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आधुनिक आवर्त सारणी की विशेषताओं को विस्तार से लिखें।

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आवर्त सारणी की विशेषताएँ-- इसकी विशेषताएँ अग्रलिखित हैं
वर्गों की विशेषताएँ-आवर्त सारणी को देखने से पता चलता है कि
(i) किसी एक वर्ग के तत्त्वों के बाह्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास समान होने के कारण उनके गुण समान होते हैं।
(ii) किसी वर्ग में ऊपर से नीचे आने पर तत्त्वों के गुणों में क्रमिक परिवर्तन होता है। इसका कारण यह है कि परमाणु के नाभिक और उसके बाह्य संयोजी इलेक्ट्रॉनों के बीच आकर्षण क्रमिक रूप से परिवर्तित होता है।
अब हम किसी वर्ग में तत्त्वों के गुणों पर विचार करें।
1. इलेक्ट्रॉनिक विन्यास-किसी वर्ग-विशेष के सभी तत्त्वों के बाह्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास समान होते हैं, अर्थात, सभी तत्त्वों के परमाणुओं में संयोजी इलेक्ट्रॉनों की संख्या समान होती है। उदाहरण के लिए, वर्ग 1 के सभी तत्त्वों के परमाणु में संयोजी इलेक्ट्रॉन की संख्या 1 होती है। इसी प्रकार, वर्ग 17 के सभी तत्त्वों के परमाणु में संयोजी इलेक्ट्रॉनों की संख्या 7 होती है।
वर्ग 1 और 17 के तत्त्वों के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास
इस प्रकार, किसी वर्ग के सभी तत्त्वों के बाह्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास समान होते हैं, किन्तु वर्ग में ऊपर से नीचे आने पर शेलों की संख्या बढ़ती जाती है।
2.संयोजकता—किसी वर्ग के सभी तत्त्वों की संयोजकता समान होती है। किसी तत्त्व की संयोजकता उसके परमाणु के संयोजी शेल में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या द्वारा निर्धारित होती है। अतः वर्ग 1 और 2 के तत्त्वों को संयोजकताएँ क्रमश: 1 और 2 होती हैं।
किसी तत्त्व के परमाणु का अन्य परमाणुओं के साथ संयोग होने पर उस तत्त्व के परमाणु का अन्य परमाणुओं के साथ संयोग होने पर उस तत्त्व के परमाणु द्वारा व्यक्त या प्राप्त इलेक्ट्रॉन की संख्या द्वारा भी उस तत्त्व की संयोकजता निर्धारित की जाती है। उदाहरण के लिए, वर्ग 17 के तत्त्वों का प्रत्येक परमाणु संयोग करनेवाले अन्य परमाणु से एक इलेक्ट्रॉन प्राप्त कर स्थायी इलेक्ट्रॉनिक विन्यास प्राप्त करता है। अतः वर्ग 17 के तत्त्वों की संयोजकता 1 होती है।

3. परमाणु का आकार या त्रिज्या किसी परमाणु के बाह्यतम शेल और उसके नाभिक के केन्द्र के बीच की दूरी को परमाणु त्रिज्या कहते हैं। किन्तु परमाणु के बाह्यतम शेल का स्थान नियत नहीं है, अत: परमाणु त्रिज्या का ठीक-ठीक मान निर्धारित करना कठिन है। फिर भी, एक ही तत्त्व के किसी सहसंयोजक अणु में दो आसन्न परमाणुओं के केंद्र के बीच की दूरी के औसत को परमाणु का आकार या त्रिज्या कहते हैं। उदाहरण के लिए, क्लोरीन अणु के दोनों बंधित नाभिकों के बीच, की दूरी 198 pm होती है। अतः क्लोरीन की सहसंयोजक त्रिज्या, `=198/2 = 99 pm.` आवर्त सारणी के किसी वर्ग में ऊपर से नीचे आने पर परमाणु का आकार बढ़ता जाता है, क्योंकि प्रत्येक तत्त्व के बाद वाले तत्त्व में इलेक्ट्रॉनों का एक नया शेल है। इसे सारणी V में दिखाया गया है।
आयनन ऊर्जा-किसी विलगित गैसीय परमाणु में सबसे कमजोर बल से बँधे इलेक्ट्रॉनों को निष्कासित करने के लिए आवश्यक ऊर्जा आयनन ऊर्जा कहलाती है। इसे प्रथम आयनन ऊर्जा भी कहते हैं।
एक ही इलेक्ट्रॉन नहीं, बल्कि पहले इलेक्ट्रॉन के निकल जाने के पश्चात दूसरे और तीसरे इलेक्ट्रॉन भी परमाणु से निष्कासित किए जा सकते हैं इनके लिए आवश्यक ऊर्जाएँ क्रमशः द्वितीय और तृतीय आयनन ऊर्जा कहलाती हैं।
`Moverset(E_(1))rarrM^(+)e`
`M^(+)overset(E_(2))rarrM^(2+)e`
`M^(2+)overset(E_(2))rarrM^(3+)e`

`E_(1)E_(2)` और `E_(3)` क्रमश: प्रथम, द्वितीय और तृतीय आयनन ऊर्जा हैं जो 1,2 और 3 इलेक्ट्रॉनों को एक-एक करके निष्कासित करने के लिए आवश्यक होती है।
E,E, और E क्रमश: प्रथम, द्वितीय और तृतीय आयनन ऊर्जा हैं जो 1,2 और 3 इलेक्ट्रॉनों को एक-एक करके निष्कासित करने के लिए आवश्यक होती है।
द्वितीय आयनन ऊर्जा का मान प्रथम आयनन ऊर्जा के मान से अधिक होता है। इसका कारण यह है कि एक इलेक्ट्रॉन के निकल जाने से परमाणु पर इकाई धन आवेश उत्पन्न हो जाता है जिससे धन आवेशित परमाणु दूसरे इलेक्ट्रॉन को अपनी ओर खींचे रहता है। अत: दूसरे इलेक्ट्रॉन को निष्कासित करने के लिए अतिरिक्त ऊर्जा की आवश्यकता होती है। अतः,
`E_(2)>E_(1)`
इसी प्रकार,`E_(3)>E_(2)`
`therefore` `E_(1)>E_(2)>E_(1)`
आवर्त सारणी के किसी वर्ग में ऊपर से नीचे आने पर परमाणु का आकार बढ़ते जाता है। अतः, संयोजी इलेक्ट्रॉन नाभिक से दूर होते जाता है जिससे नाभिक और संयोजी इलेक्ट्रॉन के बीच का आकर्षण-बल कमजोर होते जाता है। अतः, परमाणु अधिक आसानी से अपना संयोजी इलेक्ट्रॉन खोकर धनायन में परिवर्तित हो सकता है। अत: आवर्त सारणी के किसी वर्ग में ऊपर से नीचे आने पर आयनन ऊर्जा का मान घटते जाता है, अर्थात, तत्त्व का विद्युतधनात्मक गुण बढ़ते जाता है। उदाहरण के लिए, Li की आयनन ऊर्जा Na से अधिक होती है, अर्थात, Na, Li की तुलना में अधिक विद्युतधनात्मक तत्त्व है।
वर्ग 1 के तत्त्वों की प्रथम आयनन ऊर्जा

5.धातुई गुण—किसी वर्ग में ऊपर से नीचे आने पर तत्त्व को धातुई गुण बढ़ने लगता है। वर्ग के सबसे निचले तत्त्व का धातुई गुण सबसे अधिक होता है। उदाहरण के लिए, वर्ग 15 का पहला तत्त्व नाइट्रोजन (N) है जो स्पष्टतः एक अधातु है, जबकि अंतिम तत्त्व बिस्मथ (Bi) में धातुई गुण स्पष्ट हो जाता है।
आवर्त सारणी में सोडियम (Na), मैग्नीशियम (Mg), कैल्सियम (Ca) आदि धातु सारणी के बायीं ओर है।
6. विद्यत ऋणात्मकता सहसंयोजक बंधन से जुड़े इलेक्ट्रॉन-युग्म को अपनी ओर आकर्षित करने की परमाणु की क्षमता को उसकी विद्युत ऋणात्मकता कहते हैं। आवर्त सारणी के किसी वर्ग के ऊपर से नीचे आने पर तत्त्वों की विद्युत ऋणात्मकता क्रमशः घटती जाती है। उदाहरण के लिए, वर्ग 17 के हैलोजेन के तत्त्वों में फ्लुओरीन सबसे अधिक विद्युत ऋणात्मक होता है, जबकि आयोडीन सबसे कम विद्युत ऋणात्मक होता है।
7.रासायनिक क्रियाशीलता .आवर्त सारणी के किसी वर्ग के सभी तत्त्वों के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास एक-जैसे होते हैं। अत:, उनके रासायनिक गुणों में भी समानता होती है। फिर भी, वर्ग में ऊपर से नीचे आने पर तत्त्वों की रासायनिक क्रियाशीलता में नियमित क्रमबद्धता पायी जाती है।
(i) वर्ग में ऊपर से नीचे आने पर धातुओं की क्रियाशीलता बढ़ती है। उदाहरण के लिए वर्ग 1 का लिथियम (Li) सबसे कम क्रियाशील है, जबकि फ्रांसियम (Fr) सबसे अधिक क्रियाशील होता है। क्षार-धातुओं और क्षारीय मृदा धातुओं की क्रियाशीलताओं का क्रम निम्नलिखित होता है
वर्ग 1 की क्षार-धातुएँ : Li वर्ग 2 की क्षारीय मृदा धातुएँ : Be< Mg (ii) वर्ग में ऊपर से नीचे आने पर अधातुओं की क्रियाशीलता घटती जाती है। उदाहरण के लिए, वर्ग 17 के हैलोजेन तत्त्वों की क्रियाशीलता का क्रम निम्नलिखित होता है F > Cl > Br > I .
8. भौतिक गुण
(i) किसी वर्ग में ऊपर से नीचे आने पर धातुई तत्त्वों के भौतिक गुण (द्रवणांक, क्वथनांक आदि) क्रमशः घटते जाते हैं, किन्तु घनत्व में बढ़ने की प्रवृत्ति होती है

(ii) वर्ग में ऊपर से नीचे आने पर अधातुओं के भौतिक गुण क्रमश: बढ़ते जाते हैं।

आवर्तों की विशेषताएँ इनकी विशेषताएँ इस प्रकार हैं
1.संयोजी इलेक्टॉन - किसी आवर्त में बाएँ से दाएँ जाने पर संयोजी इलेक्ट्रॉनों की संख्या क्रमशः 1 से 8 तक बढ़ती है। प्रथम आवर्त में यह वृद्धि सिर्फ 1 से 2 तक होती है। तृतीय आवर्त में होनेवाली वृद्धि को सारणी में दिखाया गया है।

सारणी से स्पष्ट है कि इन तत्त्वों के परमाणुओं में संयोजी शेलों की संख्या समान है। अतः, समान शेलों की संख्यावाले तत्वों को आवौं सारणी के एक ही आवर्त के अंतर्गत रखा गया है।
2.संयोजकता द्वितीय और तृतीय आवर्ता में बाएँ से दाएँ जाने पर हाइड्रोजन के सापेक्ष संयोजकता 1 से 4 तक बढ़ती है, फिर 4 से क्रमशः घटकर 1 हो जाती है।
`{:("ततीय आवर्त ",Na,Mg,Al,Si,P,S,Cl),("संयोजकता:",1,2,3,4,3,2,1):}`
3. परमाण का आकार किसी आवर्त में बाएँ से दाएँ जाने पर तत्त्वों के परमाणु आकार घटते जाते हैं।
`{:("ततीय आवर्त ",Na,Mg,Al,Si,P,S,Cl),("परमाणु आकार:",190,160,143,117,110,104,99),("(pm में)",,,,,,,):}`
किसी आवर्त में बाएँ से दाएँ जाने पर परमाणु संख्या बढ़ती है। अतः, परमाणु में प्रोटॉनों और इलेक्ट्रॉनों की संख्याएँ बढ़ती जाती हैं। अतिरिक्त आनेवाले इलेक्ट्रॉन एक ही शेल में प्रवेश करते हैं। अतः, नाभिक में धन आवेश बढ़ने से नाभिक और बाह्य इलेक्ट्रॉनों के बीच आकर्षण बढ़ जाने से बाह्य इलेक्ट्रॉन शेल नाभिक की ओर खिंच जाते हैं। फलतः, परमाणु का आकार घटते जाता है।
4.धातई गण- किसी आवर्त में बाएँ से दाएँ जाने पर तत्त्वों के धातुई गुण घटते जाते हैं। अतः, विशिष्ट धातुएँ आवर्त सारणी में एकदम बायीं ओर और विशिष्ट अधातुएँ एकदम दायीं ओर स्थित हैं। उदाहरण के लिए, तृतीय आवर्त के तत्त्वों को लें।
`{:("ततीय आवर्त ",Na,Mg,Al,Si,P,S,Cl),("",larr,"धातु ",rarr,"अधातु ",larr,"अधातु",rarr):}`
5.आयनन ऊर्जा- किसी आवर्त में बाएँ से दाएँ जाने पर तत्त्वों की आयनन ऊर्जा क्रमशः बढ़ती जाती है। इसका कारण परमाणु के आकार का घटते जाना है। फलतः, तत्त्व का विद्युत धनात्मक गुण कम होते जाता है और विद्युतऋणात्मक गुण बढ़ते जाता है।
6.विद्यतऋणात्मकता-किसी आवर्त में बाएँ से दाएँ जाने पर तत्त्व की विद्युतऋणात्मकता बढ़ती जाती है। इसका कारण यह है कि बाएँ से दाएँ जाने पर परमाणु का आकार घटता है जिससे प्रवेश करनेवाले अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन आसानी से नाभिक की ओर आकर्षित हो जाते हैं।
7.ऑक्साइडों के गण- किसी आवर्त में बाएं से दाएँ जाने पर तत्त्वों के ऑक्साइड की ति प्रबल भास्मिक से क्रमशः घटकर प्रबल अम्लीय हो जाती है। इसे सारणी VI में दिखाया गया है
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