओ में से कोई एक भी ऐसी थी जो इतने समय तक प्रकट हुए बिना ही रह गयी थी। अतएव हम जिस अवस्था की कल्पना करना चाहते है वह वाल्मीकि से बहुत पहले की अवस्था है। वैज्ञानिक मुहावरे की शरण लेकर कहे की वह नागरिक सभ्यता से पहले की अवस्था होनी चाहिए , वह खेतिहर सभ्यता से और चरवाहा से भी पहले की अवस्था होनी चाहिए। वह अवस्था जब मानव करारो में कंदराएँ खोदकर रहता था , और घास -पात या कभी पत्थर या ताम्बे के फरसों से आखेट करके मांस खाता था। क्रोंच -वध द्वारा किसके स्वभाव की और संचित किया जाता है ?

गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नो में सबसे उचित विकल्प चुनिए काव्य कला के बारे में अपने वाल्मीकि की कथा सुनी है क्रोंच वध से फूटे हुए कविता के अजस्त्र निर्झर की बात आप अवश्य जानते है। वह कहानी सुन्दर है और उसके द्वारा कविता के स्वभाव की और जो संकेत होता है। की कविता मानव की आत्मा के आर्त्त -चीत्कार का सार्थक रूप है उसकी कई व्याख्याएँ की जा सकती है और की गयी है लेकिन हम इसे एक सुन्दर कल्पना से अधिक कुछ नहीं मानते। बल्कि हम कहेंगे की हम इससे अधिक कुछ मानना चाहते ही नहीं। क्योंकि हम यह नहीं मानना चाहते की कविता ने प्रकट होने के लिए इतनी देर तक प्रतीक्षा की। वाल्मीकि और रामचंद्र का काल और अयोध्या जैसी नगरी का काल , भारतीय सस्कृति की चरमोत्कर्ष का काल चाहे न भी रहा हो , यह स्पष्ट है की यह संस्कृति की एक पर्याप्त विकसित अवस्था का काल था , और हम यह नहीं मान सकते , नहीं मानना चाहते है की मौलिक ललित कलाओ में से कोई एक भी ऐसी थी जो इतने समय तक प्रकट हुए बिना ही रह गयी थी। अतएव हम जिस अवस्था की कल्पना करना चाहते है वह वाल्मीकि से बहुत पहले की अवस्था है। वैज्ञानिक मुहावरे की शरण लेकर कहे की वह नागरिक सभ्यता से पहले की अवस्था होनी चाहिए , वह खेतिहर सभ्यता से और चरवाहा से भी पहले की अवस्था होनी चाहिए। वह अवस्था जब मानव करारो में कंदराएँ खोदकर रहता था , और घास -पात या कभी पत्थर या ताम्बे के फरसों से आखेट करके मांस खाता था। इनमे से किस शब्द में इक प्रत्यय का प्रयोग किया गया है ?

गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नो में सबसे उचित विकल्प चुनिए काव्य कला के बारे में अपने वाल्मीकि की कथा सुनी है क्रोंच वध से फूटे हुए कविता के अजस्त्र निर्झर की बात आप अवश्य जानते है। वह कहानी सुन्दर है और उसके द्वारा कविता के स्वभाव की और जो संकेत होता है। की कविता मानव की आत्मा के आर्त्त -चीत्कार का सार्थक रूप है उसकी कई व्याख्याएँ की जा सकती है और की गयी है लेकिन हम इसे एक सुन्दर कल्पना से अधिक कुछ नहीं मानते। बल्कि हम कहेंगे की हम इससे अधिक कुछ मानना चाहते ही नहीं। क्योंकि हम यह नहीं मानना चाहते की कविता ने प्रकट होने के लिए इतनी देर तक प्रतीक्षा की। वाल्मीकि और रामचंद्र का काल और अयोध्या जैसी नगरी का काल , भारतीय सस्कृति की चरमोत्कर्ष का काल चाहे न भी रहा हो , यह स्पष्ट है की यह संस्कृति की एक पर्याप्त विकसित अवस्था का काल था , और हम यह नहीं मान सकते , नहीं मानना चाहते है की मौलिक ललित कलाओ में से कोई एक भी ऐसी थी जो इतने समय तक प्रकट हुए बिना ही रह गयी थी। अतएव हम जिस अवस्था की कल्पना करना चाहते है वह वाल्मीकि से बहुत पहले की अवस्था है। वैज्ञानिक मुहावरे की शरण लेकर कहे की वह नागरिक सभ्यता से पहले की अवस्था होनी चाहिए , वह खेतिहर सभ्यता से और चरवाहा से भी पहले की अवस्था होनी चाहिए। वह अवस्था जब मानव करारो में कंदराएँ खोदकर रहता था , और घास -पात या कभी पत्थर या ताम्बे के फरसों से आखेट करके मांस खाता था। क्रोंच -वध की कथा किससे सम्बंधित है ?

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