Home
Class 10
HINDI
क्षितिज - स्त्री -शिक्षा के विरोधी कुतर्...

क्षितिज - स्त्री -शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन | लेख | स्त्री -शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन भाग -3

Promotional Banner

Similar Questions

Explore conceptually related problems

क्षितिज - स्त्री -शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन | लेख | स्त्री -शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन भाग -1

क्षितिज - स्त्री -शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन | लेख | स्त्री -शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन भाग -2

स्पर्श - शुक्रतारे के सामान | लेख | शुक्रतारे के सामान भाग -3

शिक्षा मनुष्य को मस्तिष्क और शरीर का उचित तालमेल करना सिखाती है। वह शिक्षा जो मानव को पाठ्य-पुस्तकों के ज्ञान के अतिरिक्त कुछ गंभीर चिंतन न दे। यदि हमारी शिक्षा सुसंस्कृत, सभ्य, सध्चरित्र एवं अच्छे नागरिक नहीं बना सकती तो उससे क्या लाभ? सहृदय, सच्चा परंतु अनपढ़ मज़दूर उस स्नातक से कहीं अच्छा है जो निर्दय और चरित्रहीन है। संसार के सभी वैभव और सुख-साधन भी मनुष्य को तब तक सुखी नहीं बना सकते जब तक कि मनुष्य को आत्मिक ज्ञान न हो। हमारे कुछ अधिकार और कर्तव्य भी हैं। शिक्षित व्यक्ति को कर्तव्यों का उतना ही ध्यान रखना चाहिए जितना कि अधिकारों का 'सुख-साधन' का विग्रह और समास है

स्पर्श - वैझानिक चेतना के वाहक :चंद्रशेखर वेंकट रमन | लेख | वैझानिक चेतना के वाहक :चंद्रशेखर वेंकट रमन भाग -3

शिक्षा मनुष्य को मस्तिष्क और शरीर का उचित तालमेल करना सिखाती है। वह शिक्षा जो मानव को पाठ्य-पुस्तकों के ज्ञान के अतिरिक्त कुछ गंभीर चिंतन न दे। यदि हमारी शिक्षा सुसंस्कृत, सभ्य, सध्चरित्र एवं अच्छे नागरिक नहीं बना सकती तो उससे क्या लाभ? सहृदय, सच्चा परंतु अनपढ़ मज़दूर उस स्नातक से कहीं अच्छा है जो निर्दय और चरित्रहीन है। संसार के सभी वैभव और सुख-साधन भी मनुष्य को तब तक सुखी नहीं बना सकते जब तक कि मनुष्य को आत्मिक ज्ञान न हो। हमारे कुछ अधिकार और कर्तव्य भी हैं। शिक्षित व्यक्ति को कर्तव्यों का उतना ही ध्यान रखना चाहिए जितना कि अधिकारों का अच्छी शिक्षा की विशेषता नहीं है

मातृभाषा/क्षेत्रीय भाषा का प्रयोग शिक्षा के सभी उच्च स्तरों तक जारी रहना चाहिए, क्योंकि

आधुनिक शिक्षण संस्थाएँ ही नहीं, बल्कि परिवार एवं समाज के अन्य सदस्य। भी अपने कार्य एवं व्यवहार से मनुष्य के शिक्षण में सहायक होते हैं। किसी भी क्षेत्र विशेष के लोगों पर उसके क्षेत्र का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। यह प्रभाव भाषा ही नहीं व्यवहार में भी दिखाई पड़ता है। इस तरह की शिक्षा को अनौपचारिक शिक्षण के अन्तर्गत रखा जाता है। इस तरह सामान्य रूप से शिक्षा की दो प्रणालियाँ होती हैं-औपचारिक शिक्षा एवं अनौपचारिक शिक्षा। मुक्त विद्यालय एवं विश्वविद्यालय अनौपचारिक शिक्षा के ही उदाहरण हैं। इनके अलावा परिवार के सदस्य भी बालकों की शिक्षा में प्रत्यक्ष रूप से अपनी जिम्मेदारियों को निभाते हैं। समुदाय के अन्य सदस्यों की भी इसमें सहभागिता होती है। बालक अपनी परम्परा एवं अपने रीतिरिवाजों को समाज के अन्य सदस्यों द्वारा ही सीखता है। बालकों पर उसके परिवेश उसके साथियों का भी प्रभाव पड़ता है। गलत संगति में बालकों में गलत आदतों का विकास अथवा आपराधिक प्रवृत्तियों में लिप्त हो जाना इसका उदाहरण है। औपचारिक शिक्षा में शिक्षण का स्थान सुनिश्चित होता है, जबकि अनौपचारिक में ऐसा नहीं। होता। औपचारिक शिक्षा में प्रवेश के लिए आयु-सीमा निर्धारित होती है, जबकि अनौपचारिक शिक्षा में ऐसी कोई बाध्यता नहीं होती है। अनौपचारिक शिक्षा के द्वारा शिक्षा से वंचित समाज के पिछड़े लोगों एवं प्रौढ़ों को शिक्षित करने में सहायता मिलती है। अनौपचारिक शिक्षा में औपचारिक शिक्षा जैसे कठोर नियम नहीं होते ये अत्यधिक लचीले होते हैं। अनौपचारिक शिक्षा के जरिए औपचारिक शिक्षा से वंचित समाज के पिछड़े लोगों को शिक्षित करने में सहायता मिलती है। प्रौढ़ शिक्षा एवं स्त्री शिक्षा इसी का उदाहरण है। औपचारिक शिक्षा समाजीय व्यवस्था की एक उपव्यवस्था के रूप में कार्य करती है। इस पर परिवार, संस्कृति, राज्य, धर्म, अर्थव्यवस्था एवं समाज के स्पष्ट प्रभाव होता है, क्योंकि यह इन सभी से प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से सम्बन्धित होता है। सिर्फ शिक्षा पर ही समाज का प्रभाव नहीं होता, बल्कि शिक्षा भी समाज को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है। शिक्षा के परिणामस्वरूप ही भारत में स्त्रियों की स्थिति में सुधार हुआ है। शहरीकरण, सामाजिक स्थितियों में बदलाव, संयुक्त परिवारों का एकल परिवारों के रूप में विभाजन ये सभी शिक्षा का समाज पर प्रभाव स्पष्ट करते हैं। मानव किसकी सहायता से शिक्षा प्राप्त करता है?

आधुनिक शिक्षण संस्थाएँ ही नहीं, बल्कि परिवार एवं समाज के अन्य सदस्य। भी अपने कार्य एवं व्यवहार से मनुष्य के शिक्षण में सहायक होते हैं। किसी भी क्षेत्र विशेष के लोगों पर उसके क्षेत्र का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। यह प्रभाव भाषा ही नहीं व्यवहार में भी दिखाई पड़ता है। इस तरह की शिक्षा को अनौपचारिक शिक्षण के अन्तर्गत रखा जाता है। इस तरह सामान्य रूप से शिक्षा की दो प्रणालियाँ होती हैं-औपचारिक शिक्षा एवं अनौपचारिक शिक्षा। मुक्त विद्यालय एवं विश्वविद्यालय अनौपचारिक शिक्षा के ही उदाहरण हैं। इनके अलावा परिवार के सदस्य भी बालकों की शिक्षा में प्रत्यक्ष रूप से अपनी जिम्मेदारियों को निभाते हैं। समुदाय के अन्य सदस्यों की भी इसमें सहभागिता होती है। बालक अपनी परम्परा एवं अपने रीतिरिवाजों को समाज के अन्य सदस्यों द्वारा ही सीखता है। बालकों पर उसके परिवेश उसके साथियों का भी प्रभाव पड़ता है। गलत संगति में बालकों में गलत आदतों का विकास अथवा आपराधिक प्रवृत्तियों में लिप्त हो जाना इसका उदाहरण है। औपचारिक शिक्षा में शिक्षण का स्थान सुनिश्चित होता है, जबकि अनौपचारिक में ऐसा नहीं। होता। औपचारिक शिक्षा में प्रवेश के लिए आयु-सीमा निर्धारित होती है, जबकि अनौपचारिक शिक्षा में ऐसी कोई बाध्यता नहीं होती है। अनौपचारिक शिक्षा के द्वारा शिक्षा से वंचित समाज के पिछड़े लोगों एवं प्रौढ़ों को शिक्षित करने में सहायता मिलती है। अनौपचारिक शिक्षा में औपचारिक शिक्षा जैसे कठोर नियम नहीं होते ये अत्यधिक लचीले होते हैं। अनौपचारिक शिक्षा के जरिए औपचारिक शिक्षा से वंचित समाज के पिछड़े लोगों को शिक्षित करने में सहायता मिलती है। प्रौढ़ शिक्षा एवं स्त्री शिक्षा इसी का उदाहरण है। औपचारिक शिक्षा समाजीय व्यवस्था की एक उपव्यवस्था के रूप में कार्य करती है। इस पर परिवार, संस्कृति, राज्य, धर्म, अर्थव्यवस्था एवं समाज के स्पष्ट प्रभाव होता है, क्योंकि यह इन सभी से प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से सम्बन्धित होता है। सिर्फ शिक्षा पर ही समाज का प्रभाव नहीं होता, बल्कि शिक्षा भी समाज को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है। शिक्षा के परिणामस्वरूप ही भारत में स्त्रियों की स्थिति में सुधार हुआ है। शहरीकरण, सामाजिक स्थितियों में बदलाव, संयुक्त परिवारों का एकल परिवारों के रूप में विभाजन ये सभी शिक्षा का समाज पर प्रभाव स्पष्ट करते हैं। व्यक्ति की भाषा एवं व्यवहार में उसके क्षेत्र विशेष का प्रभाव स्पष्ट दिखाई पड़ता है, इसे निम्नलिखित में से किसके अन्तर्गत रखा जा सकता है?