सौर कुकर के मुख्य अवयव (i) काली सतह, (ii) साधारण काँच की पट्टी, (iii) दर्पणों की उचित व्यवस्था, (iv) ऊष्मारोधी बॉक्स।
सिद्धांत तथा कार्य-विधि - काली सतह, परावर्तक सतह की तुलना से अधिक ऊष्मा का अवशोषण करती है परंतु कुछ समय पश्चात् काली सतह इस अवशोषित ऊष्मा का विकिरण प्रारंभ कर देती है। ऊष्मा की इस कमी को रोकने के लिए काली पट्टी को किसी ऊष्मारोधी बॉक्स में रखकर उसे काँच की पट्टी से ढंक दिया जाता है। बॉक्स के अंदर के दीवारों को काले रंग से पेंट कर दिया जाता है ताकि अधिक-से-अधिक ऊष्मा का अवशोषण हो सके तथा परावर्तन द्वारा ऊष्मा का नुकसान कम-से-कम हो सके। जब इस सौर कुकर को सौर प्रकाश में कुछ समय के लिए रखा जाता है तो इसकी अंदरूनी सतह सौर ऊर्जा को प्राप्त करने के पश्चात् गर्म हो जाती है। अब ये सतहें स्वयं ऊष्मा को अवरक्त विकिरण के रूप में छोड़ने लगती हैं परंतु ऊपरी सतह पर स्थापित काँच की पट्टी इन विकिरणों को बाहर नहीं जाने देती। अत: बॉक्स के अंदर की ऊष्मा अंदर ही रह जाती है। सौर ऊर्जा संग्रहण के क्षेत्र को बढ़ाने के लिए पार्श्व में परावर्तक का उपयोग किया जाता है। इस कुकर का अंदरूनी ताप 2-3 घंटे की अवधि में `100^(@)C` से `140^(@)C` हो जाता है। इस सौर कुकर में उन खाद्य पदार्थों को सरलता से पकाया जा सकता है जिन्हें हल्की ऊष्मा की आवश्यकता होती है।
