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हमारा जीवन जिन मानवीय सिद्धान्तों, अनुभव...

हमारा जीवन जिन मानवीय सिद्धान्तों, अनुभवों और सांस्कृतिक संस्कारों के संबल से समस्त सृष्टि के लिए महत्त्वपूर्ण बना है, परोपकार की भावना उन्हीं में एक है। मानव को दूसरे मानव के प्रति वैसा ही संवेदनात्मक उत्तरदायित्व निभाना चाहिए, जैसे वह स्वयं के प्रति निभाता है। जीवन को केवल परोपकार, पर सेवा और नि:स्वार्थ प्रेम के लिए ही वास्तविक समझना चाहिए, क्योंकि नश्वर शरीर जब नष्ट हो जाएगा, तो उसके बाद हमारा कुछ भी इस दुनिया के जीवों की स्मृति में नहीं रहेगा। हम जग जीवों की स्मृति में सदा-सदा के लिए तभी बने रह सकते हैं, जब हम अपने नश्वर शरीर को वैचारिक, बौद्धिक और आत्मिक चेतना से पूर्ण कर नि:स्वार्थ भाव से स्वयं को जीव सेवा में समर्पित करेंगे। हमें स्थिरता से और शान्तिपूर्वक यह विचार करते रहना चाहिए कि हमारे जीवन का सर्वश्रेष्ठ उद्देश्य और एकमात्र लक्ष्य हमारे द्वारा। किया जाने वाला त्याग है। त्याग योग्य व्यक्त्तिव प्राप्त करने के लिए गहन तप की आवश्यकता है। त्याग का भाव किसी मनुष्य में साधारण होते हुए जन्म नहीं लेता। इसके लिए मनुष्य को जीव-जगत और इसके जीवों के सम्बन्ध में असाधारण वैचारिक रचनात्मकता अपनाकर निरन्तर योग, ध्यान, तप व साधना करनी होगी। उसे इस स्थिति से विचरते हए विशिष्ट आध्यात्मिक अनुभवों से लैस होना होगा। आवश्यकता होने पर उसे जीवों की वास्तविक सेवा करनी होगी। जब ऐसी विशेष मानवीय परिस्थितियाँ उत्पन्न होंगी, तब ही मानव में त्याग का भाव आकार ग्रहण करेगा।
'आध्यात्मिक' शब्द का निर्माण किस उपसर्ग की सहायता से हुआ है?

A

आध्य

B

C

अधि

D

आधि

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The correct Answer is:
C

आध्यात्मिक शब्द का निर्माण .अधि. उपसर्ग से हुआ है। इसमें मूल शब्द । .आत्म. तथा .इक. प्रत्यय का प्रयोग हुआ है।
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