जंतु कोशिका की सूक्ष्मदर्शी संरचना-जीवधारियों के जीवन की सूक्ष्म इकाई को कोशिका कहते हैं। यह जीवद्रव्य से भरी एक छोटी-सी इकाई होती है। प्रत्येक जंतु का शरीर कोशिकाओं से मिलकर बना होता है। कोशिकाओं का आकार भिन्न-भिन्न
होता है और इनकी संख्या भी भिन्न-भिन्न होती है। कोशिका के प्रमुख दो भाग होते हैं
(क) कोशिका झिल्ली, (ख) जीवद्रव्य
(क) कोशिका झिल्ली-कोशिका के चारों ओर एक पतली झिल्ली पाई जाती है जो प्लैज्मा की बनी होती है। यह बहुत पतली, कोमल और लचीली होती है। कोशिका झिल्ली अर्धपारगम्य होती है। यह कोशिका को आकार प्रदान करती है और इसके अंदर जीवद्रव्य सुरक्षित रहता है। यह कोशिका में आने और जाने वाले पदार्थों पर नियंत्रण करती है।
(ख) जीवद्रव्य कोशिका झिल्ली के अंदर वाले सारे पदार्थ को जीवद्रव्य कहते हैं। जीवद्रव्य ही जीवन का आधार है। जीव द्रव्य में ही जीवन की सभी क्रियाएँ संपन्न होती हैं। जीव द्रव्य के दो मुख्य भाग हैं- (i) केंद्रक, (ii) कोशिका द्रव्य ।
1. केंद्रक-प्रत्येक कोशिका के मध्य में स्थित गोलाकार संरचना को केंद्रक कहते हैं। केंद्रक कोशिका के सभी कार्यों पर नियंत्रण करता है। केंद्रक के चार प्रमुख भाग होते हैं केंद्रक झिल्ली, केंद्रिक रस, क्रोमेटिन-जाल, केन्द्रिका केंद्रक के चारों ओर दोहरी झिल्ली होती है जो अंतर्द्रव्यीजालिका से जुड़ी होती है। इसके अंदर DNA, RNA तथा प्रोटीन से बना पदार्थ क्रोमेटिन पाया जाता है। इसी क्रोमेटिन से बनी धागे जैसी संरचनाओं में गुणसूत्र पाए जाते हैं। गुणसूत्र DNA और प्रोटीन से बने होते हैं। ये गुणसूत्र जीन के द्वारा माता-पिता के गुण उनके बच्चों तक ले जाने का कार्य करते हैं। केंद्र के मध्य, गाढ़े दानेदार पदार्थ से बनी गोल संरचना केंद्रिका कहलाती है। यह RNA को अपने अंदर जमा करके रखता है और कोशिका विभाजन में सहायता करता है।
2. कोशिका द्रव्य केंद्रक को छोड़कर शेष जीवद्रव्य को कोशिका द्रव्य कहते हैं। कोशिका द्रव्य में सजीव और निर्जीव कण पाए जाते हैं। कोशिका द्रव्य में निम्नलिखित कोशिकांग पाए जाते हैं
(i) माइटोकॉन्ड्रिया (सूत्र-कणिका) ये दोहरी झिल्ली वाली गोल या छड़ के आकार की संरचनाएँ होती हैं। माइटोकॉन्ड्रिया में DNA, RNA तथा श्वसन एंजाइम होते हैं। ये श्वसन क्रिया में सहायक होते हैं तथा कोशिका का ऊर्जा घर या पावर हाऊस कहलाता है।
(ii) राइबोसोम यह RNA तथा प्रोटीन से बनी गोल व दानेदार संरचनाएँ होती हैं। यह मुक्त रूप से कोशिका द्रव्य में पाया जाता है। यह प्रोटीन संश्लेषण का कार्य करता है।
(iii) अंतः प्रद्रव्यी जालिका यह कोशिका झिल्ली की बनी हुई बहुत सी कुण्डलित नलिकाएँ होती हैं। ये कोशिका झिल्ली और केंद्रक से जुड़ी होती हैं। इनकी बाहरी सतह पर राइबोसोम पाए जाते हैं। यह प्रोटीन और वसा से मिलकर बना जाल होता है। यह कोशिका के अंदर कणों के स्थानांतरण में सहायता करती है। यह कोशिका द्रव्य और केंद्रक के बीच संबंध स्थापित करता है।
(iv) गॉल्जीकाय- ये केंद्रक के निकट, चपटी झिल्ली की तरह की संरचनाएँ होती हैं। इनके सिरे फूल कर पोटली जैसे हो जाते हैं। ये प्रोटीन और वसा कणों से मिलकर बनी होती हैं। इसका कार्य अधिक स्पष्ट नहीं है, फिर भी यह कोशिका भित्ति के निर्माण और उत्सर्जन स्रावण के कार्य करती है।
(v) तारककाय-यह केंद्रक के समीप छोटी-सी कायाभ संरचना होती है। इसमें दो तारक केंद्र होते हैं। ये तारक परिकेंद्र से घिरे होते हैं। ये केवल जंतु कोशिका में पाए जाते हैं। यह कोशिका विभाजन के लिए प्रेरणा देता है।
(vi) लाइसोसोम यह कोशिका के अंदर गोल या अण्डाकार संरचनाएँ होती हैं। इसमें पाचक एंजाइम पाए जाते हैं। लाइसोसोम पाचन क्रिया तथा टूटे-फूटे कोशिकांगों को नष्ट करने में सहायता करता है लाइसोसोम कोशिका के अंगों को अपने-आप पचने से भी रोकते हैं।
(vii) रसधानी कोशिका में गोलाकार या अण्डाकार कुछ ऐसे स्थान होते हैं, जहाँ कोशिका द्रव्य बहुत ही पतला होता है, इन्हें रसधानियाँ कहते हैं। रसधानियाँ कोशिका में से विषैले पदार्थों को बाहर निकालने तथा भोजन कणों को जमा करने का कार्य करती हैं। कुछ संकुचनशील रसधानियाँ एक कोशीय जीवों में से पानी का उत्सर्जन करने का कार्य करती हैं।
(viii) पक्षमाभ और कशाभ-ये कुछ पतली सतही संरचनाएँ होती हैं जिनके कारण कोशिका तरल माध्यम में गति कर सकती है। पक्षमाभ संख्या में अधिक परंतु आकार में छोटे होते हैं जबकि कशाभ एक या दो ही होते हैं और इनकी लंबाई अधिक होती है। इनको मनुष्य अपनी क्षमता के आधार पर विकसित करता है।