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PHYSICS
25 सेमी त्रिज्या तथा 5000 ग्राम द्रव्यमा...

25 सेमी त्रिज्या तथा 5000 ग्राम द्रव्यमान का एक ऊर्ध्वाधर ठोस पहिया अपनी क्षैतिज धुरी पर घूमने के लिए स्वतंत्र है। पहिये पर एक डोरी लिपटी है। डोरी को 2 न्यूटन के बल `F` से 5 सेकण्ड ती खींचा जाता है। गणना समझाइए, पहिया किस कोणीय वेग से घूमने लगेगा? (धूरी घर्षणहीन है)

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एक 5 kg द्रव्यमान वाली वस्तु पर 2s के लिये एक नियत बल कार्यरत होता है। यह वस्तु के वेग को 3m/s से बढा 7m/s कर देता है। लगाये गये बल की मात्रा ज्ञात करें

निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता जनसंख्या वृद्धि रोकना है। इस क्षेत्र में हमारे सभी प्रयत्न निष्फल रहे हैं। ऐसा क्यों है? यह इसलिए भी हो सकता है कि समस्या को देखने का हर एक का एक अलग नजरिया है। जनसंख्याशास्त्रियों के लिए यह आंकड़ों का अम्बार है। अफसरशाही के लिए यह टार्गेट तय करने की कवायद है। राजनीतिज्ञ इस वोट बैंक की दृष्टि से देखता है। ये सबस अपने-अपने ढंग से समस्या को सुलझाने में लगे हैं। अतः अलग-अलग किसी के हाथ सफलता नहीं लगी। पर यह स्पष्ट है कि परिवार के आकार पर आर्थिक विकास और शिक्षा का बहुत प्रभाव पड़ता है। यहाँ आर्थिक विकास का मतलब पाश्चात्य मतानुसार भौतिकवाद नहीं जहाँ बच्चों को बोझ माना जाता है। हमारे लिए तो यह सम्मानपूर्वक जीने के स्तर से सम्बन्धित है। यह मौजूदा सम्पति के समतामलक विवरण पर ही निर्भर नहीं है वरन् ऐसी शैली अपनाने से सम्बन्धित है जिसमें अस्सी करोड़ लोगों की ऊर्जा का बेहतर इस्तेमाल हो सके। इसी प्रकार स्त्री शिक्षा भी है। यह समाज में एक नए प्रकार का चिन्तन पैदा करेगी जिससे सामाजिक और आर्थिक विकास के नए आयाम खुलेंगे और साथ ही बच्चों के विकास का नया रास्ता भी खुलेगा। अतः जनसंख्या की समस्या सामाजिक है। यह अकेले सरकार नहीं सुलझा सकती। केन्द्रीयकरण से हटकर इसे ग्राम-ग्राम, व्यक्ति-व्यक्ति तक पहुँचना होगा। जब तक यह जन आन्दोलन नहीं बन जाता तब तक सफलता मिलना संदिग्ध है। जनसंख्या समस्या के प्रति हमारे दृष्टिकोण में जिस परिवर्तन की आवश्यकता है वह है

आज जब भी कोई गाँव का नाम लेता है तो एक अलग ही छवि उभरती है। वह छवि कहती है कि वहाँ गरीबी है। वहाँ अशिक्षा और अज्ञान है। वहाँ अंध-विश्वास है। गंदगी है। बीमारी है। हमें विचार करना है कि सच क्या है? क्या हमारे गाँव ऐसे ही थे जैसे आज हैं? आज जो गाँवों का दुर्दशा हुई है उसके लिए जिम्मेदार कौन है? इन सवालों की पड़ताल करते हुए हमें नई समझ बनानी है तथा गाँवों के सही स्वरूप की पहचान करनी है। वैसे यह खुदा का शुक्र है कि गाँवों पर कई तरह के आक्रामक दुष्प्रभावों के बावजूद उनका मूल स्वरूप नहीं बदलता है। जो दूरस्थ गाँव हैं-- शहर के पड़ोस से दूर उनकी निजता तो खासी बची हुई है। ऐसी स्थिति में हमारा दायित्व, एक शिक्षित समाज का दायित्व क्या बनता है? हमें विचार करना है। मंगर ऐसा कोई भी विचार गाँवों को आँखों से देखे बिना, स्वयं देख कर समझे बिना नहीं किया जा सकता! तो हमें अपनी फर्स्ट हैंड समझ बनाने के लिए गाँव चलना है। अपने मूल स्वरूप में गाँव एक वेधशाला है। एक विद्याशाला है। गाँच वेधशाला इसलिए है कि ज्ञान को रोज वहाँ कर्म की कसौटी पर कसा जाता है। आजमाया जाता है। जो ज्ञान कर्म की कसौटी पर खरा न उतरे तो उसे खारिज कर दिया जाता है। हर ज्ञान के होने की शर्त यह है वह सृजन और उत्पादन की शान पर तराशा जाए। गाँव को ठीक से समझने के लिए जरूरी है

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