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Class 9
BIOLOGY
यकृत की संरचना एवं कार्यों का वर्णन कीजि...

यकृत की संरचना एवं कार्यों का वर्णन कीजिए।

लिखित उत्तर

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उपकला ऊतक, प्राणि शरीर में आवरण अथवा रक्षा प्रदान करने वाले ऊतक होते हैं। उपकला शरीर के अधिकतर अंगों एवं गुहिकाओं को आच्छादित करती है तथा विभिन्न देह-तंत्रों को अलग-अलग करती है। त्वचा, मुख का अस्तर, रुधिर वाहिकाओं, फुफ्फुस कूपिकाओं एवं वृक्क नलिकाओं के अस्तर सभी उपकला ऊतकों से बने होते हैं। उपकला ऊतक की कोशिकाएँ एक दूसरे से कसकर सटी हुई होती है तथा अविच्छिन्न शीट बनाती हैं। बीच में संयोजी पदार्थ (सीमेटिंग पदार्थ) की बहुत थोडी सी मात्रा पाई जाती है। अंतरकोशिकीय स्थान भी प्राय: नहीं होते है। अनेक उपकलाएँ न केवल बाहरी वातावरण तथा शरीर के मध्य पदार्थों के विनिमय को नियमित करने में बल्कि शरीर के विभिन्न भागों (अंगों) के बीच भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इसके विभिन्न प्रकारों पर ध्यान न देते हुए, सभी उपकलाएँ अध:स्थ ऊतकों से, एक कोशिका बाह्य रेशेदार आधार झिल्ली के द्वारा सामान्यतया अलग-अलग होती है।
उपकला ऊतक निम्न प्रकार के होते है-(1) सरल शल्की उपकला, (2) स्तरित शल्की उपकला, (3) स्तंभाकार उपकला, एवं (4) घनाकार उपकला। ये ऊतक संरचना में भिन्न होते है जो कि अपने अनुपम कार्यों के साथ सह-संबंधित होते हैं। उदाहरण के लिए. रुधिर वाहिकाओं अथवा फुफ्फुस कूपिकाओं की कोशिकाओं का अस्तर, जहाँ पदार्थों का अभिगमन वरणात्मक पारगम्य सतह से होता है, वह एक सरल चपटे प्रकार की उपकला है। इसे सरल शल्की उपकला कहते हैं। सरल शल्की उपकला कोशिकाएँ अत्यधिक पतली एवं चपटी होती हैं और ये एक कोमल अस्तर बनाती है। त्वचा, ग्रसिका एवं मुख का अस्तर भी शल्की उपकला से आच्छादित अथवा ढका होता है। त्वचा की उपकला कोशिकाएँ अनेक स्तरों में व्यवस्थित होकर इसके कटने-फटने को रोकती है। चूंकि ये स्तरों के पैटर्न में व्यवस्थित होती हैं अतः इन्हें स्तरित शल्की उपकला कहते हैं।
जिन अंगों में अवशोषण एवं स्रवण होता है जैसे कि आँतों के आंतरिक अस्तर में, वहाँ लंबी उपकला कोशिकाएँ होती हैं। यह स्तंभाकार उपकला, उपकला रोधिका के आर-पार गमन को सरल बनाती है। श्वसन-पथ की स्तंभाकार उपकला ऊतकों में पक्ष्माभ होते है जो उपकला कोशिकाओं की बाहरी सतह पर रोम की तरह निकले होते हैं। ये पक्ष्माभ हिल सकते है और अपनी गति से श्लेष्म को श्वसन पथ में सफाई करने के लिए आगे धकेलते रहते हैं। इस प्रकार की उपकला को पक्ष्माभी स्तंभाकार उपकला कहते हैं।
घनाकार उपकला, लार-ग्रंथियों की वाहिनियों एवं वृक्क नलिकाओं का अस्तर बनाती है जहाँ यह यांत्रिक बल प्रदान करती है। उपकला कोशिकाएँ प्रायः अतिरिक्त विशेषज्ञता प्राप्त कर लेती है जैसे ग्रंथि कोशिकाएँ, जो उपकला की सतह पर पदार्थों का स्रवण कर सकती है। कभी-कभी उपकला ऊतकों का एक भाग अंदर की ओर वलित हो जाता है और बहुकोशिकीय ग्रंथि बन जाती है। यह ग्रंथिल उपकला होती है।
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