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PHYSICS
पशच बायस में p-n संधि डायोड के लिए परिपथ...

पशच बायस में p-n संधि डायोड के लिए परिपथ आरेख बनाइए तथा इसके लिए I - V अभिलाक्षणिक खीचिए |

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p-n संधि |p-n संधि डायोड के उपयोग |ट्रांजिस्टर

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In the following Venn diagram, the ‘Rectangle’ stands for ‘Judges’ the ‘Triangle’ stands for ‘Males’ and the ‘Hexagon’ stands for ‘Golf players’. The given numbers represent the number of persons in that particular category. How many male judges are there in total? निम्नलिखित वेन आरेख में, 'आयत' 'न्यायाधीशों के लिए' 'त्रिभुज' पुरुषो के लिए, षट्भुज गोल्फ खिलाडियों के लिए, है। दिए गए नंबर उस विशेष श्रेणी के व्यक्तियों की संख्या को दर्शाते हैं। कुल कितने पुरुष न्यायाधीश हैं?

The rate of interest for the first 2 years is 6% p.a, for next 3 years is 10% p.a, and for the period beyond 5 years is 12% p.a, If a person gets ₹ 12,771 as simple interest after 7 years, then how money did he invest ? ब्याज की दर पहले 2 वर्षों के लिए 6% प्रति वर्ष, अगले तीन वर्षों के लिए 10% प्रति वर्ष तथा 5 वर्षों से बाद की अवधि के लिए 12% है। यदि एक व्यक्ति को 7 वर्षों के बाद साधारण ब्याज के रूप में 12,771 रुपये प्राप्त होते हैं, तो उसने कितनी राशि निवेश की थी?

हमारा जीवन जिन मानवीय सिद्धांतों, अनुभवों और सांस्कृतिक संस्कारों के संबल से समस्त सृष्टि के लिए महत्त्वपूर्ण बना है, परोपकार की भावना उन्हीं में एक है। मानव को दूसरे मानव के प्रति वैसा ही संवेदनात्मक उत्तरदायित्व निभाना चाहिए, जैसे वह स्वयं के प्रति निभाता है। जीवन को केवल परोपकार, पर सेवा और निःस्वार्थ प्रेम के लिए ही वास्तविक समझना चाहिए क्योंकि नश्वर शरीर जब नष्ट हो जाएगा तो उसके बाद हमारा कुछ भी इस दुनिया के जीवों की स्मृति में नही रहेगा। हम जग जीवों की स्मृति में सदा-सदा के लिए तभी बने रह सकते हैं, जब हम अपने नश्वर शरीर को वैचारिक, बौद्धिक और आत्मिक चेतना से पूर्ण कर निःस्वार्थ भाव से स्वयं को जीव सेवा में समर्पित करेंगे। हमें स्थिरता से और शांतिपूर्वक यह विचार करते रहना चाहिए कि हमारे जीवन का सर्वश्रेष्ठ उद्देश्य और एकमात्र लक्ष्य हमारे द्वारा किया जाने वाला त्याग है। त्याग योग्य व्यक्तित्व प्राप्त करने के लिए गहन तप की आवश्यकता है। त्याग का भाव किसी मनुष्य में साधारण होते हुए नही जन्म लेता। इसके लिए मनुष्य को जीवन-जगत और इसके जीवों के संबंध में असाधारण वैचारिक रचनात्मकता अपनाकर निरंतर योग, ध्यान, तप व साधना करनी होगी। उसे इस स्थिति से विचरते हुए विशिष्ट आध्यात्मिक अनुभवों से लैस होना होगा। आवश्यकता होने पर उसे जीवों की वास्तविक सेवा करनी होगी। जब ऐसी विशेष मानवीय परिस्थितियों उत्पन्न होंगी, तब ही मानव में त्याग भाव आकार ग्रहण करेगा। त्याग के योग्य व्यक्तित्व प्राप्त करने के लिए आवश्यक है