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Class 12
PHYSICS
विभवमापी के प्रयोग में शून्य विक्षेप की ...

विभवमापी के प्रयोग में शून्य विक्षेप की स्थिति में क्या परिवर्तन होगा यदि
मुख्य परिपथ में संचायक सेल का वि. वा. बल नापे जाने वाली सेल के वि. वा. बल से कम हो जाये।

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कोमल किसलय के अंचल में नन्ही कलिका ज्यों छिपती-सी, गोधूलि के धूमिल पट में दीपक के स्वर में दिपती-सी। मंजुल स्वप्नों की विस्मृति में मन का उन्माद निखरता ज्यों सुरभित लहरों की छाया में बुल्ले का विभव बिखरता ज्यों वैसी ही माया में लिपटी अधरों पर उँगली घरे हुए, माधव के सरस कुतूहल का आँखों में पानी भरे हुए। नीरव निशीथ में लतिका-सी तुम कौन आ रही हो बढ़ती? कोमल बाँहे फैलाये-सी आलिंगन का जादू पढ़ती? किन इंद्रजाल के फूलों से लेकर सुहाग-कण-राग-भरे, सिर नीचा कर हो गूंथ माला जिससे मधु धार ढरे? पुलकित कदंब की माला-सी पहना देती हो अंतर में, झुक जाती है मन की डाली अपनी फल भरता के डर में। वरदान सदृश हो डाल रही नीली किरणों से बुना हुआ, यह अंचल कितना हलका-सा कितना सौरभ से सना हुआ। सब अंग मोम से बनते हैं कोमलता में बल खाती हूँ. मैं सिमिट रही-सी अपने में परिहास-गीत सुन पाती हूँ। स्मित बन जाती है तरल हँसी नयनों में भरकर बाँकपना, प्रत्यक्ष देखती हूँ सब जो वह बनता जाता है सपना। 'गोधूलि के धूमिल पट में दीपक के स्वर में दिपती-सी' इन पंक्तियों के माध्यम से किस समय का बोध हो रहा है?

कोमल किसलय के अंचल में नन्ही कलिका ज्यों छिपती-सी, गोधूलि के धूमिल पट में दीपक के स्वर में दिपती-सी। मंजुल स्वप्नों की विस्मृति में मन का उन्माद निखरता ज्यों सुरभित लहरों की छाया में बुल्ले का विभव बिखरता ज्यों वैसी ही माया में लिपटी अधरों पर उँगली घरे हुए, माधव के सरस कुतूहल का आँखों में पानी भरे हुए। नीरव निशीथ में लतिका-सी तुम कौन आ रही हो बढ़ती? कोमल बाँहे फैलाये-सी आलिंगन का जादू पढ़ती? किन इंद्रजाल के फूलों से लेकर सुहाग-कण-राग-भरे, सिर नीचा कर हो गूंथ माला जिससे मधु धार ढरे? पुलकित कदंब की माला-सी पहना देती हो अंतर में, झुक जाती है मन की डाली अपनी फल भरता के डर में। वरदान सदृश हो डाल रही नीली किरणों से बुना हुआ, यह अंचल कितना हलका-सा कितना सौरभ से सना हुआ। सब अंग मोम से बनते हैं कोमलता में बल खाती हूँ. मैं सिमिट रही-सी अपने में परिहास-गीत सुन पाती हूँ। स्मित बन जाती है तरल हँसी नयनों में भरकर बाँकपना, प्रत्यक्ष देखती हूँ सब जो वह बनता जाता है सपना। 'पुलकित कदम्ब की माला-सी पहना देती हो अंतर में' इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है

कोमल किसलय के अंचल में नन्ही कलिका ज्यों छिपती-सी, गोधूलि के धूमिल पट में दीपक के स्वर में दिपती-सी। मंजुल स्वप्नों की विस्मृति में मन का उन्माद निखरता ज्यों सुरभित लहरों की छाया में बुल्ले का विभव बिखरता ज्यों वैसी ही माया में लिपटी अधरों पर उँगली घरे हुए, माधव के सरस कुतूहल का आँखों में पानी भरे हुए। नीरव निशीथ में लतिका-सी तुम कौन आ रही हो बढ़ती? कोमल बाँहे फैलाये-सी आलिंगन का जादू पढ़ती? किन इंद्रजाल के फूलों से लेकर सुहाग-कण-राग-भरे, सिर नीचा कर हो गूंथ माला जिससे मधु धार ढरे? पुलकित कदंब की माला-सी पहना देती हो अंतर में, झुक जाती है मन की डाली अपनी फल भरता के डर में। वरदान सदृश हो डाल रही नीली किरणों से बुना हुआ, यह अंचल कितना हलका-सा कितना सौरभ से सना हुआ। सब अंग मोम से बनते हैं कोमलता में बल खाती हूँ. मैं सिमिट रही-सी अपने में परिहास-गीत सुन पाती हूँ। स्मित बन जाती है तरल हँसी नयनों में भरकर बाँकपना, प्रत्यक्ष देखती हूँ सब जो वह बनता जाता है सपना। प्रस्तुत कविता में नायिका के अंगों की तुलना किससे की गई है?

कोमल किसलय के अंचल में नन्ही कलिका ज्यों छिपती-सी, गोधूलि के धूमिल पट में दीपक के स्वर में दिपती-सी। मंजुल स्वप्नों की विस्मृति में मन का उन्माद निखरता ज्यों सुरभित लहरों की छाया में बुल्ले का विभव बिखरता ज्यों वैसी ही माया में लिपटी अधरों पर उँगली घरे हुए, माधव के सरस कुतूहल का आँखों में पानी भरे हुए। नीरव निशीथ में लतिका-सी तुम कौन आ रही हो बढ़ती? कोमल बाँहे फैलाये-सी आलिंगन का जादू पढ़ती? किन इंद्रजाल के फूलों से लेकर सुहाग-कण-राग-भरे, सिर नीचा कर हो गूंथ माला जिससे मधु धार ढरे? पुलकित कदंब की माला-सी पहना देती हो अंतर में, झुक जाती है मन की डाली अपनी फल भरता के डर में। वरदान सदृश हो डाल रही नीली किरणों से बुना हुआ, यह अंचल कितना हलका-सा कितना सौरभ से सना हुआ। सब अंग मोम से बनते हैं कोमलता में बल खाती हूँ. मैं सिमिट रही-सी अपने में परिहास-गीत सुन पाती हूँ। स्मित बन जाती है तरल हँसी नयनों में भरकर बाँकपना, प्रत्यक्ष देखती हूँ सब जो वह बनता जाता है सपना। पुलकित शब्द में मूल शब्द क्या है?

कोमल किसलय के अंचल में नन्ही कलिका ज्यों छिपती-सी, गोधूलि के धूमिल पट में दीपक के स्वर में दिपती-सी। मंजुल स्वप्नों की विस्मृति में मन का उन्माद निखरता ज्यों सुरभित लहरों की छाया में बुल्ले का विभव बिखरता ज्यों वैसी ही माया में लिपटी अधरों पर उँगली घरे हुए, माधव के सरस कुतूहल का आँखों में पानी भरे हुए। नीरव निशीथ में लतिका-सी तुम कौन आ रही हो बढ़ती? कोमल बाँहे फैलाये-सी आलिंगन का जादू पढ़ती? किन इंद्रजाल के फूलों से लेकर सुहाग-कण-राग-भरे, सिर नीचा कर हो गूंथ माला जिससे मधु धार ढरे? पुलकित कदंब की माला-सी पहना देती हो अंतर में, झुक जाती है मन की डाली अपनी फल भरता के डर में। वरदान सदृश हो डाल रही नीली किरणों से बुना हुआ, यह अंचल कितना हलका-सा कितना सौरभ से सना हुआ। सब अंग मोम से बनते हैं कोमलता में बल खाती हूँ. मैं सिमिट रही-सी अपने में परिहास-गीत सुन पाती हूँ। स्मित बन जाती है तरल हँसी नयनों में भरकर बाँकपना, प्रत्यक्ष देखती हूँ सब जो वह बनता जाता है सपना। कविता के अनुसार नायिका कौन-सा गीत सुन पा रही है?

सिद्धार्थ की माँ ने अपने परिवार के सदस्यों से अनुरोध किया है कि वे घर में एक ही भाषा का प्रयोग करें। जिससे कि सिद्धार्थ का भाषाई विकास ठीक से हो सके। उनके बारे में आप क्या कहोंगे?