सिद्ध कीजिए कि ए सी परिपथ में औसत शक्ति `P_(av)=V_(rms)xxI_(rms)xx(R)/(Z)` से दी जाती है ।
जहाँ R परिपथ का प्रतिरोध तथा Z प्रतिबाधा है।
सिद्ध कीजिए कि ए सी परिपथ में औसत शक्ति `P_(av)=V_(rms)xxI_(rms)xx(R)/(Z)` से दी जाती है ।
जहाँ R परिपथ का प्रतिरोध तथा Z प्रतिबाधा है।
जहाँ R परिपथ का प्रतिरोध तथा Z प्रतिबाधा है।
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Rs. 2100 is divided among in P , Q and R in such a way that P’s share is half of the combined share of Q and R , and Q’s share is one-fourth of the combined share of P and R. By what amount is R’s share more than that of P? 2100 को P, Q और R में इस तरह से विभाजित किया गया है कि P का हिस्सा Q और R के संयुक्त हिस्से का आधा है और Q का हिस्सा P और R के संयुक्त हिस्से का एक-चौथाई हिस्सा है। R की हिस्सेदारी P की हिस्सेदारी से कितना अधिक है?
संसार के सभी देशों में शिक्षित व्यक्ति की सबसे पहली पहचान यह होती है। कि वह अपनी मातृभाषा में दक्षता से काम कर सकता है। केवल भारत ही एक ऐसा देश है, जिसमें शिक्षित व्यक्ति वह समझा जाता है, जो अपनी मातृभाषा में दक्ष हो या न हो, किन्तु अंग्रेज़ी में जिसकी दक्षता असंदिग्ध हो। संसार के अन्य देशों में सुसंस्कृत व्यक्ति वह समझा जाता है, जिसके घर में । अपनी भाषा की पुस्तकों का संग्रह हो और जिसे बराबर यह पता रहे कि उसकी भाषा के अच्छे लेखक और कवि कौन हैं तथा समय-समय पर उनकी कौन-सी कृतियाँ प्रकाशित हो रही हैं? भारत में स्थिति दूसरी है। यहाँ घर में प्रायः साज-सज्जा के आधुनिक उपकरण तो होते हैं, किन्तु अपनी भाषा की कोई पुस्तक नहीं होती है। यह दुर्वस्था भले ही किसी ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम है, किन्तु वह सुदशा नहीं है दुर्वस्था ही है। इस दृष्टि से भारतीय भाषाओं के लेखक केवल यूरोपीय और अमेरिकी लेखकों से ही हीन नहीं हैं, बल्कि उनकी किस्मत चीन, जापान के लेखकों की किस्मत से भी खराब है, क्योंकि इन सभी लेखकों की कृतियाँ वहाँ के अत्यन्त सुशिक्षित लोग भी पढ़ते हैं। केवल हम ही नहीं हैं, जिनकी पुस्तकों पर यहाँ के तथाकथित शिक्षित समुदाय की दृष्टि प्राय: नहीं पड़ती। हमारा तथाकथित उच्च शिक्षित समुदाय जो कुछ पढ़ना चाहता है, उसे अंग्रेजी में ही । पढ़ लेता है यहाँ तक उसकी कविता और उपन्यास पढ़ने की तृष्णा भी अंग्रेजी की कविता और उपन्यास पढ़कर ही समाप्त हो जाती है और उसे यह जानने की इच्छा नहीं होती कि शरीर से वह जिस समाज का सदस्य है उसके मनोभाव उपन्यास और काव्य में किस अदा से व्यक्त हो रहे हैं। इस गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक निम्नलिखित में से क्या हो सकता है?
संसार के सभी देशों में शिक्षित व्यक्ति की सबसे पहली पहचान यह होती है। कि वह अपनी मातृभाषा में दक्षता से काम कर सकता है। केवल भारत ही एक ऐसा देश है, जिसमें शिक्षित व्यक्ति वह समझा जाता है, जो अपनी मातृभाषा में दक्ष हो या न हो, किन्तु अंग्रेज़ी में जिसकी दक्षता असंदिग्ध हो। संसार के अन्य देशों में सुसंस्कृत व्यक्ति वह समझा जाता है, जिसके घर में । अपनी भाषा की पुस्तकों का संग्रह हो और जिसे बराबर यह पता रहे कि उसकी भाषा के अच्छे लेखक और कवि कौन हैं तथा समय-समय पर उनकी कौन-सी कृतियाँ प्रकाशित हो रही हैं? भारत में स्थिति दूसरी है। यहाँ घर में प्रायः साज-सज्जा के आधुनिक उपकरण तो होते हैं, किन्तु अपनी भाषा की कोई पुस्तक नहीं होती है। यह दुर्वस्था भले ही किसी ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम है, किन्तु वह सुदशा नहीं है दुर्वस्था ही है। इस दृष्टि से भारतीय भाषाओं के लेखक केवल यूरोपीय और अमेरिकी लेखकों से ही हीन नहीं हैं, बल्कि उनकी किस्मत चीन, जापान के लेखकों की किस्मत से भी खराब है, क्योंकि इन सभी लेखकों की कृतियाँ वहाँ के अत्यन्त सुशिक्षित लोग भी पढ़ते हैं। केवल हम ही नहीं हैं, जिनकी पुस्तकों पर यहाँ के तथाकथित शिक्षित समुदाय की दृष्टि प्राय: नहीं पड़ती। हमारा तथाकथित उच्च शिक्षित समुदाय जो कुछ पढ़ना चाहता है, उसे अंग्रेजी में ही । पढ़ लेता है यहाँ तक उसकी कविता और उपन्यास पढ़ने की तृष्णा भी अंग्रेजी की कविता और उपन्यास पढ़कर ही समाप्त हो जाती है और उसे यह जानने की इच्छा नहीं होती कि शरीर से वह जिस समाज का सदस्य है उसके मनोभाव उपन्यास और काव्य में किस अदा से व्यक्त हो रहे हैं। प्रस्तुत गद्यांश के अनुसार निम्नलिखित में से कौन-सा कथन असत्य है?
संसार के सभी देशों में शिक्षित व्यक्ति की सबसे पहली पहचान यह होती है। कि वह अपनी मातृभाषा में दक्षता से काम कर सकता है। केवल भारत ही एक ऐसा देश है, जिसमें शिक्षित व्यक्ति वह समझा जाता है, जो अपनी मातृभाषा में दक्ष हो या न हो, किन्तु अंग्रेज़ी में जिसकी दक्षता असंदिग्ध हो। संसार के अन्य देशों में सुसंस्कृत व्यक्ति वह समझा जाता है, जिसके घर में । अपनी भाषा की पुस्तकों का संग्रह हो और जिसे बराबर यह पता रहे कि उसकी भाषा के अच्छे लेखक और कवि कौन हैं तथा समय-समय पर उनकी कौन-सी कृतियाँ प्रकाशित हो रही हैं? भारत में स्थिति दूसरी है। यहाँ घर में प्रायः साज-सज्जा के आधुनिक उपकरण तो होते हैं, किन्तु अपनी भाषा की कोई पुस्तक नहीं होती है। यह दुर्वस्था भले ही किसी ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम है, किन्तु वह सुदशा नहीं है दुर्वस्था ही है। इस दृष्टि से भारतीय भाषाओं के लेखक केवल यूरोपीय और अमेरिकी लेखकों से ही हीन नहीं हैं, बल्कि उनकी किस्मत चीन, जापान के लेखकों की किस्मत से भी खराब है, क्योंकि इन सभी लेखकों की कृतियाँ वहाँ के अत्यन्त सुशिक्षित लोग भी पढ़ते हैं। केवल हम ही नहीं हैं, जिनकी पुस्तकों पर यहाँ के तथाकथित शिक्षित समुदाय की दृष्टि प्राय: नहीं पड़ती। हमारा तथाकथित उच्च शिक्षित समुदाय जो कुछ पढ़ना चाहता है, उसे अंग्रेजी में ही । पढ़ लेता है यहाँ तक उसकी कविता और उपन्यास पढ़ने की तृष्णा भी अंग्रेजी की कविता और उपन्यास पढ़कर ही समाप्त हो जाती है और उसे यह जानने की इच्छा नहीं होती कि शरीर से वह जिस समाज का सदस्य है उसके मनोभाव उपन्यास और काव्य में किस अदा से व्यक्त हो रहे हैं। 'संसार' शब्द का समानार्थी शब्द है
संसार के सभी देशों में शिक्षित व्यक्ति की सबसे पहली पहचान यह होती है। कि वह अपनी मातृभाषा में दक्षता से काम कर सकता है। केवल भारत ही एक ऐसा देश है, जिसमें शिक्षित व्यक्ति वह समझा जाता है, जो अपनी मातृभाषा में दक्ष हो या न हो, किन्तु अंग्रेज़ी में जिसकी दक्षता असंदिग्ध हो। संसार के अन्य देशों में सुसंस्कृत व्यक्ति वह समझा जाता है, जिसके घर में । अपनी भाषा की पुस्तकों का संग्रह हो और जिसे बराबर यह पता रहे कि उसकी भाषा के अच्छे लेखक और कवि कौन हैं तथा समय-समय पर उनकी कौन-सी कृतियाँ प्रकाशित हो रही हैं? भारत में स्थिति दूसरी है। यहाँ घर में प्रायः साज-सज्जा के आधुनिक उपकरण तो होते हैं, किन्तु अपनी भाषा की कोई पुस्तक नहीं होती है। यह दुर्वस्था भले ही किसी ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम है, किन्तु वह सुदशा नहीं है दुर्वस्था ही है। इस दृष्टि से भारतीय भाषाओं के लेखक केवल यूरोपीय और अमेरिकी लेखकों से ही हीन नहीं हैं, बल्कि उनकी किस्मत चीन, जापान के लेखकों की किस्मत से भी खराब है, क्योंकि इन सभी लेखकों की कृतियाँ वहाँ के अत्यन्त सुशिक्षित लोग भी पढ़ते हैं। केवल हम ही नहीं हैं, जिनकी पुस्तकों पर यहाँ के तथाकथित शिक्षित समुदाय की दृष्टि प्राय: नहीं पड़ती। हमारा तथाकथित उच्च शिक्षित समुदाय जो कुछ पढ़ना चाहता है, उसे अंग्रेजी में ही । पढ़ लेता है यहाँ तक उसकी कविता और उपन्यास पढ़ने की तृष्णा भी अंग्रेजी की कविता और उपन्यास पढ़कर ही समाप्त हो जाती है और उसे यह जानने की इच्छा नहीं होती कि शरीर से वह जिस समाज का सदस्य है उसके मनोभाव उपन्यास और काव्य में किस अदा से व्यक्त हो रहे हैं। भारत में शिक्षित व्यक्ति की क्या पहचान है?
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