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PHYSICS
0.1 हेनरी प्रेरकत्व तथा 30 ओम प्रतिरोध क...

0.1 हेनरी प्रेरकत्व तथा 30 ओम प्रतिरोध को `V = 10 sin 400t` वोल्ट के प्रत्यावर्ती स्त्रोत से श्रेणीक्रम में जोड़ा गया है | परिपथ में प्रेरण प्रतिघात, प्रतिबाधा, धारा का शिखर मान तथा वोल्टता एवं धारा के बीच कलान्तर ज्ञात कीजिये |

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The speed of a boat in still water is 6 km/h. Time taken by the boat to cover a certain distance upstream is 3 hours more than the time taken to cover the same distance downstream. If the speed of the stream is 2 km/h, then what is the total distance, upstream and downstream, covered by the boat? स्थिर जल में किसी नाव की चाल 6 किमी/घंटा है | धारा के विपरीत किसी निश्चित दूरी को तय करने में नाव को लगने वाला समय धारा के अनुकूल इसी दूरी को तय करने में लगने वाले समय से 3 घंटा अधिक है | यदि धारा की चाल 2 किमी/घंटा है, तो नाव के द्वारा धारा के विपरीत तथा धारा के अनुकूल तय की गयी कुल दूरी ज्ञात करें |

What x is added to each of 10,16, 22 and 32, the number so obtained in this order are in proportion? What is the mean proportional between the numbers (x+1) and (3x+1)? जब 10, 16, 22 तथा 32 में से प्रत्येक संख्या में x जोड़ा जाता है, तो इस क्रम में प्राप्त होने वाली संख्याएँ समानुपात में होती हैं | (x+1) तथा (3x+1) के बीच माध्य समानुपाती ज्ञात कीजिए |

प्राचीन भारत में शिक्षक को पिता से अधिक महान् बताया गया है। समाज में उसका स्थान सर्वोच्च था। श्वेताश्वतरोपनिषद् में गुरु को ईश्वर के पद पर रखकर उसे परम श्रद्धास्पद बताया गया है। शिक्षक अपने ज्ञान के प्रकाश से अज्ञानता रूपी अन्धकार को दूर भगाता था और समाज को एक नई शिक्षा देता था। आपस्तम्ब धर्मसूत्र में इसीलिए कहा गया है कि शिष्य को अपने गुरु को भगवान की भाँति मानना चाहिए। गुरु के प्रति श्रद्धा की भावना का प्रमाण एकलव्य की शिक्षा कथा से मिलता है। गुरु की सेवा से शिष्य को ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है। मत्स्य पुराण में भी उल्लेख मिलता है कि मनुष्य तपस्या, ब्रह्मचर्य, अग्नि और गुरु की सुश्रूषा से स्वर्ग को प्राप्त करता है। अत: आचार्य एवं माता-पिता आदि का अपमान नहीं करना चाहिए, क्योंकि आचार्य ब्रह्मा का, पिता प्रजापति का और माता पृथ्वी की स्वरूप है। एक अन्य स्थान पर यह कहा गया है कि आचार्य की यलपूर्वक पूजा करनी चाहिए, क्योंकि जहाँ आचार्य की पूजा नहीं होती, वहाँ सारी क्रियाएँ निष्फल हो जाती हैं। शिक्षक उच्च चरित्र वाला, अपने विषय में पारंगत, वाक्-चतुर, तार्किक, रोचक कथाओं का ज्ञाता एवं सदाचारी होता था। महाभारत में उल्लेख मिलता है कि शिक्षक को विनयी, विनम्र, निष्पक्ष, नैष्ठिक, ब्रह्मचारी, शान्त-चित्त, प्रखर बुद्धि वाला तथा व्याख्या करने में कुशल होना चाहिए। शिक्षक के लिए आचार्य, उपाध्याय, गुरु, अध्यापक आदि शब्द प्रयुक्त हुए हैं। वैसे तो यह समानार्थक प्रतीत होते हैं, परन्तु उनमें भिन्नता है। आचार्य उपनयन के पश्चात् अपने शिष्यों को आचार की भी शिक्षा देता था। याज्ञवल्क्य उपनयन के पश्चात् वेद पढ़ाने वाले को आचार्य मानते हैं। मनु के अनुसार, जो ब्राह्मण, शिष्य का यज्ञोपवीत करके उपनिषद् सहित सब वेद की शाखा को पढ़ाता है उसे आचार्य कहा जाता है। अपने शिष्यों से जो धन आदि लेकर परिवार का पालन-पोषण करता था उसे उपाध्याय की संज्ञा से सम्बोधित किया गया है। मनु ने उपाध्याय की परिभाषा बताते हुए कहा है कि जो वेद के एक देश अर्थात् मन्त्र एवं ब्राह्मण भाग को तथा वेद के अंग, व्याकरण आदि को जीविका के लिए पढ़ाता है, वह उपाध्याय कहा जाता है, जो गर्भाधान आदि संस्कारों को विधि-पूर्वक करता है और अन्नादि के द्वारा अपने परिवार को बढ़ाता है अर्थात् पालन करता है वह ब्राह्मण, गुरु कहा जाता है। वरण किया हुआ जो ब्राह्मण अग्न्याधेय, पाकयज्ञ और अग्निस्टोम आदि यज्ञों को जिसकी ओर से करता था, वह उसका ऋत्विक कहलाता था। निम्नलिखित में से कौन-सा कथन असत्य है?

प्राचीन भारत में शिक्षक को पिता से अधिक महान् बताया गया है। समाज में उसका स्थान सर्वोच्च था। श्वेताश्वतरोपनिषद् में गुरु को ईश्वर के पद पर रखकर उसे परम श्रद्धास्पद बताया गया है। शिक्षक अपने ज्ञान के प्रकाश से अज्ञानता रूपी अन्धकार को दूर भगाता था और समाज को एक नई शिक्षा देता था। आपस्तम्ब धर्मसूत्र में इसीलिए कहा गया है कि शिष्य को अपने गुरु को भगवान की भाँति मानना चाहिए। गुरु के प्रति श्रद्धा की भावना का प्रमाण एकलव्य की शिक्षा कथा से मिलता है। गुरु की सेवा से शिष्य को ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है। मत्स्य पुराण में भी उल्लेख मिलता है कि मनुष्य तपस्या, ब्रह्मचर्य, अग्नि और गुरु की सुश्रूषा से स्वर्ग को प्राप्त करता है। अत: आचार्य एवं माता-पिता आदि का अपमान नहीं करना चाहिए, क्योंकि आचार्य ब्रह्मा का, पिता प्रजापति का और माता पृथ्वी की स्वरूप है। एक अन्य स्थान पर यह कहा गया है कि आचार्य की यलपूर्वक पूजा करनी चाहिए, क्योंकि जहाँ आचार्य की पूजा नहीं होती, वहाँ सारी क्रियाएँ निष्फल हो जाती हैं। शिक्षक उच्च चरित्र वाला, अपने विषय में पारंगत, वाक्-चतुर, तार्किक, रोचक कथाओं का ज्ञाता एवं सदाचारी होता था। महाभारत में उल्लेख मिलता है कि शिक्षक को विनयी, विनम्र, निष्पक्ष, नैष्ठिक, ब्रह्मचारी, शान्त-चित्त, प्रखर बुद्धि वाला तथा व्याख्या करने में कुशल होना चाहिए। शिक्षक के लिए आचार्य, उपाध्याय, गुरु, अध्यापक आदि शब्द प्रयुक्त हुए हैं। वैसे तो यह समानार्थक प्रतीत होते हैं, परन्तु उनमें भिन्नता है। आचार्य उपनयन के पश्चात् अपने शिष्यों को आचार की भी शिक्षा देता था। याज्ञवल्क्य उपनयन के पश्चात् वेद पढ़ाने वाले को आचार्य मानते हैं। मनु के अनुसार, जो ब्राह्मण, शिष्य का यज्ञोपवीत करके उपनिषद् सहित सब वेद की शाखा को पढ़ाता है उसे आचार्य कहा जाता है। अपने शिष्यों से जो धन आदि लेकर परिवार का पालन-पोषण करता था उसे उपाध्याय की संज्ञा से सम्बोधित किया गया है। मनु ने उपाध्याय की परिभाषा बताते हुए कहा है कि जो वेद के एक देश अर्थात् मन्त्र एवं ब्राह्मण भाग को तथा वेद के अंग, व्याकरण आदि को जीविका के लिए पढ़ाता है, वह उपाध्याय कहा जाता है, जो गर्भाधान आदि संस्कारों को विधि-पूर्वक करता है और अन्नादि के द्वारा अपने परिवार को बढ़ाता है अर्थात् पालन करता है वह ब्राह्मण, गुरु कहा जाता है। वरण किया हुआ जो ब्राह्मण अग्न्याधेय, पाकयज्ञ और अग्निस्टोम आदि यज्ञों को जिसकी ओर से करता था, वह उसका ऋत्विक कहलाता था। प्रस्तुत गद्यांश में निम्नलिखित में से किस ऋषि का उल्लेख नहीं है?

प्राचीन भारत में शिक्षक को पिता से अधिक महान् बताया गया है। समाज में उसका स्थान सर्वोच्च था। श्वेताश्वतरोपनिषद् में गुरु को ईश्वर के पद पर रखकर उसे परम श्रद्धास्पद बताया गया है। शिक्षक अपने ज्ञान के प्रकाश से अज्ञानता रूपी अन्धकार को दूर भगाता था और समाज को एक नई शिक्षा देता था। आपस्तम्ब धर्मसूत्र में इसीलिए कहा गया है कि शिष्य को अपने गुरु को भगवान की भाँति मानना चाहिए। गुरु के प्रति श्रद्धा की भावना का प्रमाण एकलव्य की शिक्षा कथा से मिलता है। गुरु की सेवा से शिष्य को ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है। मत्स्य पुराण में भी उल्लेख मिलता है कि मनुष्य तपस्या, ब्रह्मचर्य, अग्नि और गुरु की सुश्रूषा से स्वर्ग को प्राप्त करता है। अत: आचार्य एवं माता-पिता आदि का अपमान नहीं करना चाहिए, क्योंकि आचार्य ब्रह्मा का, पिता प्रजापति का और माता पृथ्वी की स्वरूप है। एक अन्य स्थान पर यह कहा गया है कि आचार्य की यलपूर्वक पूजा करनी चाहिए, क्योंकि जहाँ आचार्य की पूजा नहीं होती, वहाँ सारी क्रियाएँ निष्फल हो जाती हैं। शिक्षक उच्च चरित्र वाला, अपने विषय में पारंगत, वाक्-चतुर, तार्किक, रोचक कथाओं का ज्ञाता एवं सदाचारी होता था। महाभारत में उल्लेख मिलता है कि शिक्षक को विनयी, विनम्र, निष्पक्ष, नैष्ठिक, ब्रह्मचारी, शान्त-चित्त, प्रखर बुद्धि वाला तथा व्याख्या करने में कुशल होना चाहिए। शिक्षक के लिए आचार्य, उपाध्याय, गुरु, अध्यापक आदि शब्द प्रयुक्त हुए हैं। वैसे तो यह समानार्थक प्रतीत होते हैं, परन्तु उनमें भिन्नता है। आचार्य उपनयन के पश्चात् अपने शिष्यों को आचार की भी शिक्षा देता था। याज्ञवल्क्य उपनयन के पश्चात् वेद पढ़ाने वाले को आचार्य मानते हैं। मनु के अनुसार, जो ब्राह्मण, शिष्य का यज्ञोपवीत करके उपनिषद् सहित सब वेद की शाखा को पढ़ाता है उसे आचार्य कहा जाता है। अपने शिष्यों से जो धन आदि लेकर परिवार का पालन-पोषण करता था उसे उपाध्याय की संज्ञा से सम्बोधित किया गया है। मनु ने उपाध्याय की परिभाषा बताते हुए कहा है कि जो वेद के एक देश अर्थात् मन्त्र एवं ब्राह्मण भाग को तथा वेद के अंग, व्याकरण आदि को जीविका के लिए पढ़ाता है, वह उपाध्याय कहा जाता है, जो गर्भाधान आदि संस्कारों को विधि-पूर्वक करता है और अन्नादि के द्वारा अपने परिवार को बढ़ाता है अर्थात् पालन करता है वह ब्राह्मण, गुरु कहा जाता है। वरण किया हुआ जो ब्राह्मण अग्न्याधेय, पाकयज्ञ और अग्निस्टोम आदि यज्ञों को जिसकी ओर से करता था, वह उसका ऋत्विक कहलाता था। प्रस्तुत गद्यांश में निम्नलिखित में किस ग्रन्थ का उल्लेख नहीं है?

प्राचीन भारत में शिक्षक को पिता से अधिक महान् बताया गया है। समाज में उसका स्थान सर्वोच्च था। श्वेताश्वतरोपनिषद् में गुरु को ईश्वर के पद पर रखकर उसे परम श्रद्धास्पद बताया गया है। शिक्षक अपने ज्ञान के प्रकाश से अज्ञानता रूपी अन्धकार को दूर भगाता था और समाज को एक नई शिक्षा देता था। आपस्तम्ब धर्मसूत्र में इसीलिए कहा गया है कि शिष्य को अपने गुरु को भगवान की भाँति मानना चाहिए। गुरु के प्रति श्रद्धा की भावना का प्रमाण एकलव्य की शिक्षा कथा से मिलता है। गुरु की सेवा से शिष्य को ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है। मत्स्य पुराण में भी उल्लेख मिलता है कि मनुष्य तपस्या, ब्रह्मचर्य, अग्नि और गुरु की सुश्रूषा से स्वर्ग को प्राप्त करता है। अत: आचार्य एवं माता-पिता आदि का अपमान नहीं करना चाहिए, क्योंकि आचार्य ब्रह्मा का, पिता प्रजापति का और माता पृथ्वी की स्वरूप है। एक अन्य स्थान पर यह कहा गया है कि आचार्य की यलपूर्वक पूजा करनी चाहिए, क्योंकि जहाँ आचार्य की पूजा नहीं होती, वहाँ सारी क्रियाएँ निष्फल हो जाती हैं। शिक्षक उच्च चरित्र वाला, अपने विषय में पारंगत, वाक्-चतुर, तार्किक, रोचक कथाओं का ज्ञाता एवं सदाचारी होता था। महाभारत में उल्लेख मिलता है कि शिक्षक को विनयी, विनम्र, निष्पक्ष, नैष्ठिक, ब्रह्मचारी, शान्त-चित्त, प्रखर बुद्धि वाला तथा व्याख्या करने में कुशल होना चाहिए। शिक्षक के लिए आचार्य, उपाध्याय, गुरु, अध्यापक आदि शब्द प्रयुक्त हुए हैं। वैसे तो यह समानार्थक प्रतीत होते हैं, परन्तु उनमें भिन्नता है। आचार्य उपनयन के पश्चात् अपने शिष्यों को आचार की भी शिक्षा देता था। याज्ञवल्क्य उपनयन के पश्चात् वेद पढ़ाने वाले को आचार्य मानते हैं। मनु के अनुसार, जो ब्राह्मण, शिष्य का यज्ञोपवीत करके उपनिषद् सहित सब वेद की शाखा को पढ़ाता है उसे आचार्य कहा जाता है। अपने शिष्यों से जो धन आदि लेकर परिवार का पालन-पोषण करता था उसे उपाध्याय की संज्ञा से सम्बोधित किया गया है। मनु ने उपाध्याय की परिभाषा बताते हुए कहा है कि जो वेद के एक देश अर्थात् मन्त्र एवं ब्राह्मण भाग को तथा वेद के अंग, व्याकरण आदि को जीविका के लिए पढ़ाता है, वह उपाध्याय कहा जाता है, जो गर्भाधान आदि संस्कारों को विधि-पूर्वक करता है और अन्नादि के द्वारा अपने परिवार को बढ़ाता है अर्थात् पालन करता है वह ब्राह्मण, गुरु कहा जाता है। वरण किया हुआ जो ब्राह्मण अग्न्याधेय, पाकयज्ञ और अग्निस्टोम आदि यज्ञों को जिसकी ओर से करता था, वह उसका ऋत्विक कहलाता था। प्राचीन भारत में शिक्षक को किसके समतुल्य समझा जाता था?

प्राचीन भारत में शिक्षक को पिता से अधिक महान् बताया गया है। समाज में उसका स्थान सर्वोच्च था। श्वेताश्वतरोपनिषद् में गुरु को ईश्वर के पद पर रखकर उसे परम श्रद्धास्पद बताया गया है। शिक्षक अपने ज्ञान के प्रकाश से अज्ञानता रूपी अन्धकार को दूर भगाता था और समाज को एक नई शिक्षा देता था। आपस्तम्ब धर्मसूत्र में इसीलिए कहा गया है कि शिष्य को अपने गुरु को भगवान की भाँति मानना चाहिए। गुरु के प्रति श्रद्धा की भावना का प्रमाण एकलव्य की शिक्षा कथा से मिलता है। गुरु की सेवा से शिष्य को ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है। मत्स्य पुराण में भी उल्लेख मिलता है कि मनुष्य तपस्या, ब्रह्मचर्य, अग्नि और गुरु की सुश्रूषा से स्वर्ग को प्राप्त करता है। अत: आचार्य एवं माता-पिता आदि का अपमान नहीं करना चाहिए, क्योंकि आचार्य ब्रह्मा का, पिता प्रजापति का और माता पृथ्वी की स्वरूप है। एक अन्य स्थान पर यह कहा गया है कि आचार्य की यलपूर्वक पूजा करनी चाहिए, क्योंकि जहाँ आचार्य की पूजा नहीं होती, वहाँ सारी क्रियाएँ निष्फल हो जाती हैं। शिक्षक उच्च चरित्र वाला, अपने विषय में पारंगत, वाक्-चतुर, तार्किक, रोचक कथाओं का ज्ञाता एवं सदाचारी होता था। महाभारत में उल्लेख मिलता है कि शिक्षक को विनयी, विनम्र, निष्पक्ष, नैष्ठिक, ब्रह्मचारी, शान्त-चित्त, प्रखर बुद्धि वाला तथा व्याख्या करने में कुशल होना चाहिए। शिक्षक के लिए आचार्य, उपाध्याय, गुरु, अध्यापक आदि शब्द प्रयुक्त हुए हैं। वैसे तो यह समानार्थक प्रतीत होते हैं, परन्तु उनमें भिन्नता है। आचार्य उपनयन के पश्चात् अपने शिष्यों को आचार की भी शिक्षा देता था। याज्ञवल्क्य उपनयन के पश्चात् वेद पढ़ाने वाले को आचार्य मानते हैं। मनु के अनुसार, जो ब्राह्मण, शिष्य का यज्ञोपवीत करके उपनिषद् सहित सब वेद की शाखा को पढ़ाता है उसे आचार्य कहा जाता है। अपने शिष्यों से जो धन आदि लेकर परिवार का पालन-पोषण करता था उसे उपाध्याय की संज्ञा से सम्बोधित किया गया है। मनु ने उपाध्याय की परिभाषा बताते हुए कहा है कि जो वेद के एक देश अर्थात् मन्त्र एवं ब्राह्मण भाग को तथा वेद के अंग, व्याकरण आदि को जीविका के लिए पढ़ाता है, वह उपाध्याय कहा जाता है, जो गर्भाधान आदि संस्कारों को विधि-पूर्वक करता है और अन्नादि के द्वारा अपने परिवार को बढ़ाता है अर्थात् पालन करता है वह ब्राह्मण, गुरु कहा जाता है। वरण किया हुआ जो ब्राह्मण अग्न्याधेय, पाकयज्ञ और अग्निस्टोम आदि यज्ञों को जिसकी ओर से करता था, वह उसका ऋत्विक कहलाता था। ग्रन्थ में यह कहा गया है कि गुरु की सेवा से स्वर्ग की प्राप्ति होती है?

प्राचीन भारत में शिक्षक को पिता से अधिक महान् बताया गया है। समाज में उसका स्थान सर्वोच्च था। श्वेताश्वतरोपनिषद् में गुरु को ईश्वर के पद पर रखकर उसे परम श्रद्धास्पद बताया गया है। शिक्षक अपने ज्ञान के प्रकाश से अज्ञानता रूपी अन्धकार को दूर भगाता था और समाज को एक नई शिक्षा देता था। आपस्तम्ब धर्मसूत्र में इसीलिए कहा गया है कि शिष्य को अपने गुरु को भगवान की भाँति मानना चाहिए। गुरु के प्रति श्रद्धा की भावना का प्रमाण एकलव्य की शिक्षा कथा से मिलता है। गुरु की सेवा से शिष्य को ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है। मत्स्य पुराण में भी उल्लेख मिलता है कि मनुष्य तपस्या, ब्रह्मचर्य, अग्नि और गुरु की सुश्रूषा से स्वर्ग को प्राप्त करता है। अत: आचार्य एवं माता-पिता आदि का अपमान नहीं करना चाहिए, क्योंकि आचार्य ब्रह्मा का, पिता प्रजापति का और माता पृथ्वी की स्वरूप है। एक अन्य स्थान पर यह कहा गया है कि आचार्य की यलपूर्वक पूजा करनी चाहिए, क्योंकि जहाँ आचार्य की पूजा नहीं होती, वहाँ सारी क्रियाएँ निष्फल हो जाती हैं। शिक्षक उच्च चरित्र वाला, अपने विषय में पारंगत, वाक्-चतुर, तार्किक, रोचक कथाओं का ज्ञाता एवं सदाचारी होता था। महाभारत में उल्लेख मिलता है कि शिक्षक को विनयी, विनम्र, निष्पक्ष, नैष्ठिक, ब्रह्मचारी, शान्त-चित्त, प्रखर बुद्धि वाला तथा व्याख्या करने में कुशल होना चाहिए। शिक्षक के लिए आचार्य, उपाध्याय, गुरु, अध्यापक आदि शब्द प्रयुक्त हुए हैं। वैसे तो यह समानार्थक प्रतीत होते हैं, परन्तु उनमें भिन्नता है। आचार्य उपनयन के पश्चात् अपने शिष्यों को आचार की भी शिक्षा देता था। याज्ञवल्क्य उपनयन के पश्चात् वेद पढ़ाने वाले को आचार्य मानते हैं। मनु के अनुसार, जो ब्राह्मण, शिष्य का यज्ञोपवीत करके उपनिषद् सहित सब वेद की शाखा को पढ़ाता है उसे आचार्य कहा जाता है। अपने शिष्यों से जो धन आदि लेकर परिवार का पालन-पोषण करता था उसे उपाध्याय की संज्ञा से सम्बोधित किया गया है। मनु ने उपाध्याय की परिभाषा बताते हुए कहा है कि जो वेद के एक देश अर्थात् मन्त्र एवं ब्राह्मण भाग को तथा वेद के अंग, व्याकरण आदि को जीविका के लिए पढ़ाता है, वह उपाध्याय कहा जाता है, जो गर्भाधान आदि संस्कारों को विधि-पूर्वक करता है और अन्नादि के द्वारा अपने परिवार को बढ़ाता है अर्थात् पालन करता है वह ब्राह्मण, गुरु कहा जाता है। वरण किया हुआ जो ब्राह्मण अग्न्याधेय, पाकयज्ञ और अग्निस्टोम आदि यज्ञों को जिसकी ओर से करता था, वह उसका ऋत्विक कहलाता था। निम्नलिखित में से कौन-सा गुण शिक्षक में होना चाहिए?

प्राचीन भारत में शिक्षक को पिता से अधिक महान् बताया गया है। समाज में उसका स्थान सर्वोच्च था। श्वेताश्वतरोपनिषद् में गुरु को ईश्वर के पद पर रखकर उसे परम श्रद्धास्पद बताया गया है। शिक्षक अपने ज्ञान के प्रकाश से अज्ञानता रूपी अन्धकार को दूर भगाता था और समाज को एक नई शिक्षा देता था। आपस्तम्ब धर्मसूत्र में इसीलिए कहा गया है कि शिष्य को अपने गुरु को भगवान की भाँति मानना चाहिए। गुरु के प्रति श्रद्धा की भावना का प्रमाण एकलव्य की शिक्षा कथा से मिलता है। गुरु की सेवा से शिष्य को ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है। मत्स्य पुराण में भी उल्लेख मिलता है कि मनुष्य तपस्या, ब्रह्मचर्य, अग्नि और गुरु की सुश्रूषा से स्वर्ग को प्राप्त करता है। अत: आचार्य एवं माता-पिता आदि का अपमान नहीं करना चाहिए, क्योंकि आचार्य ब्रह्मा का, पिता प्रजापति का और माता पृथ्वी की स्वरूप है। एक अन्य स्थान पर यह कहा गया है कि आचार्य की यलपूर्वक पूजा करनी चाहिए, क्योंकि जहाँ आचार्य की पूजा नहीं होती, वहाँ सारी क्रियाएँ निष्फल हो जाती हैं। शिक्षक उच्च चरित्र वाला, अपने विषय में पारंगत, वाक्-चतुर, तार्किक, रोचक कथाओं का ज्ञाता एवं सदाचारी होता था। महाभारत में उल्लेख मिलता है कि शिक्षक को विनयी, विनम्र, निष्पक्ष, नैष्ठिक, ब्रह्मचारी, शान्त-चित्त, प्रखर बुद्धि वाला तथा व्याख्या करने में कुशल होना चाहिए। शिक्षक के लिए आचार्य, उपाध्याय, गुरु, अध्यापक आदि शब्द प्रयुक्त हुए हैं। वैसे तो यह समानार्थक प्रतीत होते हैं, परन्तु उनमें भिन्नता है। आचार्य उपनयन के पश्चात् अपने शिष्यों को आचार की भी शिक्षा देता था। याज्ञवल्क्य उपनयन के पश्चात् वेद पढ़ाने वाले को आचार्य मानते हैं। मनु के अनुसार, जो ब्राह्मण, शिष्य का यज्ञोपवीत करके उपनिषद् सहित सब वेद की शाखा को पढ़ाता है उसे आचार्य कहा जाता है। अपने शिष्यों से जो धन आदि लेकर परिवार का पालन-पोषण करता था उसे उपाध्याय की संज्ञा से सम्बोधित किया गया है। मनु ने उपाध्याय की परिभाषा बताते हुए कहा है कि जो वेद के एक देश अर्थात् मन्त्र एवं ब्राह्मण भाग को तथा वेद के अंग, व्याकरण आदि को जीविका के लिए पढ़ाता है, वह उपाध्याय कहा जाता है, जो गर्भाधान आदि संस्कारों को विधि-पूर्वक करता है और अन्नादि के द्वारा अपने परिवार को बढ़ाता है अर्थात् पालन करता है वह ब्राह्मण, गुरु कहा जाता है। वरण किया हुआ जो ब्राह्मण अग्न्याधेय, पाकयज्ञ और अग्निस्टोम आदि यज्ञों को जिसकी ओर से करता था, वह उसका ऋत्विक कहलाता था। निम्नलिखित में से कौन-सा शिक्षक का समानार्थी नहीं है?

प्राचीन भारत में शिक्षक को पिता से अधिक महान् बताया गया है। समाज में उसका स्थान सर्वोच्च था। श्वेताश्वतरोपनिषद् में गुरु को ईश्वर के पद पर रखकर उसे परम श्रद्धास्पद बताया गया है। शिक्षक अपने ज्ञान के प्रकाश से अज्ञानता रूपी अन्धकार को दूर भगाता था और समाज को एक नई शिक्षा देता था। आपस्तम्ब धर्मसूत्र में इसीलिए कहा गया है कि शिष्य को अपने गुरु को भगवान की भाँति मानना चाहिए। गुरु के प्रति श्रद्धा की भावना का प्रमाण एकलव्य की शिक्षा कथा से मिलता है। गुरु की सेवा से शिष्य को ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है। मत्स्य पुराण में भी उल्लेख मिलता है कि मनुष्य तपस्या, ब्रह्मचर्य, अग्नि और गुरु की सुश्रूषा से स्वर्ग को प्राप्त करता है। अत: आचार्य एवं माता-पिता आदि का अपमान नहीं करना चाहिए, क्योंकि आचार्य ब्रह्मा का, पिता प्रजापति का और माता पृथ्वी की स्वरूप है। एक अन्य स्थान पर यह कहा गया है कि आचार्य की यलपूर्वक पूजा करनी चाहिए, क्योंकि जहाँ आचार्य की पूजा नहीं होती, वहाँ सारी क्रियाएँ निष्फल हो जाती हैं। शिक्षक उच्च चरित्र वाला, अपने विषय में पारंगत, वाक्-चतुर, तार्किक, रोचक कथाओं का ज्ञाता एवं सदाचारी होता था। महाभारत में उल्लेख मिलता है कि शिक्षक को विनयी, विनम्र, निष्पक्ष, नैष्ठिक, ब्रह्मचारी, शान्त-चित्त, प्रखर बुद्धि वाला तथा व्याख्या करने में कुशल होना चाहिए। शिक्षक के लिए आचार्य, उपाध्याय, गुरु, अध्यापक आदि शब्द प्रयुक्त हुए हैं। वैसे तो यह समानार्थक प्रतीत होते हैं, परन्तु उनमें भिन्नता है। आचार्य उपनयन के पश्चात् अपने शिष्यों को आचार की भी शिक्षा देता था। याज्ञवल्क्य उपनयन के पश्चात् वेद पढ़ाने वाले को आचार्य मानते हैं। मनु के अनुसार, जो ब्राह्मण, शिष्य का यज्ञोपवीत करके उपनिषद् सहित सब वेद की शाखा को पढ़ाता है उसे आचार्य कहा जाता है। अपने शिष्यों से जो धन आदि लेकर परिवार का पालन-पोषण करता था उसे उपाध्याय की संज्ञा से सम्बोधित किया गया है। मनु ने उपाध्याय की परिभाषा बताते हुए कहा है कि जो वेद के एक देश अर्थात् मन्त्र एवं ब्राह्मण भाग को तथा वेद के अंग, व्याकरण आदि को जीविका के लिए पढ़ाता है, वह उपाध्याय कहा जाता है, जो गर्भाधान आदि संस्कारों को विधि-पूर्वक करता है और अन्नादि के द्वारा अपने परिवार को बढ़ाता है अर्थात् पालन करता है वह ब्राह्मण, गुरु कहा जाता है। वरण किया हुआ जो ब्राह्मण अग्न्याधेय, पाकयज्ञ और अग्निस्टोम आदि यज्ञों को जिसकी ओर से करता था, वह उसका ऋत्विक कहलाता था। जिसका मन शान्त हो, उसे कहा जाता है

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