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Class 9
PHYSICS
प्रत्येक क्रिया की उसके समान परन्तु विपर...

प्रत्येक क्रिया की उसके समान परन्तु विपरीत दिशा में प्रतिक्रिया होती है। इसको स्पष्ट करने लिये दो उदाहरण दीजिये।

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In a circle, two equal and parallel chords are 6 cm apart and they lie on the opposite sides of the centre of the circle, whose radius is 5 cm. The length of each chord (in cm), is एक वृत्त में, दो समान और समानान्तर जीवा 6 सेमी के दुरी पर हैं और वे वृत्त के केंद्र के विपरीत किनारों पर स्थित हैं, जिसकी त्रिज्या 5 सेमी है। प्रत्येक जीवा की लंबाई (सेमी में ) है:

The ratio of the lengths of train A and B is 5 : 3 and their speeds are in the ratio of 2 : 3. Walking in the opposite direction, Train A took 2 1/2 minutes to cross B. The time ( in minutes ) taken by train A to cross a stationary pole is: ट्रैन A और B की लंबाइओं का अनुपात 5:3 है और उनकी गतियों का अनुपात 2:3 है | विपरीत दिशा में चलते हुए, ट्रैन A द्वारा B को पार करने में 2 1/2 मिनट का समय लगा | एक स्थिर स्तम्भ (स्टेशनरी पोल ) को पार करने में ट्रैन A द्वारा लिया गया समय (मिनट में ) है:

निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये मानव जीवन में आत्मसम्मान का अत्यधिक महत्व है। आत्मसम्मान में अपने व्यक्तित्व को अधिकाधिक सशक्त एवं प्रतिष्ठित बनाने की भावना निहित होती है। इससे शक्ति, साहस, उत्साह आदि गुणों का जन्म होता है जो जीवन की उन्नति का मार्ग प्रशस्त करते हैं। आत्मसमान की भावना से पूर्ण व्यक्ति संघर्षों की परवाह नहीं करता है और हर विषम परिस्थिति से टक्कर लेता है। ऐसे व्यक्ति जीवन में पराजय का मुंह नहीं देखते तथा निरन्तर यश की प्राप्ति करते हैं। आत्मसम्मानी व्यक्ति धर्म, सत्य, न्याय और नीति के पथ का अनुगमन करता है उसके जीवन में ही सच्चे सुख और शांति का निवास होता है। परोपकार, जनसेवा जैसे कार्यों में उसकी रूचि होती है। लोकप्रियता और सामाजिक प्रतिष्ठा उसे सहज ही प्राप्त होती है। ऐसे व्यक्ति में अपने राष्ट्र के प्रति सच्ची निष्ठा होती है तथा मातृभूमि की उन्नति के लिए वह अपने प्राणों को उत्सर्ग करने में सुख की अनुभूति करता है। चूंकि आत्मसम्मानी व्यक्ति अपने अथवा दूसरों की आत्मा का हनन नहीं करता है, इसीलिए वह ईर्ष्या-द्वेष जैसी भावनाओं से मुक्त होकर मानव मात्र को अपने परिवार का अंग मानता है। उसके हृदय में स्वार्थ, लोभ और अहंकार का भाव नहीं होता। निश्छल हृदय होने के कारण वह आसुरी प्रवृत्तियों से सर्वथा मुक्त होता है। आत्मसम्मानी व्यक्ति की रूचि होती है

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