आँख के दोष-एक सामान्य स्वस्थ आँख अपनी फोकस दूरी को इस प्रकार संयोजित करती है कि पास तथा दूर की सभी वस्तुओं का प्रतिबिंब दृष्टिपटल (रटिना) पर बन जाए, परंतु कभी-कभी आँख की इस संयोजन शक्ति में कमी आ जाती है। इससे दृष्टिपटल (रटिना) पर ठीक से प्रतिबिंब नहीं बनता, जिससे दीर्घ-दृष्टि तथा निकट-दृष्टि दोष हो जाते हैं।
(1) निकट-दृष्टि दोष-इस दोष के व्यक्ति को निकट की वस्तुएँ तो स्पष्ट दिखाई देती हैं, परंतु दूर की वस्तुएँ स्पष्ट दिखाई नहीं देतीं। इसका कारण यह कि दूर की वस्तुओं का प्रतिबिंब रेटिना (दृष्टिपटल) के सामने बनता है। जैसा कि चित्र में दिखाया गया है।
निकट-दृष्टि दोष के कारण -इस दोष के उत्पन्न होने के कारण अभिनेत्र लेंस की वक्रता का अत्यधिक होना अथवा नेत्र गोलक लंबा हो जाता है।
निकट-दृष्टि दोष को दूर करना-किसी उपयुक्त क्षमता के अवतल लेंस के उपयोग द्वारा इस दोष को दूर किया जा सकता है। उपयुक्त क्षमता का अवतल लेंस वस्तु के प्रतिबिंब को वापस दृष्टिपटल (रटिना) पर ले आता है जिससे इस दोष का संशोधन किया जा सकता है।
(2) दूर-दृष्टि दोष—इस दोष के व्यक्ति को दूर की वस्तुएँ तो स्पष्ट दिखाई देती हैं परन्तु निकट की वस्तुएँ स्पष्ट दिखाई नहीं देती। इसका कारण यह है कि निकट की वस्तुओं का प्रतिबिम्ब रेटिना के पीछे बनता है जैसा कि चित्र में दर्शाया गया है।
दूर-दृष्टि दोष के कारण - दूरी-दृष्टि दोष के निम्नलिखित कारण हैं -
(1) नेत्र गोलक का छोटा हो जाना। (2) अभिनेत्र लेंस की फोकस दूरी का कम हो जाना।
दूर-दृष्टि दोष को दूर करना-इस दोष को दूर करने के लिए उत्तल लेंस का प्रयोग किया जाता है। इस लेंस के प्रयोग से निकट बिंदु से आने वाली प्रकाश किरणें किसी दूर के बिंदु से आती हुई प्रतीत होती हैं तथा निकट पड़ी वस्तुएँ स्पष्ट दिखाई देने लगती हैं।
कभी-कभी किसी व्यक्ति के नेत्र में दोनों निकट-दृष्टि तथा चित्र दीर्घ-दृष्टि दोष हो सकते हैं। ऐसे व्यक्तियों को प्रायः द्विफोकसी लेंसों (Bifocal lens) की आवश्यकता होती है। द्विफोकसी लेंसों के अधिकांश सामान्य प्रकारों में द्विफोकसी लेंस का ऊपरी भाग अवतल लेंस होता है जो दूर की वस्तुओं को देखने के लिए होता है। द्विफोकसी लेंस का निचला भाग उत्तल लेंस होता है जो पढ़ने में उपयोग होता है।