रुधिर (Blood)- रुधिर लाल रंग का तरल संयोजी ऊतक है। रुधिर शरीर के भागों में दौड़ता है, इसलिए कह सकते हैं कि यह शरीर के सभी भागों को आपस में जोड़ता है। मानव रक्त के प्रमुख दो घटक हैं-
(क) प्लाज्मा यह रुधिर का हल्के पीले (धानी) रंग का पदार्थ होता है। इसमें 90% जल होता है, शेष लवण, ग्लूकोज एमीनो अम्ल, प्रोटीन, हार्मोन, ऑक्सीजन, कार्बन-डाइऑक्साइड गैस तथा कुछ पचे-अनपचे पदार्थ होते हैं।
कार्य- इसमें फाइब्रोजीन नामक प्रोटीन होता है जो रुधिर को जमाने में काम आता है। इसमें प्रतिरक्षी (प्रतिजन) भी पाए जाते हैं जो बाह्य पदार्थों-जीवाणु आदि को निष्क्रिय कर देते हैं।
(ख) रुधिर कणिकाएँ- रुधिर में तीन प्रकार की कणिकाएँ पाई जाती हैं जिनका वर्णन निम्नलिखित प्रकार से है-
1. लाल रुधिर कणिकाएँ- ये गोलाकार होती हैं। प्रत्येक लाल कणिका का जीवन लगभग चार महीने का होता है। इनके अंदर हीमोग्लोबिन नामक एक पदार्थ होता है जो रुधिर को लाल रंग प्रदान करता है। ये आकार में गोल, चपटी तथा छोटी होती हैं। इनमें केंद्रक नहीं होता। इनकी संख्या सबसे अधिक होती है (50 लाख प्रति घन मिलीलीटर)।
कार्य- (1) लाल रुधिर कणिकाएँ रक्त को लाल रंग प्रदान करती हैं।
(2) इनका हीमोग्लोबिन सारे शरीर में ऑक्सीजन का वितरण करता है। ऑक्सीजन पाकर ये कणिकाएँ ऑक्सी हीमोग्लोबिन बन जाती हैं।
2. श्वेत रुधिर कणिकाएँ-श्वेत रुधिर कणिकाओं की संख्या लाल रुधिर कणिकाओं से कम होती है, परंतु माप में उनसे बड़ी होती हैं। इनका रंग सफेद होता है, क्योंकि इनमें हीमोग्लोबिन नहीं होता। अतः इनका आकार भी निश्चित नहीं होता। इनमें केंद्रक भी होता है। ये पाँच प्रकार की होती हैं।
कार्य- ये शरीर को नुकसान पहुँचाने वाले रोगाणुओं को मार देती हैं और उन्हें निगल जाती हैं। इस प्रकार ये रोगों से हमारी रक्षा करती हैं।
(ग) पट्टिकाणु या ब्रोम्बोसाइट या प्लेटलैटस-ये बीच में से मोटी और किनारे पर से पतली होती हैं। ये बहुत छोटी होती हैं। इनमें भी केंद्रक होता है।
कार्य- ये रक्त को जमने में सहायता करती हैं। चोट लगने पर जब रक्त बाहर निकलता है, तो ये कणिकाएँ चोट लगे स्थान पर इकट्ठी हो जाती हैं और एक रासायनिक क्रिया द्वारा वहाँ जम जाती हैं, ताकि और अधिक रक्त न बह सके।
