पीला प्रकाश `(lamda = 6000Å) 1 xx 10^4` मीटर चौड़े स्लिट को प्रदीप्त करता है। केंद्रीय उच्चिष्ठ के दोनों ओर दो अदीप्त रेखाओं के बीच की दूरी ज्ञात कीजिए जबकि विवर्तन प्रतिरूप स्लिट से 1.5 मीटर दूर स्थित पर्दे पर देखा जाता है।
पीला प्रकाश `(lamda = 6000Å) 1 xx 10^4` मीटर चौड़े स्लिट को प्रदीप्त करता है। केंद्रीय उच्चिष्ठ के दोनों ओर दो अदीप्त रेखाओं के बीच की दूरी ज्ञात कीजिए जबकि विवर्तन प्रतिरूप स्लिट से 1.5 मीटर दूर स्थित पर्दे पर देखा जाता है।
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A person was standing on a road near a mall. He was 1425 m away from the mall and able to see the top of the mall from the road in such a way that the top of the tree, which is in between him and the mall, was exactly in the line of sight with the top of the mall. The tree height is 10m and it is 30m away from him. How tall (in m) is the mall? एक व्यक्ति एक मॉल के पास सड़क पर खड़ा था। वह मॉल से 1425 मीटर दूर था और सड़क से मॉल के शीर्ष को इस तरह से देखने में सक्षम था कि पेड़ का शीर्ष, जो उसके और मॉल के बीच में है, बिल्कुल शीर्ष के साथ दृष्टि की रेखा में था उन सब का। पेड़ की ऊंचाई 10 मीटर है और यह उससे 30 मीटर दूर है। मॉल कितना लंबा (मीटर में) है|
Two circle of radii 5 cm and 8 cm intersect at the points A and B. If AB = 8cm and the distance between the centre of two circles is x cm, then the value of x (to the closet integer) is : त्रिज्या 5 सेमी और 8 सेमी वाले दो वृत्त एक दूसरे को बिंदु A तथा B पर काटते हैं | यदि AB =8 सेमी है और दोनों वृत्तों के केंद्रों के बीच की दूरी x सेमी है, तो x का मान ( निकटतम पूर्णाक में ) ज्ञात करें |
निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये गद्यांश धर्म पालन करने के मार्ग में सबसे अधिक बाधा चित की चंचलता, उद्देश्य की अस्थिरता और मन की निर्बलता से पड़ती है। मनुष्य के कर्तव्य मार्ग में एक ओर तो आत्मा के बुरे-भले कामों का ज्ञान और दूसरी ओर आलस्य और स्वार्थपरता रहती है। बस, मनुष्य इन्हीं दोनों के बीच में पड़ा रहा है। अंत में यदि उस का मन पक्का हुआ तो वह आत्मा की आज्ञा मानकर अपना धर्म पालन करता है पर यदि उसका मन दुविधा में पड़ा रहा है तो स्वार्थपरता उसे निश्चित ही परेगी और उसका चरित्र घृणा के योग्य हो जाएगा। इसीलिए यह बहुत आवश्यक है कि आत्मा जिस बात को करने की प्रवृत्ति दे, उसे बिना स्वार्थन सोचे, झटपट कर डालना चाहिए। इस संसार में जितने बड़े-बड़े लोग हुए हैं, सभी ने अपने कर्तव्य को सबसे श्रेष्ठ माना है क्योंकि जितने कर्म उन्होंने किए उन सबने अपने कर्तव्य पर ध्यान देकर न्याय का बर्ताव किया। जिन जातियों में यह गुण पाया जाता है। वे ही संसार में उन्नति करती हैं और संसार में उनका नाम आदर के साथ लिया जाता है। जो लोग स्वार्थी होकर अपने कर्तव्य पर ध्यान नहीं देते, वे संसार में लज्जित होते हैं और सब लोग उनसे घृणा करते हैं। कर्तव्य पालन और सत्यता में बड़ा घनिष्ठ संबंध है। जो मनुष्य अपना कर्तव्य पालन करता है वह अपने कामों और वचनों में सत्यता का बर्ताव भी रखता है। सत्यता ही एक ऐसी वस्तु है जिसमें इस संसार में मनुष्य अपने कार्यों में सफलता पा सकता है क्योंकि संसार में कोई काम झूठ बोलने से नहीं चल सकता। झूठ की उत्पति पाप, कुटिलता और कायरता से होती है। झूठ बोलना कई रूपों में दीख पड़ता है, जैसे चुप रहना, किसी बात को बढ़ा कर कहना, किसी बात को छिपाना, झूठ-मूठ दूसरों की हां में हां मिलाना आदि। कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो मुंह देखी बातें बनाया करते हैं, पर करते वहीं हैं जो उन्हें रुचता हैं। ऐसे लोग मन में समझते हैं कि कैसे सब को मूर्ख बनाकर हमने अपना काम कर लिया, पर वास्तव में वे अपने को ही मूर्ख बनाते हैं और अंत में उनकी पोल खुल जाने पर समाज के लोग उनसे घृणा करते हैं। धर्म पालन करने में बाधा डालती है
निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये गद्यांश धर्म पालन करने के मार्ग में सबसे अधिक बाधा चित की चंचलता, उद्देश्य की अस्थिरता और मन की निर्बलता से पड़ती है। मनुष्य के कर्तव्य मार्ग में एक ओर तो आत्मा के बुरे-भले कामों का ज्ञान और दूसरी ओर आलस्य और स्वार्थपरता रहती है। बस, मनुष्य इन्हीं दोनों के बीच में पड़ा रहा है। अंत में यदि उस का मन पक्का हुआ तो वह आत्मा की आज्ञा मानकर अपना धर्म पालन करता है पर यदि उसका मन दुविधा में पड़ा रहा है तो स्वार्थपरता उसे निश्चित ही परेगी और उसका चरित्र घृणा के योग्य हो जाएगा। इसीलिए यह बहुत आवश्यक है कि आत्मा जिस बात को करने की प्रवृत्ति दे, उसे बिना स्वार्थन सोचे, झटपट कर डालना चाहिए। इस संसार में जितने बड़े-बड़े लोग हुए हैं, सभी ने अपने कर्तव्य को सबसे श्रेष्ठ माना है क्योंकि जितने कर्म उन्होंने किए उन सबने अपने कर्तव्य पर ध्यान देकर न्याय का बर्ताव किया। जिन जातियों में यह गुण पाया जाता है। वे ही संसार में उन्नति करती हैं और संसार में उनका नाम आदर के साथ लिया जाता है। जो लोग स्वार्थी होकर अपने कर्तव्य पर ध्यान नहीं देते, वे संसार में लज्जित होते हैं और सब लोग उनसे घृणा करते हैं। कर्तव्य पालन और सत्यता में बड़ा घनिष्ठ संबंध है। जो मनुष्य अपना कर्तव्य पालन करता है वह अपने कामों और वचनों में सत्यता का बर्ताव भी रखता है। सत्यता ही एक ऐसी वस्तु है जिसमें इस संसार में मनुष्य अपने कार्यों में सफलता पा सकता है क्योंकि संसार में कोई काम झूठ बोलने से नहीं चल सकता। झूठ की उत्पति पाप, कुटिलता और कायरता से होती है। झूठ बोलना कई रूपों में दीख पड़ता है, जैसे चुप रहना, किसी बात को बढ़ा कर कहना, किसी बात को छिपाना, झूठ-मूठ दूसरों की हां में हां मिलाना आदि। कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो मुंह देखी बातें बनाया करते हैं, पर करते वहीं हैं जो उन्हें रुचता हैं। ऐसे लोग मन में समझते हैं कि कैसे सब को मूर्ख बनाकर हमने अपना काम कर लिया, पर वास्तव में वे अपने को ही मूर्ख बनाते हैं और अंत में उनकी पोल खुल जाने पर समाज के लोग उनसे घृणा करते हैं। संसार के बड़े-बड़े लोगों ने सबसे श्रेष्ठ माना है
निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये गद्यांश धर्म पालन करने के मार्ग में सबसे अधिक बाधा चित की चंचलता, उद्देश्य की अस्थिरता और मन की निर्बलता से पड़ती है। मनुष्य के कर्तव्य मार्ग में एक ओर तो आत्मा के बुरे-भले कामों का ज्ञान और दूसरी ओर आलस्य और स्वार्थपरता रहती है। बस, मनुष्य इन्हीं दोनों के बीच में पड़ा रहा है। अंत में यदि उस का मन पक्का हुआ तो वह आत्मा की आज्ञा मानकर अपना धर्म पालन करता है पर यदि उसका मन दुविधा में पड़ा रहा है तो स्वार्थपरता उसे निश्चित ही परेगी और उसका चरित्र घृणा के योग्य हो जाएगा। इसीलिए यह बहुत आवश्यक है कि आत्मा जिस बात को करने की प्रवृत्ति दे, उसे बिना स्वार्थन सोचे, झटपट कर डालना चाहिए। इस संसार में जितने बड़े-बड़े लोग हुए हैं, सभी ने अपने कर्तव्य को सबसे श्रेष्ठ माना है क्योंकि जितने कर्म उन्होंने किए उन सबने अपने कर्तव्य पर ध्यान देकर न्याय का बर्ताव किया। जिन जातियों में यह गुण पाया जाता है। वे ही संसार में उन्नति करती हैं और संसार में उनका नाम आदर के साथ लिया जाता है। जो लोग स्वार्थी होकर अपने कर्तव्य पर ध्यान नहीं देते, वे संसार में लज्जित होते हैं और सब लोग उनसे घृणा करते हैं। कर्तव्य पालन और सत्यता में बड़ा घनिष्ठ संबंध है। जो मनुष्य अपना कर्तव्य पालन करता है वह अपने कामों और वचनों में सत्यता का बर्ताव भी रखता है। सत्यता ही एक ऐसी वस्तु है जिसमें इस संसार में मनुष्य अपने कार्यों में सफलता पा सकता है क्योंकि संसार में कोई काम झूठ बोलने से नहीं चल सकता। झूठ की उत्पति पाप, कुटिलता और कायरता से होती है। झूठ बोलना कई रूपों में दीख पड़ता है, जैसे चुप रहना, किसी बात को बढ़ा कर कहना, किसी बात को छिपाना, झूठ-मूठ दूसरों की हां में हां मिलाना आदि। कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो मुंह देखी बातें बनाया करते हैं, पर करते वहीं हैं जो उन्हें रुचता हैं। ऐसे लोग मन में समझते हैं कि कैसे सब को मूर्ख बनाकर हमने अपना काम कर लिया, पर वास्तव में वे अपने को ही मूर्ख बनाते हैं और अंत में उनकी पोल खुल जाने पर समाज के लोग उनसे घृणा करते हैं। झूठ की उत्पति होती है
निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये गद्यांश धर्म पालन करने के मार्ग में सबसे अधिक बाधा चित की चंचलता, उद्देश्य की अस्थिरता और मन की निर्बलता से पड़ती है। मनुष्य के कर्तव्य मार्ग में एक ओर तो आत्मा के बुरे-भले कामों का ज्ञान और दूसरी ओर आलस्य और स्वार्थपरता रहती है। बस, मनुष्य इन्हीं दोनों के बीच में पड़ा रहा है। अंत में यदि उस का मन पक्का हुआ तो वह आत्मा की आज्ञा मानकर अपना धर्म पालन करता है पर यदि उसका मन दुविधा में पड़ा रहा है तो स्वार्थपरता उसे निश्चित ही परेगी और उसका चरित्र घृणा के योग्य हो जाएगा। इसीलिए यह बहुत आवश्यक है कि आत्मा जिस बात को करने की प्रवृत्ति दे, उसे बिना स्वार्थन सोचे, झटपट कर डालना चाहिए। इस संसार में जितने बड़े-बड़े लोग हुए हैं, सभी ने अपने कर्तव्य को सबसे श्रेष्ठ माना है क्योंकि जितने कर्म उन्होंने किए उन सबने अपने कर्तव्य पर ध्यान देकर न्याय का बर्ताव किया। जिन जातियों में यह गुण पाया जाता है। वे ही संसार में उन्नति करती हैं और संसार में उनका नाम आदर के साथ लिया जाता है। जो लोग स्वार्थी होकर अपने कर्तव्य पर ध्यान नहीं देते, वे संसार में लज्जित होते हैं और सब लोग उनसे घृणा करते हैं। कर्तव्य पालन और सत्यता में बड़ा घनिष्ठ संबंध है। जो मनुष्य अपना कर्तव्य पालन करता है वह अपने कामों और वचनों में सत्यता का बर्ताव भी रखता है। सत्यता ही एक ऐसी वस्तु है जिसमें इस संसार में मनुष्य अपने कार्यों में सफलता पा सकता है क्योंकि संसार में कोई काम झूठ बोलने से नहीं चल सकता। झूठ की उत्पति पाप, कुटिलता और कायरता से होती है। झूठ बोलना कई रूपों में दीख पड़ता है, जैसे चुप रहना, किसी बात को बढ़ा कर कहना, किसी बात को छिपाना, झूठ-मूठ दूसरों की हां में हां मिलाना आदि। कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो मुंह देखी बातें बनाया करते हैं, पर करते वहीं हैं जो उन्हें रुचता हैं। ऐसे लोग मन में समझते हैं कि कैसे सब को मूर्ख बनाकर हमने अपना काम कर लिया, पर वास्तव में वे अपने को ही मूर्ख बनाते हैं और अंत में उनकी पोल खुल जाने पर समाज के लोग उनसे घृणा करते हैं। मनुष्य इन दोनों के बीच में पड़ा रहता है।' वाक्य में इन दोनों' का प्रयोग किस अर्थ में हुआ है?
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