ध्वनिवर्द्धक यंत्र के भाग -
चित्र में दिखाए अनुसार ध्वनिवर्द्धक यंत्र में स्थायी चुंबक, डोली, आवाज कुंडली, लचीली लम्बित वलय तथा दृढ़ ध्वनिवर्द्धक (स्पीकर) शंकु होते है।
ध्वनिवर्द्धक का सिद्धांत
एक हल्की आवाज कुंडली जड़ी रहती है जिससे यह शक्तिशाली स्थायी चुंबकों के चुंबकीय क्षेत्र के अंदर स्वतंत्र रूप से गति कर सकती है। कागज शंकु आवाज कुंडली से जुड़ा रहता है तथा यह लचीली दफ्ती से ध्वनिवर्द्धक (स्पीकर सहारे के बाहरी वलय से जुड़ा रहता है। क्योंकि स्पीकर शंकु के लिए एक निश्चित साम्यावस्था स्थिति होती है तथा दफ्ती संरचना में प्रत्यास्थता है, अतः स्प्रिंग से जुड़े द्रव्यमान की तरह एक स्वतंत्र शंकु अनुनाद आवृति अवश्य होती है। शंकु तथा आवाज कुंडली के द्रव्यमान तथा कड़ेपन को व्यवस्थिति करके आवृति ज्ञात की जा सकती है।
कार्यविधि : रेडियो, कुंडली से तेजी से परिवर्तित धारा लेता ह। धारा बोलने के कम्पन्न का अनुसरण करती है तथा विद्युत् चुंबकीय बल धारा परिवर्तन का अनुसरण करता है तथा कागज शंकु को धक्का देता है। अंत में ध्वनिवर्द्धक यंत्र के सामने की हवा शंकु की गति का अनुसर करती हुई लम्पन्न करती है तथा ध्वनि तरंग श्रोता तकत होती है। ध्वनि वर्द्धक यंत्र का सिद्धांत है -