पेशी संकुचन तंत्रकीय प्रेरक से शुरू होता है जो तंत्रिका - पेशीय संगम या प्रेरक अंत : पट्टिका पर पहुँचकर तंत्रिका संचारी मुक्त करता है | जिसके प्रभाव से सारर्कोलेमा में एक क्रिया विभव उत्पन्न हो जाता है | यह क्रिया विभव पूरे पेशीय रेशे पर फैल जाता है तथा कैल्सियम आयन सारकोप्लाज्म में मुक्त हो जाते हैं | `Ca^(++)` के बढ़े हुए स्तर के कारण एक्टिन तंत्र पर उपस्थित ट्रोपोलिंन की उप इकाई से कैल्सियम बंध बन जाता है | इसके परिणामस्वरूप एक्टिन के ढ़के हुए सक्रिय स्थान मायोसिन के लिए खुल जाते हैं | ATP के जल अपघटन से प्राप्त ऊर्जा का उपयोग करके मायोसिन शीर्ष एक्टिन के खुले सक्रिय स्थानों से बंध होकर क्रॉस सेतु बना लेते हैं | यह बंध एक्टिन तंतुओं को .ए. बैंड के मध्य की तरफ़ खींचता है | इसके साथ ही एक्टिन तंतुओं से जुड़ी हुई . Z . रेखा भी अंदर की तरफ़ खींच जाती है जिसके परिणामस्वरूप सार्कोमीयर छोटा हो जाता है अर्थात संकुचित हो जाता है (इस तरह पेशीय संकुचन का एक चरण पूरा हो जाता है) |
एक नए ATP के मायोसिन शीर्ष के साथ बंधने के साथ ही क्रॉस सेतु टूट जाता है | यह ATP पुनः मायोसिन शीर्ष द्वारा अपघटित होता है और इस प्रकार क्रॉस सेतु बनने और टूटने की क्रिया के चक्र की पुनरावृति होती जाती है तथा बार - बार सर्पण होता रहता है | यह प्रक्रिया तब तक चलती रहती है जबतक `Ca^(2+)` आयन सिसटर्नी में वापस चली जाती है जिसके परिणामस्वरूप एक्टिन स्थल पुनः ढक जाते हैं और सारे क्रॉस सेतु टूट जाते हैं | इसके कारण .Z. रेखा तंतुओं के साथ अपने मूल स्थान पर वापस चली जाती है अर्थात् स्थिलन हो जाता है |
