जनन तंत्र उन अंगों का समूह होता है जो संतानोत्पत्ति में सहायता करते हैं। नर के जनन अंग निम्नलिखित हैं (1) वषण, (2) शक्राणु नलिका, (3) शिश्न।
इनमें से वृषण नर के मुख्य जनन अंग हैं तथा शेष सभी सहायक जनन अंग हैं।
- 1. वृषण-प्रत्येक मनुष्य में अंडाकार अखरोट के माप के दो वृषण होते हैं जो त्वचा की पतली थैली, वृषण कोष के अंदर तथा उदर के नीचे वाले भाग में स्थित होते हैं। प्रत्येक वृषण से एक नली निकलती है, जिसे शुक्रवाहिनी कहते हैं।
2. शुक्राणु नलिकायह एक लंबी तथा कुंडलित नलिका की संरचना है। यह शुक्राणुओं को संचित करती है और उन्हें गतिमान बनाती है। वृषण से निकलने के बाद शुक्राणु नलिका सीधी हो जाती है तथा उसका व्यास बढ़ जाता है। अब इसे शुक्रवाहिनी कहते हैं और यह मूत्राशय से आने वाली नली मूत्रमार्ग से जुड़ जाती है।
3. शिश्न-मूत्रमार्ग एक पेशीय अंग द्वारा शरीर के बाहर खुलता है जो कि शिश्न कहलाता है। मूत्र तथा शुक्र दोनों एक ही मार्ग शिश्न से निकलते हैं। शिश्न में बहुत अधिक रुधिर प्रवाहित होता है। शिश्न शुक्राणुओं को मादा जननांगों में छोड़ देता है।