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तीन पात्र और तीन लिफाफे उपलब्ध है । वे व...

तीन पात्र और तीन लिफाफे उपलब्ध है । वे विधियाँ ज्ञात कीजिए । जिसमे पत्र लिफाफे में रखे जा सके इस प्रकार कि प्रत्येक लिफाफे में एक पत्र हो ।

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Samrat alone can complete a work in 10 days and Virat alone can complete the same work in 40 days. If they are working on alternate days with Samrat starting the work, then in how many days will the total work be completed ? सम्राट अकेले 10 दिनों में एक काम पूरा कर सकता है और विराट अकेले उसी काम को 40 दिनों में पूरा कर सकता है। सम्राट इस कार्य को आरम्भ करता है और फिर दोनों इसे बारी बारी से करते है, इस प्रकार यह कार्य कितने दिनों में समाप्त हो जाएगा ?

निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये आज से सप्तदशक पूर्व सम्पादकाचार्य पराड़करजी ने कहा था- हम सब सम्पादक पत्रों की उन्नति चाहते हैं। पर हमें स्मरण रखना चाहिए कि इस उन्नति के साथ-साथ हमारी स्वातंत्र्य-हानि अवश्यम्भावी है। उन्नति व्यापारी ढंग से ही हो सकती है, इसके लिए पूँजीपति और संचालक व्यवसाय की आवश्यकता है। इनके कथनानुसार और भी पत्र का सम्पादन करना असम्भव हो जाता है। इंग्लैण्ड और अमेरिका के पत्रों में स्पष्ट देखा जाता है कि इनके समाचार स्तम्भ, मनोरंजन स्तम्भ जितने ही अच्छे हो रहे हैं, उनके सम्पादकीय स्तम्भ उतने ही निकम्मे बनते जा रहे हैं। लन्दन के 'टाइम्स' जैसे दो-तीन पत्र इसक अपवाद हैं। पर साधारण नियम वही है जो बताया जा चुका है। एडिटर की अपेक्षा मैनेजिंग एडिटर का प्रभाव और गौरव अधिक बढ़ गया है। भावी हिन्दी समाचार-पत्रों में ऐसा ही होगा। पत्र निकालकर सफलतापूर्वक चलाना बड़े-बड़े धनियों अथवा सुसंघटित कम्पनियों के लिए संभव होगा। पत्र सर्वांगसुन्दर होंगे। आकार बड़े होंगे, छपाई अच्छी होगी, मनोहर, मनोरंजक और ज्ञानवर्द्धक चित्रों से ससज्जित होंगे. लेखों में विविधता होगी, काल्पकता होगी, गम्भीर गवेषणा की झलक होगी और मनोहारिणी शक्ति भी होगी, ग्राहकों की संख्या लाखों में गिनी जाएगी। यह सब कुछ होगा पर पत्र प्राणहीन होंगे। पत्रों की नीति देशभक्त, धर्मभक्त अथवा मानवता के उपासक महाप्राण सम्पादकों की नीति न होगी- इन गुणों से सम्पन्न लेखक विकृत मस्तिष्क समझे जाएंगे, सम्पादक की कुर्सी तक उनकी पहुँच भी न होगी। वेतन भोगी सम्पादक मालिक का काम करेंगे और बड़ी खूबी के साथ करेंगे। वे हम लोगों से अच्छे होंगे। पर आज भी हमें जो स्वतन्त्रता प्राप्त है वह उन्हें न होगी। वस्तुतः पत्रों के जीवन में यही समय बहुमूल्य है। इंग्लैण्ड और अमेरिका के पत्रों ने उन्हीं दिनों सच्चा काम किया था जब उनके आकार छोटे थे, समाचार कम होते थे, ग्राहक थोडे होते थे पर सम्पादक की लेखनी में ओज था और प्राण था। उन देशों की इस उन्नति के बहुत कुछ कारण वे ही सम्पादक थे जिनसे धनी घृणा करते थे, शासक क्रुद्ध रहा करते थे और जो हमारे ही जैसे, एक पैर जेल में रखकर धर्मबुद्धि से पत्र सम्पादन किया करते थे। उनके परिश्रम से और कष्ट से पत्रों की उन्नति हुई पर उनके वंश का लोप हो गया। अब संचालक और व्यवस्थापक सर्वेसर्वा हैं, सम्पादक कुछ नहीं है। समाचार-पत्रों की उन्नति कैसे हो सकती है?

निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये आज से सप्तदशक पूर्व सम्पादकाचार्य पराड़करजी ने कहा था- हम सब सम्पादक पत्रों की उन्नति चाहते हैं। पर हमें स्मरण रखना चाहिए कि इस उन्नति के साथ-साथ हमारी स्वातंत्र्य-हानि अवश्यम्भावी है। उन्नति व्यापारी ढंग से ही हो सकती है, इसके लिए पूँजीपति और संचालक व्यवसाय की आवश्यकता है। इनके कथनानुसार और भी पत्र का सम्पादन करना असम्भव हो जाता है। इंग्लैण्ड और अमेरिका के पत्रों में स्पष्ट देखा जाता है कि इनके समाचार स्तम्भ, मनोरंजन स्तम्भ जितने ही अच्छे हो रहे हैं, उनके सम्पादकीय स्तम्भ उतने ही निकम्मे बनते जा रहे हैं। लन्दन के 'टाइम्स' जैसे दो-तीन पत्र इसक अपवाद हैं। पर साधारण नियम वही है जो बताया जा चुका है। एडिटर की अपेक्षा मैनेजिंग एडिटर का प्रभाव और गौरव अधिक बढ़ गया है। भावी हिन्दी समाचार-पत्रों में ऐसा ही होगा। पत्र निकालकर सफलतापूर्वक चलाना बड़े-बड़े धनियों अथवा सुसंघटित कम्पनियों के लिए संभव होगा। पत्र सर्वांगसुन्दर होंगे। आकार बड़े होंगे, छपाई अच्छी होगी, मनोहर, मनोरंजक और ज्ञानवर्द्धक चित्रों से ससज्जित होंगे. लेखों में विविधता होगी, काल्पकता होगी, गम्भीर गवेषणा की झलक होगी और मनोहारिणी शक्ति भी होगी, ग्राहकों की संख्या लाखों में गिनी जाएगी। यह सब कुछ होगा पर पत्र प्राणहीन होंगे। पत्रों की नीति देशभक्त, धर्मभक्त अथवा मानवता के उपासक महाप्राण सम्पादकों की नीति न होगी- इन गुणों से सम्पन्न लेखक विकृत मस्तिष्क समझे जाएंगे, सम्पादक की कुर्सी तक उनकी पहुँच भी न होगी। वेतन भोगी सम्पादक मालिक का काम करेंगे और बड़ी खूबी के साथ करेंगे। वे हम लोगों से अच्छे होंगे। पर आज भी हमें जो स्वतन्त्रता प्राप्त है वह उन्हें न होगी। वस्तुतः पत्रों के जीवन में यही समय बहुमूल्य है। इंग्लैण्ड और अमेरिका के पत्रों ने उन्हीं दिनों सच्चा काम किया था जब उनके आकार छोटे थे, समाचार कम होते थे, ग्राहक थोडे होते थे पर सम्पादक की लेखनी में ओज था और प्राण था। उन देशों की इस उन्नति के बहुत कुछ कारण वे ही सम्पादक थे जिनसे धनी घृणा करते थे, शासक क्रुद्ध रहा करते थे और जो हमारे ही जैसे, एक पैर जेल में रखकर धर्मबुद्धि से पत्र सम्पादन किया करते थे। उनके परिश्रम से और कष्ट से पत्रों की उन्नति हुई पर उनके वंश का लोप हो गया। अब संचालक और व्यवस्थापक सर्वेसर्वा हैं, सम्पादक कुछ नहीं है। "इंग्लैण्ड और अमेरिका के पत्रों ने उन्हीं दिनों सच्चा काम किया था जब उनके आकार छोटे थे।" वाक्य से लेखक का क्या आशय है।

सिद्धार्थ की माँ ने अपने परिवार के सदस्यों से अनुरोध किया है कि वे घर में एक ही भाषा का प्रयोग करें। जिससे कि सिद्धार्थ का भाषाई विकास ठीक से हो सके। उनके बारे में आप क्या कहोंगे?

छात्र की सहायता करना अत्यावश्यक है कि उसका मन वैज्ञानिक, स्पष्ट, निश्चित और सूक्ष्मता से सोचने वाला तथा उसके साथ ही साथ मन की गहराईयों को अनावृत करने वाला हो। क्या छात्र को इस प्रकार शिक्षित करना संभव है कि वह सभी लेबिलों के परे जो कर सके तथा उस वस्त का पता लगा सके, उसका अनुभव कर सके, जिसको मन नहीं माप सकता, जो किसी पुस्तक में नहीं लिखा है। यदि इस प्रकार के एक विद्यालय में ऐसी शिक्षा संभव हो सके, तो वह अनूठी होगी। आप सभी को यह देखना चाहिए कि इस प्रकार के विद्यालय का निर्माण कितना मूल्यवान होगा। केवल नृत्य, संगीत, गणित और दूसरे पाठों पर ध्यान देना समस्त जीवन नहीं है। शांत बैठना तथा अपने को देखना, सूक्ष्म दृष्टि प्राप्त करना, अवलोकन करना भी जीवन का अंग है। विचार कैसे किया जाए. किस पर विचार किया जाए, तथा आप विचार क्यों कर रहे हैं, इसको देखना भी आवश्यक है। लेखक ने अनूठी शिक्षा में ____ बल दिया है।

छात्र की सहायता करना अत्यावश्यक है कि उसका मन वैज्ञानिक, स्पष्ट, निश्चित और सूक्ष्मता से सोचने वाला तथा उसके साथ ही साथ मन की गहराईयों को अनावृत करने वाला हो। क्या छात्र को इस प्रकार शिक्षित करना संभव है कि वह सभी लेबिलों के परे जो कर सके तथा उस वस्त का पता लगा सके, उसका अनुभव कर सके, जिसको मन नहीं माप सकता, जो किसी पुस्तक में नहीं लिखा है। यदि इस प्रकार के एक विद्यालय में ऐसी शिक्षा संभव हो सके, तो वह अनूठी होगी। आप सभी को यह देखना चाहिए कि इस प्रकार के विद्यालय का निर्माण कितना मूल्यवान होगा। केवल नृत्य, संगीत, गणित और दूसरे पाठों पर ध्यान देना समस्त जीवन नहीं है। शांत बैठना तथा अपने को देखना, सूक्ष्म दृष्टि प्राप्त करना, अवलोकन करना भी जीवन का अंग है। विचार कैसे किया जाए. किस पर विचार किया जाए, तथा आप विचार क्यों कर रहे हैं, इसको देखना भी आवश्यक है। लेखक की दृष्टि में सर्वाधिक महत्वपूर्ण क्या है?

गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नो में सबसे उचित विकल्प चुनिए। इस समय जनसत्त संसार के प्रत्येक देश के दरवाजे पर दस्तक दे रही है और आज वह अपने मजबूत हाथो में भारतवर्ष के दरवाजे की जंजीर भी खटखटाती हुई उसे अत्यंत प्राचीन भूमि के निवासियों से प्रश्न करती है की बतलाओ , तुम नवयुग का स्वागत किस प्रकार करना चाहते हो ? इस देश के युवको से और उन सभी प्रकार के लोगो से जो कर्मक्षेत्र में अवतीर्ण हो चुके है उसके संसार के अत्याचारों और अनाचारों की और ऊँगली उठाते हुए स्पष्ट प्रश्न है कि क्या उस समय जबकि संसार में न्याय और अन्याय का ऐसा घमासान युद्ध छिड़ा हुआ है , तुम निष्क्रिय और चुपचाप हाथ पर हाथ रखे बैठे रहना ही उचित समझते हो ? क्या उस समय जबकि राष्ट्रों के होनहार नैनिहाल केवल निकृष्ट श्रेणियों में जन्म लेने के कारण जबरदस्तों कि स्वार्थ वेदी पर बेदर्दी से बलिदान किये जा रहे है , जब केवल जाती या रंग के कारण मनुष्य मनुष्य कि गर्दन काट रहा है , तुम चुपचाप बैठे हुए इस विभीषिका को देखते रहना अपना धर्म समझते हो ? क्या उस समय जब व्यक्तियों के स्वेच्छाचारो के अंत कि घोषणा संसार भर में गूंज उठी है और स्वेच्छाचार अपनी धाक कि समाप्ति के पश्चात अब अपने जाने कि गंभीरतापूर्वक तयारी कर रहा है , तब उन घटनाओ को चुपचाप देखना ही तुम्हारा कर्तव्य है ? गद्यांश के अनुसार संसार में किसके बीच युद्ध हो रहा है ?

गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नो में सबसे उचित विकल्प चुनिए। इस समय जनसत्त संसार के प्रत्येक देश के दरवाजे पर दस्तक दे रही है और आज वह अपने मजबूत हाथो में भारतवर्ष के दरवाजे की जंजीर भी खटखटाती हुई उसे अत्यंत प्राचीन भूमि के निवासियों से प्रश्न करती है की बतलाओ , तुम नवयुग का स्वागत किस प्रकार करना चाहते हो ? इस देश के युवको से और उन सभी प्रकार के लोगो से जो कर्मक्षेत्र में अवतीर्ण हो चुके है उसके संसार के अत्याचारों और अनाचारों की और ऊँगली उठाते हुए स्पष्ट प्रश्न है कि क्या उस समय जबकि संसार में न्याय और अन्याय का ऐसा घमासान युद्ध छिड़ा हुआ है , तुम निष्क्रिय और चुपचाप हाथ पर हाथ रखे बैठे रहना ही उचित समझते हो ? क्या उस समय जबकि राष्ट्रों के होनहार नैनिहाल केवल निकृष्ट श्रेणियों में जन्म लेने के कारण जबरदस्तों कि स्वार्थ वेदी पर बेदर्दी से बलिदान किये जा रहे है , जब केवल जाती या रंग के कारण मनुष्य मनुष्य कि गर्दन काट रहा है , तुम चुपचाप बैठे हुए इस विभीषिका को देखते रहना अपना धर्म समझते हो ? क्या उस समय जब व्यक्तियों के स्वेच्छाचारो के अंत कि घोषणा संसार भर में गूंज उठी है और स्वेच्छाचार अपनी धाक कि समाप्ति के पश्चात अब अपने जाने कि गंभीरतापूर्वक तयारी कर रहा है , तब उन घटनाओ को चुपचाप देखना ही तुम्हारा कर्तव्य है ? इनमे से किस कारणवश कुछ व्यक्तियों का बलिदान किया जा रहा है ?

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