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रिवीजन|विजय नगर और बहमनी साम्राज्य#!# महाराणा प्रताप#!#रानी दुर्गावती#!#महाराजा शिवाजी का संक्षिप्त इतिहास#!# मुगलों का पतन

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Recap |राजस्थानी राजाओं का इतिहास |हम्मीर देव चौहान |महाराणा प्रताप |मराठों का इतिहास (छत्रपति शिवाजी, पुरंदर की संधि, विजयनगर साम्राज्य)|सिख धर्म का विकास

भाषा 'जातीय जीवन और उसकी संस्कृति की सर्वप्रधान रक्षिका है, वह उसके शील का दर्पण है, वह उसके विकास का वैभव है। भाषा जीती, और सब जीत लिया। फिर कुछ भी जीतने के लिए शेष नहीं रह जाता। विजितों का अस्तित्व मिट चलता है। विजितों के मुँह से निकली हुई विजयीजनों की भाषा उनकी दासता की सबसे बड़ी चिन्हानी है। पराई भाषा चरित्र की दृढ़ता का अपहरण कर लेती है, मौलिकता का विनाश कर देती है और नकल करने का स्वभाव बना करके उत्कृष्ट गुणों और प्रतिभा से नमस्कार करा देती है। इसीलिए, जो देश दुर्भाग्य से पराधीन हो जाते हैं, वे उस समय तक, जब तक कि वे अपना सब कुछ नहीं खो देते, अपनी भाषा की रक्षा के लिए सदा लोहा लेते रहना अपना कर्तव्य समझते हैं। अनेक यूरोपीय देशों के इतिहास भाषा-संग्राम की घटनाओं से भरे पड़े हैं। प्राचीन रोम साम्राज्य से लेकर अब तक के रूस, जर्मन, इटैलियन, आस्ट्रियन, फ्रेंच और ब्रिटिश सभी साम्राज्यों ने अपने अधीन देशों की भाषा पर अपनी विजय-वैजयंती फहरायी। भाषा-विजयी का यह काम सहज से नहीं हो गया। भाषा-समरस्थली के एक-एक इंच स्थान के लिए बड़ी-बड़ी लड़ाइयाँ हुई। देश की स्वाधीनता के लिए मर मिटने वाले अनेक वीर-पुंगवों के समयों में इस विचार का स्थान सदा ऊँचा रहा है कि देश की भौगोलिक सीमा की अपेक्षा मातृभाषा की सीमा की रक्षा की अधिक आवश्यकता है। वे अनुभव करते थे कि भाषा बची रहेगी तो देश का अस्तित्व और उसकी आत्मा बची रहेगी, अन्यथा फिर कहीं उसका कुछ भी पता न लगेगा। लेखक के अनुसार जातीय जीवन की रक्षिका कौन है?

प्रश्न |महाराणा प्रताप|मराठो का इतिहास |छत्रपति शिवाजी तथा पुरंदर की संधि |रानी दुर्गावती |विजयनगर साम्राज्य |बहमनी राज्य

दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 14 साक्षी है इतिहास हमी पहले जागे है जाग्रत सब हो रहे हमारे ही आगे हैं। शत्रु हमारे कहाँ नहीं भय से भागे हैं? कायरता से कहाँ प्राण हमने त्यागे हैं। हैं हमीं प्रकम्पित कर चुके, सुरपति तक का भी हृदया फिर एक बार हे विश्व तुम, गाओ भारत की विजय ।। कहाँ प्रकाशित नहीं रहा है तेज हमारा दलित कर चुके शत्रु सदा हम पैरों द्वारा। बताओ तुम कौन नहीं जो हमसे हारा पर शरणागत हुआ कहाँ, कब हमें न प्यारा बस युद्ध मात्र को छोड़कर, कहाँ नहीं हैं हम सदय फिर एक बार हे विश्व! तुम गाओ भारत की विजय 'हैं हमीं प्रकम्पित कर चुके, सुरपति तक का हृदय' से हमारी किस विशेषता का बोध होता है?

दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 14 साक्षी है इतिहास हमी पहले जागे है जाग्रत सब हो रहे हमारे ही आगे हैं। शत्रु हमारे कहाँ नहीं भय से भागे हैं? कायरता से कहाँ प्राण हमने त्यागे हैं। हैं हमीं प्रकम्पित कर चुके, सुरपति तक का भी हृदया फिर एक बार हे विश्व तुम, गाओ भारत की विजय ।। कहाँ प्रकाशित नहीं रहा है तेज हमारा दलित कर चुके शत्रु सदा हम पैरों द्वारा। बताओ तुम कौन नहीं जो हमसे हारा पर शरणागत हुआ कहाँ, कब हमें न प्यारा बस युद्ध मात्र को छोड़कर, कहाँ नहीं हैं हम सदय फिर एक बार हे विश्व! तुम गाओ भारत की विजय 'पहले जागे हैं' का भाव है

दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 14 साक्षी है इतिहास हमी पहले जागे है जाग्रत सब हो रहे हमारे ही आगे हैं। शत्रु हमारे कहाँ नहीं भय से भागे हैं? कायरता से कहाँ प्राण हमने त्यागे हैं। हैं हमीं प्रकम्पित कर चुके, सुरपति तक का भी हृदया फिर एक बार हे विश्व तुम, गाओ भारत की विजय ।। कहाँ प्रकाशित नहीं रहा है तेज हमारा दलित कर चुके शत्रु सदा हम पैरों द्वारा। बताओ तुम कौन नहीं जो हमसे हारा पर शरणागत हुआ कहाँ, कब हमें न प्यारा बस युद्ध मात्र को छोड़कर, कहाँ नहीं हैं हम सदय फिर एक बार हे विश्व! तुम गाओ भारत की विजय 'हमारे आगे सबका जाग्रत होना' का भाव है

दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 14 साक्षी है इतिहास हमी पहले जागे है जाग्रत सब हो रहे हमारे ही आगे हैं। शत्रु हमारे कहाँ नहीं भय से भागे हैं? कायरता से कहाँ प्राण हमने त्यागे हैं। हैं हमीं प्रकम्पित कर चुके, सुरपति तक का भी हृदया फिर एक बार हे विश्व तुम, गाओ भारत की विजय ।। कहाँ प्रकाशित नहीं रहा है तेज हमारा दलित कर चुके शत्रु सदा हम पैरों द्वारा। बताओ तुम कौन नहीं जो हमसे हारा पर शरणागत हुआ कहाँ, कब हमें न प्यारा बस युद्ध मात्र को छोड़कर, कहाँ नहीं हैं हम सदय फिर एक बार हे विश्व! तुम गाओ भारत की विजय 'शत्रु' शब्द का विपरीतार्थक है

दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 14 साक्षी है इतिहास हमी पहले जागे है जाग्रत सब हो रहे हमारे ही आगे हैं। शत्रु हमारे कहाँ नहीं भय से भागे हैं? कायरता से कहाँ प्राण हमने त्यागे हैं। हैं हमीं प्रकम्पित कर चुके, सुरपति तक का भी हृदया फिर एक बार हे विश्व तुम, गाओ भारत की विजय ।। कहाँ प्रकाशित नहीं रहा है तेज हमारा दलित कर चुके शत्रु सदा हम पैरों द्वारा। बताओ तुम कौन नहीं जो हमसे हारा पर शरणागत हुआ कहाँ, कब हमें न प्यारा बस युद्ध मात्र को छोड़कर, कहाँ नहीं हैं हम सदय फिर एक बार हे विश्व! तुम गाओ भारत की विजय हमारी दयालुता प्रकट होती है

दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 14 साक्षी है इतिहास हमी पहले जागे है जाग्रत सब हो रहे हमारे ही आगे हैं। शत्रु हमारे कहाँ नहीं भय से भागे हैं? कायरता से कहाँ प्राण हमने त्यागे हैं। हैं हमीं प्रकम्पित कर चुके, सुरपति तक का भी हृदया फिर एक बार हे विश्व तुम, गाओ भारत की विजय ।। कहाँ प्रकाशित नहीं रहा है तेज हमारा दलित कर चुके शत्रु सदा हम पैरों द्वारा। बताओ तुम कौन नहीं जो हमसे हारा पर शरणागत हुआ कहाँ, कब हमें न प्यारा बस युद्ध मात्र को छोड़कर, कहाँ नहीं हैं हम सदय फिर एक बार हे विश्व! तुम गाओ भारत की विजय कवि किसे भारत की जय-जयकार करने को कह रहा है?

गोदान' प्रेमचन्द जी का एक ऐसा क्रान्तिकारी उपन्यास है, जिसमें तत्कालीन युग अपनी समस्त विकृतियों, विडम्बनाओं एवं सच्चाइयों के साथ चित्रित हो गया है। उसमें अपने समय का यथार्थ ही चित्रित नहीं हुआ है वरन् तत्कालीन भारतीय कृषक वर्ग का इतिहास भी संरक्षित हुआ है। प्रेमचन्द जी अपने युग और उसकी परिस्थितियों से पूर्णतः परिचित थे। इसी कारण छोटे-छोटे प्रसंग भी उनकी दृष्टि से ओझल नहीं रहे हैं। अपने समाज की यह पहचान और इसे औपन्यासिक परिस्थितियों से अनुस्यूत कर देने की क्षमता बिरले लोगों में ही होती है। वे यह जानते थे कि एक निष्क्रिय समाज पतन के लिए किस बिन्दु पर खड़ा है तथा वही समाज सामाजिक जागृति पाकर जब जागता है, तो वह किस तरह अपने अतीत और वर्तमान के संकटों के बीच भविष्य के प्रति आशावादी होता है। सामाजिक चेतना के महीन बिन्दुओं को, उन सामाजिकों के बीच प्रेमचन्द ने पहचाना था, जिन्होंने उस चेतना को स्वाभाविक रूप में प्राप्त किया। डॉ। गंगा प्रसाद विमल इसी प्रसंग में लिखते हैं---उपन्यास कथा, होरी जैसे साधारण किसान को केन्द्र बनाकर चलती है, किन्तु केन्द्रीय कथा में होरी मात्र नायक के रूप में ही प्रस्तावित नहीं है, अपितु वह स्वयं एक कथा सत्य के रूप में स्थापित होता है। होरी की कथा में नगर एवं गाँव दोनों के अर्थतन्त्र का खुला हिसाब प्रतीत होता है, परन्तु इन आधारों पर गोदान केवल ₹ एक विचारकथा या समस्याओं की कथा नहीं है, बल्कि वह मानवीय संघर्ष की कथा है। ऐसी कथा जिसमें स्वाधीनता युग की स्वर क्रान्ति की लहरी का ज्वार भी है, तो सारी लड़ाई का पराजय बोध भी। वस्तुत: पराजय बोध के केन्द्र से यदि हम इस कथा कृति का अवलोकन करें, तो हम पाएँगे कि गोदान में एक सच्ची त्रासदी की तस्वीर अवतरित हुई है। उपन्यास का नायक होरी इतना दीन-हीन किसान है कि उसके माध्यम से भारतीय कृषक वर्ग की करुणा और मार्मिक जीवन-यात्रा की सजीव झाँकी प्रस्तुत हो गई है। भारतीय किसान ऋण में ही पैदा होता है, ऋण में ही जीवित रहता है और अपने उत्तराधिकारी पर ऋण का भार छोड़कर मर जाता है। मरते समय उसके पास एक गाय तक नहीं रहती। गोदान उपन्यास ऐसे ही भारतीय किसान के जीवन को करुण त्रासदी है। माय की आकांक्षा होरी के जीवन का सबसे मधुर स्वप्न उसके जीवन की सबसे बड़ी अभिलाषा है। अपनी यह आकांक्षा पूरी करने के लिए वह कोई भी जोखिम उठा सकता है पर पूँजीवादी शोषणचक्र उसकी अभिलाषा को पीस डालता है। अन्त में इस आकांक्षा की पूर्ति के लिए वह ऐसा जी-तोड़ परिश्रम करता है, जो उसकी मृत्यु का कारण बनता है और वह गाय की अभिलाषा मन में ही लिए मृत्यु का वरण कर लेता है। क्रान्तिकारी शब्द है