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दूर्वा - नृत्यांगना सुधा चंद्रन | जीवनी ...

दूर्वा - नृत्यांगना सुधा चंद्रन | जीवनी | नृत्यांगना सुधा चंद्रन की जीवनी

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दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 5 रवि जग में शोभा सरसाता सोम सुधा बरसाता। सब है लगे कर्म में कोई निष्क्रिय दृष्टि न आता। है उद्देश्य नितान्त तुच्छ तृण के भी लघु जीवन का। उसी पूर्ति में वह करता है अन्त कर्ममय तन का।। तुम मनुष्य हो, अमित बुद्धि-बल विलसित जन्म तुम्हारा। क्या उद्देश्य रहित हो जग में, तुमने कभी विचारा? बुरा न मानों एक बार सोचो तुम अपने मन में क्या कर्तव्य समाप्त कर लिया तुमने निज जीवन में? जिस पर गिरकर उदर-दरी से तुमने जन्म लिया है, जिसका खाकर अन्न सुधासम नीर, समीर पिया है वही स्नेह की मूर्ति दयामय माता तुल्य मही है उसके प्रति कर्तव्य तुम्हारा क्या कुछ शेष नहीं है? 'है उद्देश्य नितान्त तुच्छ तृण के भी लघु जीवन का' पंक्ति का आशय है

दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 5 रवि जग में शोभा सरसाता सोम सुधा बरसाता। सब है लगे कर्म में कोई निष्क्रिय दृष्टि न आता। है उद्देश्य नितान्त तुच्छ तृण के भी लघु जीवन का। उसी पूर्ति में वह करता है अन्त कर्ममय तन का।। तुम मनुष्य हो, अमित बुद्धि-बल विलसित जन्म तुम्हारा। क्या उद्देश्य रहित हो जग में, तुमने कभी विचारा? बुरा न मानों एक बार सोचो तुम अपने मन में क्या कर्तव्य समाप्त कर लिया तुमने निज जीवन में? जिस पर गिरकर उदर-दरी से तुमने जन्म लिया है, जिसका खाकर अन्न सुधासम नीर, समीर पिया है वही स्नेह की मूर्ति दयामय माता तुल्य मही है उसके प्रति कर्तव्य तुम्हारा क्या कुछ शेष नहीं है? यह कविता क्या प्रेरणा देती है?