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मनुष्य अपने विकास के लिए प्राकृतिक संसाध...

मनुष्य अपने विकास के लिए प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करके अपनी विविध आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण, संवर्द्धन एवं मितव्ययितापूर्वक उपयोग मानव की कुशलता, लगन एवं समर्पण पर निर्भर है। प्रकृति के अमूल्य उपहारों, जैसे-वन, जल, खनिज आदि का अपने कल्याण के लिए सम्पूर्ण प्रयोग करना मानव-मात्र की इच्छा शक्ति व तर्कशक्ति पर निर्भर है। मानव की प्रगति के लिए सतत विकास का महत्त्व गांधीजी ने बहुत पहले ही पहचान लिया था। इसलिए सतत विकास हेतु मानव की आत्मनिर्भरता को ध्यान में रखकर संसाधनों के संरक्षण पर जोर दिया। विकास का ध्येय जीवन के आर्थिक ही नहीं वरन सामाजिक, आर्थिक, नैतिक और आध्यात्मिक स्तर को ऊँचा उठाना होना चाहिए। प्रकृति से संस्कृति की ओर बढ़ने की आकांक्षा हमेशा होनी चाहिए। जहाँ इस आकांक्षा की पूर्ति होगी उसे इतिहास में स्वर्ण युग का नाम देना उचित होगा न कि साहित्य और कला की तरक्की का। इस दृष्टि से अभी तक भारत का स्वर्ण युग दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता।
भारत का स्वर्ण युग दूर-दूर तक इसलिए दिखाई नहीं देता, क्योकि 

A

भारत में सोना कम हो गया है

B

प्रकृति से संस्कृति की ओर बढ़ने की आकांक्षा पूरी नहीं हो रही है ।

C

प्रकृति के संसाधनों का संरक्षण नहीं हो रहा है

D

लोगों का आर्थिक स्तर नहीं बढ़ा है

Text Solution

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The correct Answer is:
B

दिए गए गद्यांश के अनुसार भारत का स्वर्ण-युग दूर-दूर तक इसलिए दिखाई नहीं देता, क्योंकि प्रकृति से संस्कृति की ओर बढ़ने की आकांक्षा पूरी नहीं हो रही है।
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